Partition 1947 : जिसने सबकुछ बांट दिया, क्यों और कैसे खिंची ये सियासी लकीर?

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हर तारीख अपने अंदर कई कहानियों को समेटे है। इतिहास में ऐसी ही एक तारीख है 15 जून साल 1947। आज से 75 साल पहले इसी तारिख को एक सियासी लकीर खींची गई। वो लकीर जिसने मुल्क को, कौम को, रिश्तों को, नदियों-तालाबों को और इंसानों को बांट दिया। ऑफिसों की कॉपी-किताब, मेज-कुर्सी से लेकर टाइपराइटर और पेन-पेंसिल भी बांटे गए। टॉस उछाल कर बग्घियां बंटी। लाखों लोग बेघर हुए। जिंदगियां तबाह हो गईं। दंगे की आड़ में हत्या, रेप और किडनैपिंग भी हुई। ये बंटवारा नहीं था कभी न भरने वाला जख्म था। इस जख्म को दिया गया था एक प्लान के तहत। जिसे कहते है माउंटबेटन प्लान। जिसे कांग्रेस ने इसी तारीख को मंजूरी दी थी। आखिर सदी की सबसे बड़ी त्रासदी बंटवारे क नींव पड़ी कैसे।

साल 1857। ये वो वक्त था जब एक क्रांति की शुरुआत हुई। अंग्रेजों से आजादी की। इस क्रांति से सैकड़ों लोग जुड़े। इन लोगों में सभी धर्मों के लोग थे। चाहे हिंदू हो या मुसलमान।

वक्त गुजरा, साल 1885 में इंडियन नेशनल कांग्रेस की पहली मीटिंग हुई। आजादी की मांग उठी। साथ-साथ सभी धर्मों के लोगों की दशा कैसे सुधरे? इस पर भी जोर दिया गया। लेकिन, वक्त के साथ एक और मुद्दा गहराने लगा। हिंदू और मुसलमान का। जब साल 1905 में बंगाल का विभाजन हुआ तो इसके बाद ही साल 1906 में एक पार्टी बनाई गई जिसका नाम रखा गया ऑल इंडिया मुस्लिम लीग।

मोहम्मद अली जिन्ना, जो लंबे समय से हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए प्रयासरत थे, अचानक भारत में मुसलमानों के लिए चिंतित होने लगे। इसके लिए वो कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराने लगे, जिसके एक वक्त पर वो खुद भी सदस्य थे। उन्होंने कांग्रेस पर देश के मुसलमानों के साथ भेदभाव का आरोप लगाया।

साल 1930 में सर मोहम्मद अल्लामा इकबाल और चौधरी रहमत अली का मानना था कि 'हिंदू बहुल भारत' से अलग मुस्लिम देश बनना बेहद जरूरी है।

इससे पहले दो अलग-अलग देशों का विचार साल 1888 में सर सैयद अहमद खान, साल 1899 में लाला लाजपत राय भी दे चुके थे। साल 1937 में वीर सावरकर पर भी हिंदू महासभा के अध्यक्ष के रूप में अपने पहले भाषण में टू-नेशन थ्योरी का प्रचार करने के आरोप लगे।

साल 1938 में मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग के सदस्यों के साथ मिलकर एक नए मुस्लिम राज्य के गठन के लिए प्रस्ताव तैयार किया। महात्मा गांधी ने मोहम्मद अली जिन्ना से बात की। लेकिन, ये बातचीत को कोई रिजल्ट नहीं निकला।

साल 1940 में मोहम्मद अली जिन्ना ने अलग मुस्लिम मुल्क की मांग रख दी। कई इसके पक्ष में थे तो कई इस विचार से सहमत नहीं थे।

साल 1946 में कैबिनेट में एक प्लान पेश किया गया। इस प्लान में हिंदू और मुस्लिमों को साथ रहने का प्रस्ताव था। लेकिन, मुस्लिम लीग ने इस प्लान से खुद को अलग कर आंदोलन छेड़ दिया। जिसके बाद देश भर में मारकाट शुरू हो गई।

धार्मिक आधार पर अलग देश की मांग के बाद उत्तर भारत और बंगाल के बड़े हिस्से में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दंगे हुए। ऐसा वक्त आ गया जब बंटवारा ही था चारा था। विवाद और बहस के बीच मुस्लिम लीग ने संविधान सभा को भंग करने की मांग की।

24 मार्च 1947 को भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने गवर्नर जनरल के पद की शपथ ली। धर्म के आधार पर दो देश बनाए जाने को लेकर 3 जून 1947 को एक प्रस्ताव पेश किया। माउंटबेटन का कहना था कि भारत की राजनीतिक समस्या का हल करने के लिए आखिरी विकल्प विभाजन ही है।

देश में चारों तरफ दंगों का माहौल था। गृहयुद्ध जैसे हालात थे तो कांग्रेस ने मजबूरी में आकर 15 जून को नई दिल्ली में हुए अधिवेशन में इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश पार्लियामेंट ने भी मोहर लगा दी। 28 दिनों में सिरिल रैडक्लिफ ने दोनों देशों के बीच बंटवारे की लाइन खींची। करीब 1 करोड़ 45 लाख लोग विस्थापित हुए। 10 लाख लोग मारे गए। 15 अगस्त साल 1947 को देश तो आजाद हो गया। लेकिन अंग्रेज कभी न भरने वाला जख्म दे गए। दोनों देशों का ये नफरत का बीज आज एक बड़ा खतरनाक पेड़ बन गया है।

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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