राजस्थान में चुनावी अभियान तेज, कौन सी जाति किसके साथ?

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राजस्थान में इस साल के आखिर तक चुनाव होने हैं। ऐसे में राज्य के दोनों प्रमुख दल चुनाव की तैयारियों में जुटे हुए हैं। कांग्रेस जहां एक बार फिर से सरकार बनाने के दावे कर रही है तो वहीं बीजेपी दमखम दिखाने में जुटी है। हालांकि विधानसभा चुनाव में कास्ट फैक्टर को लेकर भी दोनों पार्टियां बेहद सतर्क हैं। यूपी-बिहार की तरह राजस्थान चुनाव में भी जातीय कार्ड बेहद अहम रोल अदा करते हैं। मूलरूप से यहां जाट, गुर्जर, मीणा और ब्राह्म्ण जातियों से आए नेताओं का प्रभाव सियासत में ज्यादा दिखता है। ऐसे में राजस्थान की सियासत में इस बार कास्ट फैक्टर कितना अहम होगा ये जानना बेहद जरूरी है।

माली समाज से ताल्लुक रखने वाले सीएम अशोक गहलोत 5 बार विधायक रह चुके हैं। पांच बार लोक सभा सांसद भी रह चुके हैं। राजस्थान के मुख्यमंत्री के तौर पर वो अपना तीसरा कार्यकाल पूरा करने वाले हैं। वहीं 5 बार विधायक और 2 बार मुख्यमंत्री बनने वाली वसुंधरा राजे भी इस जातिगत समीकरण का फायदा ले चुकी हैं। हालांकि इस बार पूर्व सीएम वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री पद की दावेदार होंगी ये अभी कहा नहीं जा सकता है। गुर्जर समाज की ओर से किए गए आरक्षण आंदोलन का असर देश में भी दिखा था। ऐसे में राजस्थान के विधानसभा चुनाव में भी जाट, राजपूत, गुर्जर और मीणा समाज जिसे भी वोट करता है उसका जीतना तय माना जाता है। क्योंकि इन जातियों की प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका रहती है। अब एक नजर डाल लेते हैं राजस्थान की विधानसभा सीटों पर, तो यहां पर कुल 200 विधानसभा सीटें हैं। इनमें 142 सीट सामान्य, 33 सीट अनुसूचित जाति और 25 सीट अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं।

राजस्थान का जातीय समीकरण

राजस्थान में कुल 272 जातियां हैं। इनमें 51 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग (इसमें 91 जातियां हैं, जिनमें  जाट 9 प्रतिशत, गुर्जर 5 प्रतिशत, माली 4 प्रतिशत, मुस्लिम 9 प्रतिशत, एसटी 13 प्रतिशत (मीणा 7 प्रतिशत), ओबीसी 40 प्रतिशत, एससी 18 प्रतिशत, सवर्ण 19 प्रतिशत, ब्राह्मण 7 प्रतिशत, राजपूत 6 प्रतिशत, वैश्य 4 प्रतिशत, माली 4 प्रतिशत, अन्य 2 प्रतिशत हैं। जाट वास्तव में राजस्थान में सबसे बड़ा जाति समूह हैं। राजस्थान के उत्तरी हिस्से में मारवाड़ का कुछ हिस्सा और शेखावाटी क्षेत्र जाट बहुल है। राजस्थान की विधानसभा में 15 फीसदी से ज्यादा सीटों पर जाट समाज का कब्जा रहता है। इस बार भी 33 विधायक जाट समाज से चुने गए हैं। 5 विधायकों को मंत्री बनाया गया, जबकि पिछले चुनाव में प्रदेश में 31 जाट नेता विधायक चुने गए थे।

