ये है Indian Navy की नई ताकत किलर सबमरीन, जानिए क्या हैं खूबियां

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भारत अब अपनी पनडुब्बियों की ताकत को और बढ़ाने जा रहा है। इंडियन नेवी के प्रोजेक्ट 75 (आई) के तहत 6 डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों का निर्माण भारत में होना है। इन पनडुब्बियों की खासियत होगी कि ये लंबे वक्त तक समुद्र के अंदर रह सकती हैं। इन पनडुब्यिों के निर्माण की लागत करीब 5.2 बिलियन डॉलर आएगी। इससे पहले भारत ने फ्रांस के साथ 6 स्कॉर्पिन सबमरीन बनाई हैं। इसकी छठवीं और आखिरी स्कॉर्पीन क्लास की पनडुब्बी का समुद्री ट्रायल शुरू कर दिया गया हैं। 

भारत, जर्मनी से HDW क्लास 214 पनडुब्बी को खरीद रहा है। जर्मनी की समुद्री हथियार बनाने वाली कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स इन पनडुब्बियों के लिए अपनी तकनीक देगी। प्रोजेक्ट 75 आई के तहत भारत जो पनडुबी देश में ही बनाना चाहता है उसमें बेहतर हथियार, बेहतर सेंसर और सबसे ख़ास AIP यानी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन सिस्टम है। इस AIP तकनीक वाली पनडुब्बी को पानी के भीतर पता लगाना काफी मुश्किल है और ये पनडुब्बी समुद्र में करीब 400 मीटर यानी 1,300 फीट की गहराई तक गोता लगा सकती है। वहीं पारंपरिक पनडुब्बियों को हर 24 से 48 घंटे में बैटरी चार्ज करने के लिए पानी से बाहर आना पड़ता है जिसकी वजह से दुश्मनों की नजर में आने का खतरा बढ़ जाता है, लेकिन AIP के दम पर पनडुब्बियां पानी के अंदर 15 दिन से भी ज्यादा वक्त तक रह सकती हैं। यही वजह है कि प्रोजेक्ट 75 आई की पनडुब्बियों को स्टील्थ पनडुबी या किलर सबमरीन माना जा रहा है। 

जर्मनी के रक्षामंत्री ने MDL शिपयार्ड का दौरा किया

पिछले दिनों जर्मनी के रक्षामंत्री ने MDL शिपयार्ड का दौरा करके पनडुब्बी निर्माण से जुड़ी जानकारी हासिल की और इंफ्रास्टकचर को खुद देखा। दरअसल, साल 2017 में भारत ने अपनी नौसेना को मजबूत करने के इरादे से एक खास प्रोजेक्ट 75 आई की घोषणा की थी। इस घोषणा के तहत मेक इन इंडिया यानी देश में ही 6 स्टील्थ पनडुब्बियां बनाई जानी हैं। इस प्रोजेक्ट के लिए भारत के एक-एक प्राइवेट और सरकारी शिपयार्ड को किसी विदेशी शिपयार्ड के साथ मिलकर इन पनडुब्बियों का निर्माण भारत में ही करना है। इसके लिए रक्षा मंत्रालय ने प्राइवेट के लिए चुना है एल एंड टी को और सरकारी है MDL रक्षा मंत्रालय ने एल एंड टी और MDL को 5 विदेशी शिपयार्ड के नाम दिए हैं। जिनके साथ ये करार किया जा सकता है। ये 5 ग्रुप हैं जर्मनी का थिसेनक्रुप जिसे TKMS  के नाम से भी जाना जाता है। दूसरा दक्षिण कोरिया का डेवू। तीसरा है स्पेन की नोवांतिस, चौथा है फ्रांस का नेवल ग्रुप और पांचवां रूस। 

