अयोध्या के भगवान श्रीराम की मूर्ति बनाएंगे पद्म भूषण राम वी.सुतार

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कलाकारों से भरे हमारे देश में ऐसे हस्तशिल्पियों की भरमार है, जो पत्थर को तराश कर सुंदर सलोने भगवान बना देने की काबिलियत रखते हैं वो हैं शिल्पकार राम वी. सुतार,जो अब अयोध्या के रामलला की मूर्ति को नेपाल से आये शालिग्राम से तराशेंगे।

ईश्वर को मानने वाले मूर्तियों में भगवान को देखते हैं। क्योंकि उसमें उस कलाकार की आस्था और हुनर जोड़ा हुआ है। ये तब और मुश्किल हो जाता है जब किसी कलाकार ने उसे न देखा हो,क्योंकि किसी मूर्ति को बनाने में उसके नयन नक्श, पहनावे का बहुत ध्यान दिया जाता है। अगर जरा सा फेरबदल हुआ तो पूरी प्रतिमा का स्वरूप बदल जाता है। वो भी उस मूर्ति का जिसकी पूरी देश की आस्था जुड़ी हुई हो। हम बात कर रहे हैं अयोध्या में बन रही रामलला की मूर्ति की, जिसको नेपाल से आये शालिग्राम के पत्थर में उकेरने का जिम्मा शिल्पकार राम वी. सुतार को मिला है। 98 साल के राम के हाथ इतने सधे हुए हैं कि मानों वो मूर्तियों में भी जान डाल देते हैं। 

पवित्र शिला से भगवान की भव्य मूर्ति को गढ़ने की जिम्मेदारी सुतार को यूं ही नहीं दी गई है। उन्होंने भारत में महात्मा गांधी और स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से लेकर शिवाजी, भगवान शिव, बाबा साहेब अंबेडकर तक की मूर्तियों को अपने हाथों से तराशा है।

रामजी वी.सुतार अब अयोध्या के राम मंदिर में स्थापित होने वाली भगवान राम की प्रतिमा का शिल्प करेंगे। इसके साथ ही अयोध्या में बनने वाली दुनिया की सबसे ऊंची भगवान राम की मूर्ति को भी बनाने में वो अपने बेटे अनिल सुतार के साथ लगे हैं।

राम वी.सुतार को आज का विश्वकर्मा यूं ही नहीं कहा जाता है। 1954 से 1958 की अवधि में अजंता और एलोरा की गुफाओं की नक्काशियों में इनका बड़ा योगदान है। एक ही पत्थर से चंबल स्मारक को इस तरह से तराशा कि जिसकी चर्चा आज भी होती है। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि फ्रांस, इटली, इंग्लैंड, अर्जेंटीना, रूस, मलेशिया सहित लगभग 150 देशों में गाँधी जी की जो मूर्तियां लगी हैं, उनका निर्माण एक ही शिल्पकार ने किया है – राम वी. सुतार!

राम वी. सुतार महाराष्ट्र के धूलिया जिले के गोंडूर गांव में 19 फरवरी 1925 को पैदा हुए थे। जिसके बाद श्रीराम कृष्ण जोशी से उन्हें आर्ट के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली और बाद में, उन्होंने बॉम्बे में सर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिला लिया। पढ़ाई पूरी करने के बाद सुतार 1959 में दिल्ली आ गए जहां उन्होंने सूचना और प्रसारण मंत्रालय में काम किया। उन्होंने फ्रीलांस मूर्तिकार के रूप में करियर शुरू करने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी। उन्होंने दिल्ली के लक्ष्मी नगर में एक स्टूडियो खोला और 1990 में नोएडा में जा बसे।

साल 1999 में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था। इसके अलावा उन्हें पद्म भूषण पुरस्कार और टैगोर कल्चरल अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया है। सुतार बॉम्बे आर्ट्स सोसाइटी की ओर से 3 पुरस्कारों से सम्मानित हुए हैं। 2004 में, उन्होंने अपना स्टूडियो स्थापित किया और 2006 में साहिबाबाद में अपनी कास्टिंग फैक्ट्री भी स्थापित की।

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