एक गंभीर बीमारी हुई तो राही मासूम रजा को लगा किताबें पढ़ने का शौक

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बीआर चोपड़ा के घर ढेर सारी चिट्ठियां आती है जिनमें लिखा होता है कि 'सारे हिंदू मर गए हैं, जो आप एक मुसलमान से महाभारत लिखवा रहे हैं।'

इसके जवाब में वो मुसलमान राइटर लिखते हैं कि

'मेरा नाम मुसलमानों जैसा है, कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो, लेकिन मेरी रग-रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है’

आज किस्सा हिन्दी और उर्दू भाषा के फेमस राइटर राही मासूम रजा का।

साल 1988, इससे पहले लोगों ने महाभारत की कहानी सुनी जरूर थी, लेकिन राही मासूम रजा ने उसे देश के हर घर में पहुंचा दिया। लोग अपना सारा काम छोड़कर टीवी के सामने बैठ जाते थे और महाभारत देखते थे। राही मासूम रजा ने दूरदर्शन में घर-घर देखे जाने वाले महाभारत सीरियल का स्क्रीनप्ले और उसकी कहानी लिखी थी। महाभारत की कहानी लिखने में उनका साथ सत्यम शिवम सुंदरम गाना लिखने वाले साहित्यकार पंडित नरेंद्र शर्मा ने भी दिया था।

शुरू में जब महाभारत के प्रोड्यूसर बीआर चोपड़ा ने राही मासूम रजा के सामने महाभारत लिखने का प्रस्ताव रखा तो पहले उन्होंने मना कर दिया। लेकिन ये बात किसी तरह से मीडिया में आ गई। 

राही मासूम रजा के सबसे करीबी दोस्त कुंवर पाल सिंह लिखते हैं कि

"जब बीआर चोपड़ा ने घोषणा की कि राही मासूम रजा महाभारत का स्क्रीनप्ले लिखेंगे, तो बीआर चोपड़ा के पास लोगों की चिट्ठियों की झड़ी लग गई, जिनका लब्बोलुबाब था कि, सारे हिंदू मर गए हैं, जो आप एक मुसलमान से महाभारत लिखवा रहे हैं। चोपड़ा साहब ने सभी पत्र राही के पास भेज दिए। वे जानते थे की राही की ये कमजोर नस थी"

कुंवरपाल सिंह लिखते है कि

'राही साहब! भारतीय संस्कृति और सभ्यता को बहुत बड़े मानने वाले थे। बीआर चोपड़ा के भेजे गए जब सभी पत्र राही साहब ने पढ़े तो अगले दिन उन्होंने बी आर चोपड़ा को फोन किया, और कहा 'चोपड़ा साहब! महाभारत अब मैं ही लिखूंगा। मैं गंगा का बेटा हूं। मुझसे ज़्यादा हिंदुस्तान की संस्कृति और सभ्यता को कौन जानता है?'

राही मासूम रजा का जन्म एक अगस्त साल 1927 को गाजीपुर के गंगोली गांव में हुआ था। वे जमींदार खानदान से ताल्लुक रखते थे। 11 साल की उम्र में उन्हें टीबी हो गई उस ज़माने में टीबी का कोई इलाज नहीं था। बीमारी के बीच उन्होंने घर में रखी ढेर सारी किताबें पढ़ डालीं। 60 के दशक में राही मासूम रज़ा सबसे पहले उपन्यास ‘आधा गांव’ के लेखन के लिए जाने गए। बॉलीवुड में अपनी किस्मत आजमाने के लिए साल 1967 में मुंबई चले गए और 70 के दशक में उन्होंने कई हिट फिल्में के लिए काम किया। साल 1975 में रिलीज हुई फिल्म मिली, साल 1978 की मैं तुलसी तेरे आंगन की, 1979 की गोलमाल, 1980 की कर्ज और 1991 की लम्हे जैसी फिल्मों के लिए डायलॉग और स्क्रीनप्ले लिखा।

15 मार्च, साल 1992 में दुनिया से अलविदा कहने वाले राही मासूम रजा ये लाइनें दुनिया और इंसानी हालातों पर बिल्कुल सटीक बैठती है वे लिखते हैं कि

‘हां उन्हीं लोगों से दुनिया में शिकायत है हमें,

हां वही लोग जो अक्सर हमें याद आए हैं’।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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