Nanda : जब ‘छोटी बहन’ बनीं बॉलीवुड की बेहतरीन एक्ट्रेस

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मिल के ख्यालों में ही अपने बलम से

नींद गंवा ली अपनी मैंने कसम से...

ये समां... समां है ये प्यार का

किसी के इंतजार का...

दिल न चुरा ले कहीं मेरा, मौसम बहार का..

इस गीत को मशहूर गीतकार आनंद बक्शी साहब ने लिखा है फिल्म थी साल 1965 में रिलीज हुई ‘जब जब फूल खिले’। और जिस हीरोइन पर फिल्माया गया है वो अपने दौर की बेहद खूबसूरत और बेहतरीन एक्ट्रेस नंदा थीं। इसी गीत की तरह ही नंदा की कुछ अपनी रियल जिंदगी भी रही है। अपनी मोहब्बत का इजहार न कर पाने से 53 साल की उम्र तक इंतजार किया। और जब सगाई हुई तो बनने वाले लाइफ पार्टनर की मौत हो गई। कौन था वो जिससे नंदा इतनी शिद्दत से प्यार करती थीं। हम आपको ये भी बताएंगे वो कौन से ऐसे गाने हैं, जिसे आजकल के युवा बेहद पसंद करते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता उसकी हीरोइन नंदा है।

नंदा जिनमें नजाकत, मासूमियत और परियों वाली बात थी। मशहूर एक्टर और डायरेक्टर मास्टर विनायक की बेटी नंदा फिल्मों में काम करना नहीं चाहती थी। वे अपना रोल मॉडल नेताजी सुभाष चंद्र बोस को मानती थी और सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना चाहती थीं। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। आठ जनवरी साल 1939 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में जन्मी नंदा का जीवन तब पूरी तरह से बदल गया जब पिता की अचानक मौत हो गई। 10 साल की उम्र में ही नंदा पर परिवार की पूरी जिम्मेदारी गई। हालात इतने खराब हो गए कि उन्हें बंगला-गाड़ी सब बेचना पड़ा।

बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट साल 1952 की ‘जग्गू’ और 1954 की ‘अंगारे’ जैसी फिल्में कीं। नंदा के चाचा थे जाने माने फिल्मकार वी. शांताराम और उन्ही ने बतौर हीरोइन मौका दिया। फिल्म थी ‘तूफान और दीया’। लेकिन बॉलीवुड में उनको पहचान बनाने के लिए 10 साल का लंबा वक्त लग गया। क्योंकि उन्हें हीरो की छोटी बहन के रोल ऑफर होते थे। साल 1959 में नंदा ने फिल्म 'छोटी बहन' में राजेंद्र कुमार की अंधी बहन का रोल किया। राजेंद्र कुमार की अगली फिल्म 'धूल का फूल' सुपरहिट रही। इसमें भी वो बहन बनी। साल 1960 में रिलीज हुई 'काला बाजार' में भी वे देव आनंद की बहन बनीं।

साल था 1965 फिल्म रिलीज हुई जब-जब फूल खिले। 20 लाख में बनी इस फिल्म ने उस दौर पांच करोड़ से ज्यादा कमाए। ये फिल्म ऐसी थी जिसने शशी कपूर को भी पहचान दिलाई और नंदा को रातोंरात स्टार। शशि कपूर और नंदा की बेहद सफल जोड़ी बनी। ‘चार दीवारी’ और ‘मेंहदी लगी मेरे हाथ’ जैसी करीब नौ फिल्मों में दोनों ने एक साथ काम किया।

साल दर साल गुमनाम, ‘तीन देवियां, ‘उम्मीद, ‘नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे, ‘पति-पत्नी, ‘परिवार, ‘अभिलाषा, ‘इत्तेफाक, ‘बड़ी दीदी, ‘रुठा न करो, ‘अधिकार, ‘शोर, ‘कातिल कौन जैसी एक से बढ़कर एक फिल्में दी।

बढ़ती उम्र के साथ नंदा फिल्मों में काम करना कम कर दिया चार साल के ब्रेक के बाद साल 1981 में नंदा ने ‘आहिस्ता आहिस्ता’ से इंडस्ट्री में दोबारा वापसी की। फिर साल 1982 में रिलीज हुई राज कपूर की फिल्म ‘प्रेमरोग’ और 1983 की ‘मजदूर’ में काम किया। इन तीनों ही फिल्मों में नंदा ने पद्मिनी कोल्हापुरी की मां का रोल किया था।

उनके ऊपर फिल्माए गए गानों की बात करें जिनको आज के युवा भी पसंद करते है गुनगुनाते है लेकिन कम लोगों को पता होगा कि वो हीरोइन नंदा के गीत है। ‘एक प्यार का नगमा है..’ ‘अल्ला तेरो नाम..’ ‘लिखा है तेरी आंखों में किसका अफसाना..’ ‘गुलाबी आंखें जो तेरी देखी..’ ‘एक था गुल और एक थी बुलबुल’, ‘परदेशियों से न अखियां मिलाना’, ‘न-न करते प्यार’ और ‘ये समां समां है प्यार का’ आज भी सुपरहिट हैं।

परिवार की जिम्मेदारी उठाने के कार अपने काम इतनी व्यस्त हो गईं की शादी करने का मौका नहीं मिल पाया। पर वे मशहूर फिल्म डायरेक्टर मनमोहन देसाई से बेहद मोहब्बत करती रहीं। लेकिन उसका इजहार नहीं किया। मनमोहन देसाई भी उन्हें चाहते थे। बेहद शर्मीली नंदा से वे भी अपने प्यार का इजहार नहीं कर पाए। और मनमोहन देसाई ने शादी कर ली। लेकिन, कुछ समय बाद ही मनमोहन देसाई की पत्नी का निधन हो गया। मनमोहन देसाई ने फिर से नंदा के नाम मोहब्बत का पैगाम पहुंचाया। नंदा ने उसे कबूल किया। और साल 1992 में 53 साल की उम्र में नंदा ने सगाई कर ली। लेकिन सगाई के दो साल बाद ही मनमोहन देसाई की एक हादसे में मौत हो गई। इस तरह से दोनों कभी एक नहीं हो पाए और नंदा काफी अकेली हो गई। और बाकी की जिंदगी नंदा ने शादी के बगैर ही बाकी कि जिंदगी मनमोहन देसाई की विधवा होकर बिताई। था। इसके बाद जब भी वो नजर आतीं तो वो सफेद साड़ी में ही नजर आती।

तारीख थी 25 मार्च और साल 2014 जब नंदा ने करीब 75 साल की उम्र में दुनिया से अलविदा कह दिया।

अपने 4 दशक के फिल्मी सफर में एक से बढ़ कर एक फिल्में देने के बाद उनको फिल्म फेयर का बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड नहीं मिला। नंदा ने 8 गुजराती फिल्मों में भी काम किया। मराठी फिल्म ‘कुलदेवता’ के लिए नंदा को जवाहरलाल नेहरू ने विशेष पुरस्कार से नवाजा था।

उनकी जिंदगी को देखते हुए उन्ही की फिल्म का एक गीत याद आ रहा है....

मौत कितनी भी संगदिल हो

जिंदगी से तो मेहरबां होगी...

हम ना होंगे गम किसे होगा

खत्म हर गम की दास्तां होगी...

फिल्म आज और कल। संगीतकार रवि । गीतकार साहिर लुधयानवी।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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