जातीय समीकरण और उनका महत्व

जाटों के बाद 6 प्रतिशत आबादी वाले राजपूत हैं, जिनके पास 17 सीटें हैं। इसके बाद नंबर आता है गुर्जर समुदाय का, जिसका पूर्वी राजस्थान की करीब 35-40 सीटों पर दबदबा देखा गया है। गुर्जर समाज के लोगों को बीजेपी का वोटर माना जाता रहा है, लेकिन पिछले चुनाव में उन्होंने अपने समुदाय के नेता सचिन पायलट के प्रति वफादारी दिखाते हुए कांग्रेस को वोट किया था, लेकिन ये समाज चौंक गया था जब कांग्रेस ने पायलट की जगह गहलोत को सीएम पद दे दिया था। इसलिए इस बार के चुनाव में लाख टके का सवाल है कि आखिर अबकि बार गुर्जर वोट कहां देंगे? क्योंकि उनके नेता सचिन पायलट को 2018 के चुनावों का चेहरा होने के बावजूद मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया था। इसलिए समुदाय अपने को ठगा हुआ महसूस करता है, जबकि गुर्जर वोटर्स का जयपुर, अजमेर, सवाई माधोपुर, भीलवाड़ा, कोटा, टोक, बूंदी, झालावाड, चितौड़गढ़, राजसमंद, करौली, दौसा, झुंझुनूं, अलवर और भरतपुर जिलों की करीब 40 सीटों पर प्रभाव है।

कहां-कहां कौन सी जातियां हावी

वहीं मीणाओं को कांग्रेस समर्थक माना जाता है, लेकिन उन्होंने अपने समुदाय के बड़े नेता किरोड़ीलाल मीणा को 2018 में नकार कर सबको चौंका दिया था, जो राज्य में सबसे बड़े आदिवासी नेता होने का दावा करते हैं। पिछले चुनाव में 18 मीणा विधायक चुने गये थे। इनमें से नौ कांग्रेस, पांच बीजेपी और तीन निर्दलीय हैं। मीणाओं ने अपने नेता किरोड़ीलाल मीणा के बीजेपी में वापसी के बावजूद कांग्रेस का समर्थन जारी रखा। राजनीतिक जानकारों का कहना है, समुदाय ने उम्मीदवार को देखे बिना कांग्रेस का समर्थन किया, क्योंकि बीजेपी सरकार में उनकी बात नहीं सुनी गई थी। अब सबकी नजरें विधानसभा चुनाव 2023 पर टिकी हैं।

 सचिन पायलट का चेहरा बेहद दमदार

अगला जाट समुदाय है जो राजस्थान में फिर से महत्वपूर्ण है, जहां कांग्रेस के पास पीसीसी अध्यक्ष के रूप में गोविंद सिंह डोटासरा प्रमुख जाट चेहरा हैं तो बीजेपी के पास सतीश पूनिया हैं, जो विपक्ष के उप नेता हैं। हालांकि इन सबके बीच पायलट का चेहरा बेहद दमदार है। कुल मिलाकर जाट, राजपूत, गुर्जर और मीणा समाज को साधना दोनों दलों के लिए बड़ी चुनौती होगी। इनका 2018 के विधानसभा चुनाव में मिला-जुला असर रहा, जिसमें बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा और कांग्रेस पांच साल बाद सत्ता में लौटी।

वैसे ये तो समय और वक्त ही बताएगा कि कांग्रेस अशोक गहलोत के लिए पायलट को कैसे साधती है और बीजेपी वसुंधरा राजे को किस रूप में चुनावी समर में उतारती है। एक छोटी सी चूक सूबे में बड़े फेरबदल का सबब बन सकती है। कांग्रेस- बीजेपी या कोई और जिसकी सोशल इंजीनियरिंग में दम होगा जीत उसके हाथ लगेगी।

पिछले 10 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं। वैश्विक और राजनीतिक के साथ-साथ ऐसी खबरें लिखने का शौक है जो व्यक्ति के जीवन पर सीधा असर डाल सकती हैं। वहीं लोगों को ‘ज्ञान’ देने से बचता हूं।

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