R. D. Burman : जब दुनिया से जाते-जाते बना गए एक यादगार धुन

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साल 1993 में रिलीज हुई फिल्म '1942 ए लव स्टोरी' के डायरेक्टर विधु विनोद चोपड़ा फिल्म का म्यूजिक 'पंचम दा' से बनवाना चाहते थे। पर म्यूजिक कंपनी ने मना कर दिया। कहा – 'पंचम का म्यूजिक नहीं चाहिए। उनका दौर खत्म हो चुका है।'

जिसने 40 साल के करियर में 300 से ज्यादा फिल्मों में म्यूजिक देकर इंडस्ट्री पर राज किया। जिनके गानों की वजह से फिल्में सुपरहिट हो जाती थीं। जिसने अपने आपको म्यूजिक का बादशाह साबित किया। उस पंचम का दौर खत्म हो चुका था। जिंदगी के आखिरी दिनों में हताश थे। आंखों में आंसू थे। उसका ताज छिन गया था। लेकिन हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने एक ऐसी धुन बनाई जिसके बाद लोगों को कहना ही पड़ा – 'पंचम जैसा कोई भी नहीं हो सकता'। पर ये बात जब तक वो सुन पाते। तब तक वो दुनिया छोड़ चुके थे।

आज कहानी राहुल देव बर्मन यानी आरडी बर्मन की। जिन्हें हम सभी प्यार से पंचम दा कहते हैं। जिन्हें इंडस्ट्री में अपने पैर जमाने और पहचान बनाने के लिए 10 साल लगे

अपने दौर के दिग्गज म्यूजिक डायरेक्टर एसडी बर्मन अपनी पत्नी मीरा के साथ कोलकाता में रहते थे। 27 जून साल 1939 को एक बेटे का जन्म हुआ। पिता प्यार से तुबलू कहते। वहीं छोटी उम्र में एक बार जब एक्टर अशोक कुमार ने रोते हुए सुना तो कहा की ये तो बच्चा रोता भी पंचम सुर में है। तब से इनका नाम पड़ गया पंचम। बालीगंज गवर्नमेंट हाई स्कूल कोलकाता से शुरुआती पढ़ाई की। एक दिन पंचम ने पिता एसडी बर्मन से कहा – 'मेरा पढ़ाई में मन नहीं लगता। मुझे, आपकी तरह ही म्यूजिक डायरेक्टर बनना है।'

पिताजी से म्यूजिक के दाव पेंच सीखने लगे साथ में उस्ताद अली अकबर खान से सरोद भी सीखा। पंचम बचपन से ही बहुत अलग थे। नौ साल की उम्र में पिताजी को खुद की बनाई हुई नौ-दस धुनें सुनाई। इन धुनों को एसडी बर्मन ने साल 1956 की फिल्म 'फंटूशके गाने 'ए मेरी टोपी पलट के आ' और साल 1957 की 'प्यासा' के गाने 'सर जो तेरा चकराए' इस्तेमाल की। पंचम ने कहा – 'पिताजी आप ने मेरी धुन चुराई है।' एसडी बोले - 'मैं तो ये देख रहा था तुम्हारी धुने लोगों को पसंद आती है कि नहीं।'

पंचम अपने पिता जी के साथ बतौर असिस्टेंट म्यूजिक डायरेक्टर करियर शुरू किया। इस दौरान साल 1963 की 'बंदिनी', 1965 की 'तीन देविया' और साल 1965 की 'गाइड' जैसी फिल्मों के लिए म्यूजिक दिया।

इंडस्ट्री में कई लोगों को मौका दे चुके कॉमेडियन महमूद ने जब पंचम से मुलाकात की वो उनसे प्रभावित हुए। उन्होंने पंचम को दो फिल्मों में बतौर म्यूजिक डायरेक्टर साइन किया। पहली फिल्म थी साल 1961 की 'छोटे नवाब' जिससे कुछ खास पहचान नहीं बनी। दूसरी फिल्म थी साल 1965 में रिलीज हुई 'भूत बंगला'। जिसका एक गाना 'आओ ट्विस्ट करें' बेहद पॉप्युलर हुआ। इस फिल्म के बाद पंचम दा को कुछ लोग जानने लगे।

