करियर की बेहद ऊंचाइयों को छूने वाले ओपी नैय्यर को अंतिम पड़ाव में मिली गुमनामी

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जिनका संगीत आज भी उनके चाहने वालों की दिलो दिमाग पर हावी है। आज कहानी 'रिदम किंग', ‘ताल के बादशाह’, बॉलीवुड के मोहम्मद अली कहे जाने वाले ग्रेट म्यूजिशियन ओमकार प्रसाद मदन गोपाल नैय्यर की। लेकिन आखिर ऐसी कौन सी बात थी कि अपने दौर के ग्रेट म्यूजिशियन ओपी नैय्यर ने 42 साल के करियर में लता जी के साथ एक भी गाना रिकॉर्ड नहीं किया।

किसी भी इंडियन म्यूजिक डायरेक्टर ने लता मंगेशकर की आवाज का इस्तेमाल किए बगैर इतना सुरीला संगीत नहीं दिया है। जो ओपी नैय्यर ने दिया। आशा भोसले को आशा भोसले ओपी नैय्यर ने बनाया। उन्होंने आशा की कर कसी आवाज का पूरा फायदा उठाया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ओपी नैय्यर और आशा भोसले के बीच करीब 14 सालों तक बेहद खास रिश्ता रहा। चार बच्चों के पिता ओपी नैयर और तलाकशुदा आशा भोसले मुंबई की सड़कों में घुले आम घूमा करते थे। ओपी के संगीत और आशा की आवाज से सजे हर एक गाने में एक खास तरह की चिंगारी होती थी। साल 1958 से 1972 तक चले इस रिश्ते को लेकर ओपी नैयर ने एक इंटरव्यू में कहा था कि, 'ये तो सुना था कि प्यार अंधा होता है लेकिन मेरे मामले में प्यार बहरा था क्योंकि आशा की आवाज के अलावा मैं और कोई आवाज सुन नहीं पाता था।

फेमस म्यूजिक हिस्टोरियन राजू भारतन अपनी किताब 'अ जर्नी डाउन मेमोरी लेन' में लिखते हैंजो आवाज ओपी नैय्यर को चाहिए थी वो लता में नहीं थी। ओपी नैय्यर को लगता था की लता की आवाज़ उनके म्यूजिक को सूट नहीं करती। लेकिन मामला इतना सरल नहीं था। एक बार स्क्रीन न्यूज पेपर में दिए गए इंटरव्यू में लता मंगेशकर ने कहा था कि वो ओपी नैय्यर के लिए कभी कोई गाना नहीं गायंगीं। स्क्रीन के अगले ही अंक में ओ पी नैयर ने कहा, लेकिन लता जी मैंने आपसे गाने के लिए कब कहा। राजू भारतन लिखते हैं, "एक बार एमपी गवर्नमेंट ने ओपी नैय्यर को एक लाख रुपये का लता मंगेशकर अवार्ड देने का फैसला किया। जब एक अफसर इस के लिए उनसे मिलने आया तो उन्होंने कहा कि लता के नाम पर अवॉर्ड लेने के बारे में दूर, उसके बारे में सोचना भी पसंद नहीं है। हां ये अवार्ड अगर गीता दत्त के नामपर होता तो कोई आपत्ति नहीं थी। 16 जनवरी 1926 में लाहौर में जन्मे ओ पी नैयर ने 1952 में आसमान फिल्म से अपना करियर शुरू किया था। लेकिन उनको गुरुदत्त की फिल्मों आरपार, मिस्टर एंड मिसेज़ 55, सीआईडी और तुम सा नहीं देखा से पहचान मिली। अपने फिल्मी सफर में करीब 73 फिल्मों में म्यूजिक देने वाले ओपी नैय्यर अपनी पत्नी बच्चों को छोड़कर साल 1994 में थाणे के नख़वा परिवार के साथ रहने लगे। ओपी नैय्यर ने करियर की बेहद ऊंचाइयों को छुआ, और वहीं अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर गुमनामी में रहे। 28 जनवरी, 2007 को 81 वर्ष की उम्र में ओपी नैय्यर ने अंतिम सांस ली। 

उनका एक गीत याद आता है -  ये खूबसूरत गीत साल 1962 में रिलीज हुई फिल्म ‘एक मुसाफिर एक हसीना’ का है। 

बहुत शुक्रिया, बड़ी मेहरबानी, मेरी ज़िंदगी में हुज़ूर आप आए

कदम चूम लूं या कि आंखें बिछा दूं, करूं क्या ये मेरी समझ में न आए।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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