Rat Hole Mining, जिसके चलते बची Tunnel में फंसे 41 मजदूरों की जान

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रैट माइनर्स, जो टनल रेस्‍क्‍यू म‍िशन के 'असली हीरो' हैं. जिनके हौसलें को आज पूरी दुनिया सलाम कर रही है. जिन्होंने छोटे-संकरे पाइप में बैठ रास्ता बनाया ताकि टनल में फंसे मजदूर बाहर आ सके. रिपोर्ट्स की मानें तो रैट माइनर्स ने मशीन से ज्यादा तेजी से खुदाई मैनुअली ही कर डाली. दरअसल रविवार यानी 26 नवंबर को टनल में फंसे 41 वर्कर्स को बचाने के लिए साइट पर 6 'रैट होल' माइनर्स की एंट्री हुई थी. इन रैट माइनर्स को प्राइवेट कंपनी ट्रेंचलेस इंजिनियरिंग सर्विसेज की ओर से बुलाया गया था. ये दिल्‍ली समेत कई राज्यों में वाटर पाइपलाइन बिछाने के समय अपनी टनलिंग क्षमता का प्रदर्शन कर चुके हैं. उत्‍तरकाशी में इनके काम करने का तरीका 'रैट होल' माइनिंग से अलग था. इस काम के लिए केवल वही लोग बुलाए गए थे जो टनलिंग में माहिर हैं. यहां पर 6 लोगों की ये टीम ड्रिल मशीनों के साथ पहुंची. इन्‍हीं की मदद से मलबे की खुदाई कर रास्ता बनाया गया. जिसके जरिए मजदूर बाहर आ सके. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर जो प्रैक्टिस देश में बैन हो चुकी है. वो कैसे  17 दिनों से सुरंग में फंसे 41 मजदूरों के लिए  वरदान साबित हुई और ये भी समझते हैं कि आखिर रैट होल माइनिंग क्या है.

क्या है रैट होल माइनिंग प्रोसेस ?

रैट होल माइनिंग में खुदाई करने वाले मजदूर कोयला या खनिज निकालने के लिए संकरे बिलों के जरिए अंदर जाते थे. जैसा कि नाम से समझ आता है, ये तकनीक चूहों के बिल खोदने की तरह काम करती है. इसमें माइनिंग करने वाले लोग चार फीट खुदाई करके ऐसे गड्ढों में घुसते, जहां एक इंसान के ही जाने की जगह हो. जैसे-जैसे गड्ढा गहरा होता, वे बांस की सीढ़ी और रस्सियों के सहारे नीचे जाते और फिर कोयला जमा करते.

रैट होल माइनिंग के दो तरीके भी होते थे रिपोर्ट्स की मानें तो रैट होल माइनिंग के भी दो तरीके थे साइड कटिंग मैथड में श्रमिक पहाड़ी ढलानों में सुरंगों की खुदाई करते, जब तक कि अंदर उन्हें कोयले की परत न मिल जाए. मेघालय की पहाड़ियों में ये 2 मीटर जितनी दूरी पर हो जाता था. दूसरा तरीका ज्यादा मेहनत वाला, और उतना ही खतरनाक भी था, जिसमें वर्टिकली खुदाई होती. चूंकि सुरंगों का साइज छोटा होता था, तो इसमें जाने के लिए कई बार महिलाओं, यहां तक कि छोटे बच्चों को काम पर लगा दिया जाता. वे घुटनों के बल भीतर रेंगकर कोयला निकालने का काम करते. इसके खतरों को देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी NGT  ने इस प्रैक्टिस पर पाबंदी लगा दी. अब कोई भी वैध माइन इस तरह का काम नहीं कर सकती थी. NGT ने साफ कह दिया कि ये तरीका न तो प्रैक्टिकल है, और न ही सेफ. मेघालय में इस तरीके से ज्यादा माइनिंग हुआ करती थी. लेकिन जल्द ही इसके खतरे सामने आए. माइनर्स बिना किसी सेफ्टी उपकरण के नीचे उतर जाते. अगर बारिश का मौसम हो तो गड्ढों में पानी भर जाता और श्रमिक फंस जाते थे.

पानी में फंसकर हुई मौतें

रैट माइनिंग तब भी चलती रही और बहुतों की मौत हुई. साल 2018 में इसी वजह से 15 श्रमिक गड्ढों में फंस गए. तब दो महीने चले रेस्क्यू अभियान में दो मृत श्रमिक ही मिल सके. साल 2022 में मेघालय हाई कोर्ट ने जांच में पाया कि रैट होल माइनिंग अब भी जारी है.

क्यों पड़ी उत्तरकाशी के सिलक्यारा में जरूरत ?

आखिर क्यों पड़ी उत्तरकाशी के सिलक्यारा में इसकी जरूरत, ये भी समझते है. दरअसल उत्तरकाशी की सुरंग के भीतर मशीन के पार्ट्स टूट या फंस रहे थे. बारिश का भी डर है. अगर एक बार सुरंग में पानी भरने लगा तो वापसी का रास्ता आसान नहीं होगा. मजदूर भीतर से सिरदर्द और उल्टियों की शिकायत भी करने लगे, जो ऑक्सीजन कम होने का संकेत है. यही वजह है कि इसके लिए रैट माइनिंग को भी आजमाने का फैसला लिया गया.

किस तरह किया रैट माइनर्स ने काम ?

इसमें काम 3 चरणों में हो रहा था. एक व्यक्ति खुदाई करता, दूसरा मलबा जमा करता, और तीसरा उसे बाहर करता. बेहद मेहनत और जोखिम वाले इस काम में खतरे को कम करने के लिए बहुत से इंतजाम भी किए गए. ऑक्सीजन के लिए ब्लोअर लगाया गया ताकि कड़ी मेहनत कर रहे मजदूरों को सांस की परेशानी न हो

जहां एक ओर टनल के अंदर रैट माइनर्स रास्‍ता बना रहे थे तो वहीं बाहर टनल में फंसे मजदूरों के परिजन बाहर डेरा डाले थे. जिस तरह एक-एक दिन निकलता जा रहा था, वे सुबह-शाम उनकी सलामती की ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे. गंगा घाटी के भंडार स्यूं पट्टी, दसगी पट्टी, बिष्ट पट्टी, यमुना घाटी के मुगरसंती, बड़कोट पट्टी के आराध्य देव बाबा बौखनाग हैं. इसलिए टनल के ऊपरी हिस्से पर उनका अस्थायी मंदिर बनाया गया है. फिलहाल आस्था और तकनीक के विश्वास के साथ टनल में फंसे मजदूर अब जिंदगी की जंग जीत गए है.

 

कानपुर का हूं, 8 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं, पॉलिटिक्स एनालिसिस पर ज्यादा फोकस करता हूं, बेहतर कल की उम्मीद में खुद की तलाश करता हूं.

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