एक फेमस म्यूजिक डायरेक्टर का बेटा होने के बावजूद पंचम को अपना वजूद तलाशते और इंडस्ट्री में पैर जमाने के लिए दस साल संघर्ष करना पड़ा। फिर वो वक्त आया जिसका उनको इंतजार था। साल था 1966 और फिल्म थी 'तीसरी मंजिल'। इस फिल्म के बाद पंचम शोहरत की बुलंदियों पर जा पहुंचे।

70 के दशक में 'सीता और गीता', 'मेरे जीवन साथी', 'बॉम्बे टू गोआ', 'परिचय', और 'जवानी' 'दीवानी', 'शोले', 'आंधी', 'दीवार', 'खुशबू' जैसी कई फिल्मों के बाद पंचम का गोल्डन पीरियड आ गया। उनके लाखों फैन हो गए।

ऐसे ही उनकी एक फैन थी रीता पटेल। जिन्होंने दोस्तों से शर्त लगाई कि वो पंचम के साथ डेट पर जाकर दिखाएगी। वो शर्त जीत भी गई। पंचम भी उनसे मिलकर इंप्रेस हुए और साल 1966 में दोनों की शादी हो गई। लेकिन ये शादी सिर्फ पांच साल चली। साल 1971 में दोनों का तलाक हो गया। फिर पंचम की जिंदगी में उसने उम्र में नौ साल बड़ी आशा भोसले आईं। दोनों की पहली मुलाकात साल 1956 में हुई थी। इस मुलाकात के दस साल बाद साल 1966 की फिल्म 'तीसरी मंजिल' में दोनों ने एक साथ काम किया। इसी फिल्म से पंचम को पहचान मिली और आशा भी।

'आरडी बर्मन' : द मैन द म्यूजिक - किताब में अनुराधा भट्टाचार्या और बाला जी विठ्ठल लिखते हैं कि पंचम और आशा दोनों की पहली शादी हो चुकी थी। और उनकी शादी शुदा जिंदगी में उथल-पुथल मची थी। आशा बच्चों के साथ अलग रह रहीं थी। पंचम भी अपना घर छोड़ चुके थे। म्यूजिक दोनों को करीब ला रहा था। ये दोस्ती गहरी होती चली गई। आखिर एक दिन पंचम ने आशा को प्रपोज कर दिया। लेकिन इसमें 24 सालों का लंबा वक्त लगा। साल 1956 में अपनी पहली मुलाकात के बाद दोनों ने साल 1980 में जाकर शादी की।

वजह थी की पंचम अपनी फैमिली के खिलाफ जाकर शादी नहीं करना चाहते थे। पंचम ने 18 फिल्मों में गाने भी गाए हैं। दो फिल्मों में एक्टिंग भी की। पंचम वेस्टर्न म्यूजिक का यूज करते थे। इसके लिए उनकी आलोचना भी होती। जैसे हर सूरज की रोशनी हल्की हो जाती है। वैसे पंचम की धमक कम होने लगी। 80 के दशक में बप्पी लहरी, लक्ष्मीकांत प्यारे लाल जैसे नए म्यूजिक डायरेक्टर ने उन्हें पीछे छोड़ दिया। पंचम के म्यूजिक से सजी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप होने लगी। तो मेकर्स ने काम देना बंद कर दिया।

साल 1993 में रिलीज हुई फिल्म '1942 ए लवस्टोरी' के गाने 'कुछ न कहो' गाने के लिए पंचम ने एक धुन बनाई जो डायरेक्टर विधु विनोद चोपड़ा को पसंद नहीं आई। पंचम ने सोचा शायद ये फिल्म भी उनके हाथ से चली जाएगी। पंचम की आंखों में आंसू थे। विधु विनोद ने कहा 'आप वक्त ले लिजिए पर ऐसी धुन बनाएये जो सिर्फ आप ही बना सकते हों।' पंचम ने फिर से संगीत बनाया। और '1942 अ लव स्टोरी' बॉलीवुड की सबसे बड़ी म्यूजिकल हिट्स में से एक साबित हुई। उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड मिला। लेकिन वो इसे ले नहीं पाए। चार जनवरी साल 1994 को पंचम का 55 साल की उम्र में निधन हो गया। वो अपनी 'आखिरी सफलता' देखने से पहले ही दुनिया से विदा हो चुके थे। तब लिरसिस्ट जावेद अख्तर ने कहा था 'हमने पंचम जैसे जीनियस की आखिरी दिनों कद्र नहीं की'

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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