Crude Oil सस्ता होने के बाद भी INDIA में नहीं घट रहे हैं Petrol-Diesel के Price

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अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का भाव 9 महीने में सबसे न्यूनतम स्तर पर लुढ़क गया है... इसके बाद सबकी नजर भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम पर लगी है कि आखिर इनमें कब कमी आएगी? कच्चे तेल की कीमतों के बारे में जिनमें सबसे प्रमुख ब्रेंट क्रूड के दाम  76.10   प्रति बैरल पर पहुंच गया।

आपकी गाड़ियों में जलने वाला तेल,विदेशी भाव में ठंडा पड़ रहा। ठंडा पड़ने का मतलब क्रूड ऑयल सस्ता हो रहा है। क्योंकि पेट्रोल और डीजल दोनों कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल से तैयार होते हैं। इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल में लगातार गिरावट जारी है। कच्चे तेल को बैरल के रूप में मापा जाता है। मार्च के महीने में क्रूड ऑयल के दाम आसमान पर पहुंच गए थे. ब्रेंट क्रूड ऑयल के दाम 140 डॉलर प्रति बैरल था। तो वहीं अमेरिकी क्रूड ऑयल के दाम 131 डॉलर प्रति बैरल के साथ रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच चुके थे लेकिन 9 महीने बाद ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी क्रूड ऑयल में काफी गिरावट आई। ब्रेंट क्रूड ऑयल के दाम  76.10 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी क्रूड ऑयल के दाम 71.02 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। इसका मतलब है कि दोनों क्रूड ऑयल में अब तक 46 फीसदी की गिरावट देखने को मिल चुकी है।

तेल के इसी खेल को अब लीटर में समझते हैं एक बैरल 159 लीटर का होता और ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 76.10 यानी है यानी 6 हजार 279.77 रुपये है। अब इसे प्रति लीटर के हिसाब से कैलकुलेट करें। तो ये 1 लीटर 39.45 रुपये प्रति लीटर पड़ेगा। इसी तरह अमेरिकी क्रूड ऑयल का भी ऐसा ही कैलकुलेशन ये कच्चा तेल 36.89 रुपये प्रति लीटर पड़ेगा।

लेकिन अभी ऑयल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल की कीमत, एक्सचेंज रेट, टैक्स, पेट्रोल-डीजल के ट्रांसपोर्टेशन का खर्च और बाकी कई चीजों को ध्यान में रखते हुए रोजाना पेट्रोल-डीजल की कीमत निर्धारित करती हैं। जिसके बाद भी भारतीय तेल कंपनियों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इंडियन ऑयल कॉरपोरशन , भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड को अप्रैल-सितंबर के दौरान संयुक्त रूप से 21 हजार 201.18 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ है।

दिल्ली में इस वक्त 96.72 रुपये में पेट्रोल और 89.62 रुपये में डीजल बिक रहा है। लेकिन इनके बेस प्राइस बहुत कम होते हैं। टैक्स और एक्साइट ड्यूटी और डीलर कमीशन और वैट लगने के बाद तेल के प्राइस बढ़ जाते हैं ।

पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कमी का सटीक अंदाजा तो लगाना मुश्किल है लेकिन इतना जरूर है कि अगर अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में तेल मार्केटिंग कंपनियां अपने नुकसान को पूरा कर लेती हैं और जनवरी-मार्च तिमाही में भी कच्चे तेल की कीमतों में कमी रहती है तो फिर मुमकिन है ये अपनी गुंजाइश के कुछ हिस्से को ग्राहकों तक पहुंचा सकती हैं। किन यहां पर भी ये देखना होगा कि अगर दाम फिर से बढ़ने लगे तब तेल कंपनियां ऐसा कोई फैसला नहीं करेंगी।

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