सौदे के लिए जर्मनी-साउथ कोरिया के बीच लड़ाई 

हालांकि एयर इंडिपेंडेंट प्रॉपल्शन तकनीक नहीं होने की वजह से रूस और फ्रांस प्रोजेक्ट 75 आई की रेस से बाहर बताए जा रहे हैं। अब इस सौदे के लिए जर्मनी और साउथ कोरिया के बीच लड़ाई है। के9 वज्र टैंक जिस पर पीएम मोदी ने सवारी की थी वो दक्षिण कोरिया की ही है और अब भारत में ही बनती है। पनडुब्बियां रखने वाले देशों की बात करें तो उनमे चीन, अमेरिका, फ्रांस, रूस, नार्थ कोरिया और भारत है। चीन के पास इस समय आधा दर्जन परमाणु पनडुब्बियां हैं। जबकि भारत के पास इस तरह की एक पनडुबी है। हालांकि दूसरी पनडुबी का काम विशाखपट्नम में चल रहा है। भारत के पास एक दूसरी न्यूक्लियर पनडुबी थी INS चक्र जो रूस से 10 साल की लीज पर ली गई थी, लेकिन ये एसएनएन समरी थी यानी जिसका इंजन तो न्यूक्लियर था लेकिन ये परमाणु हथियार नहीं दाग सकती थी। चीन अपनी सेना पीएलए के लिए तो पनडुब्बियां बना ही रहा है ये 8 पनडुब्बियां पाकिस्तान के लिए भी बना रहा है। ऐसे में भारत की चिंता बढ़ना लाजमी है।

आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ी?

भारतीय नौसेना को भारत के द्वीपों पर पहरा बढ़ाने के लिए कम से कम 24 सबमरीन की जरूरत है, लेकिन, मौजूदा समय में भारत के पास सिर्फ 16-17 सबमरीन है। इस बेड़े में 6 को छोड़ दें तो बाकी की उम्र 30 साल से ऊपर है और आने वाले समय में इसे रिटायर किए जाने की पूरी संभावना है। यही वजह है कि भारत जल्द से जल्द प्रोजेक्ट 75 आई को पूरा करना चाहता है। क्योंकि दुश्मन की पनडुब्बी पर नजर रखने के लिए भारत के पास अमेरिका के P-8I विमान हैं। साथ ही अमेरिका से 24 MH सबमरीन वालफेयर में महारत हासिल करने वाले रोमियो हेलिकाप्टर की डिलवरी भी शुरू हो गई है। अमेरिका और जर्मनी जैसे देश भी इंडोपेसिविक रीजन में चीन से परेशान है। ऐसे में ये देश भारत को अपने साथ या भारत की सैन्य मदद करने के इच्छुक हैं।

भारत रूस के हथियारों पर कितना निर्भर है?

भारतीय वायु सेना, नौसेना और थल सेना के लगभग 85 प्रतिशत हथियार रूसी हैं और भारत के कुल सुरक्षा के सामानों के आयात का 60 प्रतिशत हिस्सा रूस से आता है। भारतीय वायु सेना रूसी सुखोई एसयू-30 एमकेआई, मिग-29 और मिग-21 लड़ाकू विमानों पर निर्भर है, इसके अलावा आईएल-76 और एंटोनोव एएन-32 ट्रांसपोर्ट विमान, एमआई-35 और एमआई-17वी5 हेलीकॉप्टर हैं और हाल ही मेंली गई एस-400 वायु रक्षा प्रणाली भी रूसी है।

इंडियन नेवी को अगले चार सालों में पारंपरिक पनडुब्बियों की संख्या को 24 तक ले जाना था, लेकिन अब तक जिस तरह के संकेत मिले हैं, उनके मुताबिक़ नेवी के लिए ये लक्ष्य हासिल करना बेहद मुश्किल है।

पिछले 12 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं। वैश्विक और राजनीतिक के साथ-साथ ऐसी खबरें लिखने का शौक है जो व्यक्ति के जीवन पर सीधा असर डाल सकती हैं। वहीं लोगों को ‘ज्ञान’ देने से बचता हूं।

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