Rajiv Gandhi Assassination : जब पहली बार हुआ मानव बम का इस्तेमाल

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वो तारीख थी 21 मईसाल 1991। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक चुनावी रैली कर रहे थे। घड़ी रात 10 बजकर 21 मिनट का वक्त बता रही थी। मंच पर पहुंचने से ठीक पहले राजीव गांधी के पास एक 30 साल की महिला उन्हें चंदन का हार पहनाने के लिए आती है। सिक्योरिटी महिला को रोकती है। लेकिन, राजीव गांधी ने महिला को आने की इजाजत दे दी। फिर वो महिला राजीव गांधी के पैर छूने के लिए जैसे ही झुकी तभी एक धमाका हुआ। पूरा देश इस खबर से हिल गया कि, राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। आखिर क्यों और कैसे रची गई राजीव गांधी की हत्या की साजिश और 31 साल बाद आए फैसले के बाद उनके हत्यारों को क्या सजा मिली।

साल 1990। भारत से तकरीबन 2500 किलोमीटर की दूरी पर श्री लंका के जाफना के घने जंगलों के बीच एक आतंकी ठिकाने में लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण बैठा था। साथ बैठे थे उसके चार साथी। कई घंटों से एक बड़ी साजिश रचने के लिए एक बैठक चल रही थी। तनाव इतना था कि हवा भी बम की आवाज की तरह लग रही थी। उमस और गर्मी के बीच प्रभाकरण ने राजीव गांधी की मौत के प्लान पर मुहर लगा दी। प्लान को पूरा करने की जिम्मेदारी चार लोगों को सौंपी गई।

पहला नाम था बेबी सुब्रह्मण्यम को जो एक लिट्टे विचारक थाहमलावरों के लिए ठिकाने का जुगाड़ करना इसकी जिम्मेदारी थी। दूसरा मुथुराजा ये प्रभाकरण का खास थाहमलावरों के लिए कम्यूनिकेशन और पैसे की जिम्मेदारी इनके पास थी।

तीसरा मुरुगन जो बम बनाने में एक्पर्ट थाहमले के लिए जरूरी चीजों और पैसों का इंतजाम करने की जिम्मेदारी इसी के पास थी। और चौथा शिवरासन लिट्टे का जासूसये भी बम बनाने में माहिर था। और राजीव गांधी की हत्या के पूरे प्लान की जिम्मेदारी इसी पर ही थी।

साल 1991 की शुरूआत में सबसे पहले बेबी सुब्रह्मण्यम और मुथुराजा चेन्नई पहुंचे। बेबी और मुथुराज को चेन्नई में ऐसे लोग तैयार करने थे जो मकसद से अंजान होते हुए भी इस प्लान में इकी मदद करें। ये दोनों शुभा न्यूज फोटो एजेंसी के मालिक शुभा सुब्रमण्यम के पास पहुंचे। शुभा पर जिम्मेदारी थी कि बेबी और मुथुराज को लोकल सपोर्ट मुहैया करा सकें।

यहां पर बेबी ने शुभा न्यूज फोटो एजेंसी में काम करने वाले भाग्यनाथन और उसकी बहन निलिनी को घर खरीदने में मदद कर अपने चंगुल में फंसाया। उधरमुथुराजा ने भी इसी न्यूज फोटो एजेंसी से दो फोटोग्राफर रविशंकरन और हरिबाबू को चुना। मुथुराजा ने दोनों की आर्थिक मदद की।

लेखक मिन्हाज मर्चेंट की किताब 'राजीव गांधी- एंड ऑफ ए ड्रीमके मुताबिक, इन सभी को राजीव गांधी के खिलाफ खूब भड़काया गयाकि अगर राजीव गांधी साल 1991 के लोकसभा चुनाव में जीत कर सत्ता में वापस आए तो तमिलों के हालात और भी बदत्तर हो जाएंगे।

इसी बीच श्रीलंका में बैठे मुरूगन ने जय कुमारन और रॉबर्ट पायस नाम के दो लोगों को चेन्नई भेजा। इनका काम था कि इलेक्ट्रॉनिक एक्सपर्ट अरीवेयू पेरूलीबालन को साजिश में शामिल करना। आगे चलकर अरीवेयू का ही घर हत्याकांड के प्लान का हेडक्वार्टर भी बना। अब प्लान में मुरूगन की एंट्री होती है। मुरूगनमुथुराजा और बेबी ने मिलकर चेन्नई में छिपने के तीन ठिकाने खोज लिए थे। सबसे अखिरी में शिवरासन समुद्र के रास्ते चेन्नई आता है। एक ऐसी महिला की तलाश करने जो मानव बम बन सके। पर वो नहीं मिली। जब ये खबर प्रभाकरण को मिली तो शिवरासन की चचेरी बहनें धनू और शुभा को चेन्नई लाया गया। धनू और शुभा के रूप में मानव बम मिल चुके थे। शिवरासन के कहने पर बम एक्सपर्ट अरीवेयू ने एक ऐसा बम बनाया जिसको धनू और शुभा अपने कमर में बांध सके। इस बम को ऐसा बनाया गया था कि आरडीएक्स चाहे जितना कम हो अगर धमाका हो तो टारगेट बच न सके।

