One Nation One Election को लेकर फिर तैयारी तेज, 56 साल बाद क्या फिर से होंगे चुनाव ?

Home   >   खबरमंच   >   One Nation One Election को लेकर फिर तैयारी तेज, 56 साल बाद क्या फिर से होंगे चुनाव ?

85
views

वन नेशन-वन इलेक्शन का जिन्न, एक बार फिर बोतल से बाहर निकल आया है, केंद्र की मोदी सरकार की ओर से संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है. ऐसा दावा किया जा रहा है कि 18 से 22 सितंबर तक संसद के विशेष सत्र में सरकार कई महत्वपूर्ण बिलों को पेश कर सकती हैं, जिनमें वन नेशन-वन इलेक्शन बिल भी शामिल हो सकता है. हालांकि अभी कुछ भी स्पष्ट नहीं है. इसी बीच सरकार ने वन नेशन-वन इलेक्शन को लेकर कमेटी बना दी है और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को इसका अध्यक्ष बनाया गया है. जिसमें कानूनी पहलुओं पर कमेटी विचार करेगी. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्यों अब वन नेशन-वन इलेक्शन को लेकर मुद्दा गर्म है. क्या पहले भी एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव हुए है आखिर क्यों 5 साल बाद फिर से चर्चा इस मुद्दे पर हो रही है जानते हैं.


दुनिया के कई ऐसे देश हैं जहां वन नेशन-वन इलेक्शन की व्यवस्था लागू है. वन नेशन-वन इलेक्शन कराने की बात आज भले ही कही जा रही हो, लेकिन देश में इससे पहले चार बार लोकसभा और राज्यों के चुनाव साथ हो चुके हैं. 1947 में मिली आजादी के बाद भारत में 1951 से 1967 तक देश में लोकसभा और सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ ही हुए थे. देश में पहला चुनाव 1951-52 में ही हुआ था. इस दौरान भी राज्यों में विधानसभा चुनाव एक साथ ही कराए गए थे. साल 1957, 1962 और 1967 में भी लगातार चार बार देश में लोकसभा और राज्यों के विधानसभा के चुनाव साथ हुए थे. देश में लगातार चार बार एक साथ चुनाव होने के बाद 1967 से इसका पैटर्न बदलने लगा.

1967 में UP में विधानसभा चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला था. तब राज्य में 423 सीटें थी और कांग्रेस के खाते में 198 सीटें आईं थी जबकि सरकार बनाने के लिए 212 सीटों की जरुरत थी. दूसरे नंबर पर जनसंघ पार्टी थी जिसे 97 सीटें मिली थीं, लेकिन कांग्रेस ने 37 निर्दलीय सदस्यों और कुछ छोटी पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बना ली और सीपी गुप्ता मुख्यमंत्री बने. चौधरी चरण सिंह की बगावत के चलते एक ही महीने में गुप्ता की सरकार गिर गई. इसके बाद चौधरी चरण सिंह ने भारतीय जनसंघ और संयुक्त समाजवादी के साथ मिलकर सरकार बना ली, लेकिन एक ही साल बाद गठबंधन में अनबन होने की वजह से इन्होंने भी इस्तीफा दे दिया और विधानसभा को भंग करने की सिफारिश कर दी. धीरे-धीरे यही सिलसिला कई और राज्यों में शुरू हो गया. देश में 1967 में एक साथ चुनाव हुए थे ऐसे में 1972 में आम चुनाव होना था, लेकिन इंदिरा गांधी ने समय से पहले 1971 में ही आम चुनाव कराने का फैसला किया. इस तरह से एक देश एक चुनाव की जो व्यवस्था चली आ रही थी उस पर ब्रेक लग गया. इसके बाद से कई राज्यों में सरकारें गिरती रहीं और बीच-बीच में चुनाव होते रहे.


1999 में विधि आयोग ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के लिए अपनी रिपोर्ट दी थी. 2015 में कानून और न्याय मामलों की संसदीय समिति ने भी वन नेशन-वन इलेक्शन की सिफारिश की थी. इसके बाद से समय-समय पर वन नेशन-वन इलेक्शन को लेकर चर्चा होते रहे लेकिन सरकार किसी निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुंच पाई. हालांकि वन नेशन-वन इलेक्शन की बहस को उस समय और हवा मिल गई जब PM मोदी ने 2018 में इसका जिक्र किया. एक कार्यक्रम के दौरान PM मोदी कहा था कि इस मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए कि क्या देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं? इतना ही नहीं उन्हें इसके लिए एक सर्वदलीय बैठक भी बुलाई थी जिसमें वन नेशन-वन इलेक्शन  पर राजनीतिक दलों से उनकी राय जानने का प्रयास किया गया. पिछले आम चुनाव के दौरान चुनाव आयोग ने कहा था कि 2019 में पूरे देश में एक साथ चुनाव कराना संभव नहीं है क्योंकि इसके लिए कई कानूनी प्रक्रियाएं हैं जिसे सरकार को पूरा करना पड़ेगा. हालांकि, 2020 में कोरोना महामारी की वजह से यह मुद्दा फिर से शांत हो गया. लेकिन अब फिर से इस पर चर्चा होने लगी है.


मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वन नेशन-वन इलेक्शन का सबसे बड़ा फायदा ये है कि चुनाव पर होने वाले खर्च कम होंगे प्रशासनिक अधिकारी जो व्यस्त रहते हैं, उससे भी काफी हद तक छुटकारा मिल जाएगा देश में जब पहली बार चुनाव हुए थे, तब करीब 11 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. वहीं, 17वीं लोकसभा चुनाव में 60 हजार करोड़ से अधिक रुपये खर्च होने का अनुमान है.
इससे अंदाजा लगाया लगाया जा सकता है कि अगर सिर्फ लोकसभा चुनाव में इतने पैसे खर्च हो रहे हैं, तो विधानसभा चुनावों में कितने रुपये खर्च होते होंगे. 7वें वेतन आयोग की रिपोर्ट्स के मुताबिक केंद्र और राज्य सरकारों में करीब 1 करोड़ 50 लाख कर्मचारी है जो चुनाव में अपनी ड्यूटी देते हैं. एक अनुमान के मुताबिक भारत की जनसंख्या के 87.75 फीसदी लोग वोट देने की योग्यता रखते हैं.
ऐसा नहीं कि दूसरे देशों में ये लागू नहीं है  दुनिया के कई ऐसे देश हैं, जहां एक देश-एक चुनाव की व्यवस्था है. जर्मनी, हंगरी, स्पेन, पोलैंड, इंडोनेशिया, बेल्जियम, दक्षिण अफ्रीका, स्लोवेनिया और अल्बानिया जैसे देशों में एक देश-एक चुनाव की व्यवस्था है. हाल ही में इस लिस्ट में स्वीडन शामिल हुआ है, जहां एक साथ सभी चुनाव कराए जाते हैं.


देश में 28 राज्य और 8 संघ राज्य क्षेत्र हैं. अब इंडिया में वन नेशन-वन इलेक्शन को लेकर क्या संसद के सत्र में कुछ चर्चा होती है. या कोई बिल लाया जा सकता है. ये देखने वाली बात होगी

कानपुर का हूं, 8 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं, पॉलिटिक्स एनालिसिस पर ज्यादा फोकस करता हूं, बेहतर कल की उम्मीद में खुद की तलाश करता हूं.

Comment

https://manchh.co/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!