सुभाष चंद्र बोस की महात्मा गांधी को दी किस चुनौती का NSA अजीत डोभाल ने किया जिक्र ?

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साल 1939 में दिए गए अपने एक भाषण में बोस ने कहा था कि मैं महात्मा गांधी को चुनौती देता हूं कि क्या वो देश की आजादी के लिए एक जन संघर्ष का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं। चाहे वो हिंसक हो या अहिंसक।
इसी चुनौती का जिक्र देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अपने बयान में किया। उन्होंने सुभाष चंद्र बोस मेमोरियल कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए नेताजी की जमकर तारीफ की और इस दौरान उन्होंने कहा कि नेताजी वो शख्स थे जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को चुनौती देने का साहस रखते थे। उन्होंने नेताजी की प्रशंसा करते हुए आगे कहा कि नेताजी अगर होते तो वो देश का कभी बंटवारा नहीं होता। अब उनके इस बयान पर सियासत शुरू हो गई है, लेकिन हम आपको बताते हैं कि आखिर डोभाल ने ये क्यों कहा कि सुभाष चंद्र बोस गांधी जी की चुनौती दे सकते थे।
नमस्ते मैं ऋषभ हूं और आप हैं मंच पर
साल 1939 के दौर में देश की राजनीति में इंडियन नेशनल कांग्रेस का बोलबाला था, और कांग्रेस के बड़े नेताओं में महात्मा गांधी की गिनती होती थी। आसान भाषा में कहें तो महात्मा गांधी ही तब कांग्रेस को दिशा दिखा रहे थे। उस समय अपने एक भाषण के दौरान सुभाष चंद्र बोस ने एक तर्क दिया था कि कांग्रेस भारत की स्वतंत्रता के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं कर रही है। उनका मानना ये था कि कांग्रेस को थोड़ा aggressive approach करने की जरूरत थी, और ऐसा माना जाता है कि इसी तर्क को आधार मानकर नेताजी के गांधी के अहिंसा के विचारों मतभेद थे। उनका कहना था कि ये आजादी पाने का व्यावहारिक तरीका नहीं है।
बोस ने अपने भाषण में कहा था कि मैं महात्मा गांधी को चुनौती देता हूं कि क्या वो देश की आजादी के लिए एक जन संघर्ष का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं। चाहे वो हिंसक हो या अहिंसक। अगर वो ऐसा करने को तैयार नहीं है तो मैं कहता हूं कि भारत के लोगों का नेता बनने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है।
ये वो दौर था जब गांधी जी का डंका भारत ही नहीं दुनिया में बज रहा था। गांधी के लिए ये चुनौती इसलिए महत्वपूर्ण थी कि क्योंकि ये भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इससे पता चलता है कि लोगों में गांधी के नेतृत्व के प्रति असंतोष बढ़ रहा था और कुछ लोग स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए कट्टरपंथी तरीकों को अपनाने के इच्छुक थे। भले ही बोस की चुनौती ने स्वतंत्रता के लिए एक बड़े संघर्ष का नेतृत्व नहीं किया, लेकिन इसने साल 1947 में भारत की अंतिम स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त करने में मदद जरूर की।
आपको याद दिलाते चले कि साल 1939 में ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद का चुनाव जीता था। तब उन्होंने महात्मा गांधी के कैंडिडेट पट्टाभि सीता रमैया को हराया था। बोस की जीत पर गांधी ने कहा था कि ये मेरी हार है। इसके कुछ समय बाद ही बोस ने कांग्रेस छोड़ दी।
इससे पहले भी एनएस डोभाल ने साल 2022 के एक भाषण में इसका जिक्र किया था। डोभाल ने कहा था कि बोस की चुनौती एक्शन के लिए एक स्पष्ट आह्वान था और उनकी इस स्पीच ने स्वतंत्रता के लिए भारतीय लोगों को संघर्ष के लिए प्रेरित करने में मदद की थी।
एक बात और जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि जर्मनी के तानाशाह अडोल्फ हिटलर ने ही सुभाष चंद्र बोस को सबसे पहली बार 'नेताजी' कहकर बुलाया था। नेताजी के साथ ही सुभाष चंद्र बोस को देश नायक भी कहा जाता है। कहा जाता है कि देश नायक की उपाधि सुभाष चंद्र बोस को रवीन्द्रनाथ टैगोर से मिली थी।
सुभाष चंद्र बोस भले ही महात्मा गांधी के विचारों से सहमत नहीं थे, लेकिन वे उनका काफी सम्मान करते थे। वे महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता बुलाने वाले सबसे पहले शख्स थे। उन्होंने महात्मा गांधी से कुछ मुलाकातों के बाद ही उन्हें यह उपाधि दी। इसके बाद अन्य लोग भी गांधीजी को राष्ट्रपिता बोलने लगे। बोस ने रंगून के रेडियो चैनल से महात्मा गांधी को संबोधित करते हुए पहली बार राष्ट्रपिता कहा था।
इन असहमतियों के बीच भी बापू के लिए सुभाष चंद्र बोस का आदर भाव यथावत रहा। उन्होंने बापू पर एक किताब लिखी, जिसका नाम था, 'फॉदर ऑफ़ आल नेशन्स' इस किताब में बोस ने बापू को 'भारत का राष्ट्रपिता' लिखा। यूपीआई  जो कि अब यू एन आई न्यूज़ एजेंसी के एक रिपोर्टर ने गुवाहाटी में बापू से सवाल किया कि क्या सुभाष चंद्र बोस के लिए आपके हृदय में उतना ही आदर और प्यार है जितना उनके मन में आपके लिए है?
बापू का जवाब था,
"सुभाष बाबू ने मेरे बारे में जो लिखा है, वह मैंने नहीं पढ़ा है। लेकिन आपने जो बताया है, उस पर मुझे कोई हैरानी नहीं है। सुभाष बाबू के साथ मेरे संबंध सदैव अत्यंत पवित्र और उत्तम रहे हैं। हम दोनों के दृष्टिकोणों में साधनों के सवाल पर जो भेद हैं, वह तो सबको मालूम ही हैं। इसलिए उस बारे में कुछ कहना बेकार है।"

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