अब शिवरासन के हाथ में बम भी था और बम को अंजाम तक पहुंचाने वाली मानवबम धनू और शुभा भी। इतंजार था तो बस राजीव गांधी का। 

अनिरुद्ध मित्रा की किताब 'नाइनटी डेज़द ट्रू स्टोरी ऑफ द हंट फॉर राजीव गांधीज असैसिनके मुताबिक, लोकसभा चुनाव का दौर था राजीव गांधी की मीटिंग 21 मई 1991 को श्रीपेरंबदूर में तय हो गई। और सजिश रचने वालों ने तय कर लिया कि 21 को ही साजिश पूरी करनी है। श्रीपेरंबदूर में रैली की गहमागहमी थी। बार-बार ऐलान हो रहा था कि राजीव किसी भी वक्त रैली के लिए पहुंच सकते हैं। पिछले छह महीने से रची जा रही साजिश अपने अंजाम के करीब थी। एक महिला को सब इंस्पेक्टर ने राजीव गांधी से दूर रहने को कहा पर राजीव गांधी ने उसे रोकते हुए कहा कि सबको पास आने का मौका मिलना चाहिए। उन्हें नहीं पता था कि वो जनता को नहीं मौत को पास बुला रहे हैं। धनू ने माला पहनाईपैर छूने के लिए झुकी और बस साजिश पूरी हो गई। जिसमें राजीव गांधी के साथ 20 मासूम लोगों की मौत हो गई। इसके बाद शुभा ने साइनाइड चाट कर जान देदी और शिवरासन ने खुद को गोली मार ली।  

जांच के बाद पता चला कि राजीव गांधी की हत्या के पीछे लिट्टे LTTE यानी Liberation Tigers of Tamil Eelam का हाथ था। जो एक तमिल मिलीटेंट ग्रुप था। और श्रीलंका में तमिल्स के राइट्स के लिए लड़ रहा था। ये संगठन इतना ताकतवर था कि श्रीलंकाई सरकार इसके सामने बेबस थी। यहां तक कि श्रीलंका से एक शांति समझौता करने से पहले राजीव गांधी ने भी LTTE के प्रमुख प्रभाकरण से बात की थी। बीच में कुछ घटनाएं ऐसी हुईं कि राजीव गांधी को LTTE के खिलाफ कुछ एक्शन लेने पड़े। राजीव गांधी LTTE के खिलाफ इतना सख्त हो गए थे कि प्रभाकरण राजीव गांधी को भारत का फिर से प्रधानमंत्री नहीं बनने देना चाह रहा था। इस संगठन को उनसे खतरा महसूस होने लगा थाजिसकी वजह से LTTE ने राजीव गांधी की हत्या को अंजाम दिया।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, राजीव गांधी के कत्ल के बाद जांच शुरू हुई तो 41 लोगों को आरोपी बनाया गया जिनमें से 12 की मौत हो चुकी थी। तीन लोग फरार हो गए। बाकी 26 आरोपियों लोगों को पकड़ा गया उन पर टाडा कोर्ट पर मुकदमा चलाया गया। सात साल सुनवाई के बाद साल 1998 को फैसला आया जिसमें 26 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने एक साल सुनवाई के बाद फैसला सुनाया और फांसी की सजा मिलने वाले 26 लोगों में से 19 को बरी कर दिया। बाकी बचे सात लोगों की फांसी की सजा बरकरार रखी। साल 2014 में उन सात लोगों की फांसी की सजा भी बदल कर उम्रकैद कर दी गई। 31 साल से ज्यादा वक्त तक जेल में बिताने के बाद एक दयायाचिका की सुनवाई करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने साल 2022 में सातों आरोपियों को भी जेल से रिहा कर दिया।

वहीं साल 2009 में प्रभाकरण की मौत होने के बाद से लिट्टे संगठन खत्म हो गया था। मिडिया रिपोर्ट के मुताबिक, उसकी मौत की वजह सिर में कोई भारी चीज लगना बताया गया था।  

राजीव गांधी की जब हत्या की गई उस दिन उस चुनावी रैली में उनके सम्मान में एक गीत गाया जा रहा था - “राजीव का जीवन हमारा जीवन हैअगर वो जीवन इंदिरा गांधी के बेटे को समर्पित नहींतो वो किस काम का।”

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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