अतीक-अशरफ ही नहीं, यूपी पुलिस की कस्टडी में मौत का रहा है अपना ही इतिहास

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प्रयागराज 15 अप्रैल की फिर से दहल गया। 17 पुलिसकर्मियों के बीच तीन शूटरों ने माफिया अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ को गोलियों से छलनी कर दिया, जिससे उनकी मौत हो गई। लेकिन ये पहला मौका नहीं था कि जब पुलिस की कस्टडी में किसी की हत्या की गई हो। अब चाहे कुख्यात डी-2 गिरोह के सरगना रफीक का हत्याकांड, मथुरा का राजेश टोंटा हत्याकांड, मोहित हत्याकांड,  और बिजनौर के कोर्ट रूम शाहनवाज की हत्या, या फिर कानपुर का विकास दुबे और उसके साथियों का एनकाउंटर, इन सभी वारदातों ने पुलिस को पहले ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया था। तो वहीं अब योगी सरकार की  बात करें तो पिछले पांच सालों में 41 लोगों की मौत पुलिस कस्टडी में हो चुकी है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2017 से लेकर साल 2021 तक उत्तर प्रदेश में पुलिस कस्टडी में 41 लोगों की हत्या हो चुकी है। लोकसभा में गृह मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार साल 2017 में 10 लोगों की मौत हुई, साल 2018 में 12 लोगों की पुलिस कस्टडी के दौरान मौत हुई,  साल 2019 में 3, 2020 में 8 और 2021 में 8 लोगों की पुलिस कस्टडी में मौत हुई है।

पुलिस कस्टडी में मौत या हत्या को सुप्रीम कोर्ट की तरफ से साल 2016 में ही जघन्य करार दिया जा चुका है। वहीं साल 2022 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लोकसभा में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग कमीशन का डाटा पेश किया था, जिसमें बताया गया है कि एक साल में कितने लोगों की पुलिस हिरासत में मौत हुई है। 

NHRC की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2021-22 के बीच न्यायिक हिरासत में 2,152 लोगों की मौत हुई, जबकि 155 लोगों की मौत पुलिस कस्टडी में हुई। इसका मतलब ये हुआ कि हिरासत में हर रोज 6 लोगों की मौत हो रही है। न्यायिक हिरासत में मौत के मामले में यूपी सबसे आगे है, जहां 448 लोगों की न्यायिक हिरासत में मौत हुई है। वहीं महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 129 लोगों की मौत पुलिस हिरासत में हुई है। नेशनल कैंपेन अगेंस्ट टॉर्चर की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2019 के आंकड़ों से तुलना की जाए। तो 2019 में हर दिन 5 लोगों की मौत हिरासत में होती थी।

अतीक और अशरफ शूटआउट मामले में जिन पुलिसकर्मियों की लापरवाही सामने आई है। उन पर अब मुसीबत का पहाड़ टूटने वाला है। क्योंकि अगर किसी विचाराधीन कैदी की पुलिस हिरासत में हत्या कर दी जाती है। तो संबंधित पुलिस अधिकारियों पर आईपीसी की धारा 302, 304, 304 ए और 306 के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। इसके अलावा, पुलिस अधिनियम, 1861 की धारा 7 और 29 के अनुसार लापरवाह अधिकारियों को बर्खास्तगी या निलंबन की सजा दी जा सकती है।

पुलिस हिरासत में मौत के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार और राज्य की पुलिस अक्सर सवालों के घेरे में रहती है। तो वहीं अतीक और अशरफ की हत्या भी ऐसे सवालों को जन्म दे रही है कि यूपी पुलिस आखिर अपराधियों के सामने क्यों बौनी साबित हो रही है।

 

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