रौबदार अंदाज से सबकी बोलती बंद कर देने वाली नादिरा को अंतिम समय क्यों मिली गुमनामी?

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तलवारबाजी का हुनर देखने के लिए दरबार सजा है राजा के साथ प्रजा भी बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रही है। तभी बिगड़ैल घोड़े की लगाम थामें एक राजकुमारी आती है। राजकुमारी की आंखों में धधकती चिगांरी, बिखरे हुए घुंघराले बाल और पूरे चेहरे पर गुस्से की सैकड़ों रेखाएं ये बता रही थी वो औरत जरूर है लेकिन किसी भी मर्द से मुकाबला कर सकती है। ये सीन साल 1952 में रिलीज हुई डायरेक्टर महबूब खान की फिल्म आन का है और राजकुमारी के रोल में नादिरा। आज कहानी रील से रियल तक आन-बान-शान की जीती-जागती मिसाल बालीवुड की रौबदार एक्ट्रेस नादिरा की।

डायरेक्टर महबूब खान साल 1952 रिलीज हुई फिल्म ‘आन’ बना रहे थे। फिल्म की एक हीरोइन ‘निम्मी’ जिनकी कास्टिंग हो चुकी थी वहीं दूसरी हीरोइन के लिए नरगिस या मधुबाला के नाम पर डिस्कशन हो रहा था। लेकिन बात नहीं बन पा रही थी। उसी दौरान महबूब खान एक शादी के फंक्शन में गए तब उनकी नजर 19–20 साल की एक लड़की पर पड़ी। जो इराक के बगदाद की एक यहूदी परिवार से थीं। महबूब खान ने उस लड़की को देखते ही तय कर लिया की वो मेरी फिल्म की हीरोइन बनेगी और इसके बाद बॉलीवुड को मिली रौबदार अंदाज से सबकी बोलती बंद कर देने वालीं नादिरा। नादिरा नाम उन्हें महबूब खान ने ही दिया था। उनका असल नाम फ्लोरेंस एजेकेल था। फिल्म आन ने रिकॉर्ड तोड़ कमाई कीं। ये ही पहली फिल्म थी, जो 17 भाषाओं के सब टाइटल्स के साथ 28 देशों में रिलीज हुईं। इस फिल्म का प्रीमियर लंदन में हुआ और इसी फिल्म से ही यानी नादिरा बॉलीवुड इंडस्ट्री में ‘फीयरलेस नादिरा’ के नाम से फेमस हो गईं। नादिरा हमेशा शाही जिंदगी जीना पसंद करतीं थीं। अपने दौर की सबसे ज्यादा फीस लेने वाली नादिरा ने उस वक्त की सबसे महंगी गाड़ी रोल्स रॉयस खरीदी। ये गाड़ी तब किसी हीरोइन के पास नहीं थी। आन फिल्म हिट होने के बाद नादिरा ने नगमा’, ‘वारिस’, जैसी फिल्मों में बेहतरीन काम कर लोगों का दिल जीता। नादिरा को शो मैन राज कपूर के साथ काम करने की ख्वाहिश थी और यही ख्वाहिश उनके गले की फांस बन गई उनसे हीरोइन का तमगा छीन गया। दरअसल राज कपूर साल 1956 को रिलीज हुई फिल्म श्री 420 बना रहे थे। राज कपूर ने नादिरा को फिल्म में एक रोल का मौका दिया तो उन्होंने रोल कौन सा है कैसा है इसकी चिंता किए बगैर ही झट से उस रोल को करने के लिए तैयारी हो गईं। ये रोल फिल्म की हीरोइन की नहीं बल्कि विलेन का था। इस फिल्म में नादिरा का सिगरेट पकड़ने का अंदाज काफी फेमस हुआ। फिल्म भी ब्लॉकबस्टर हुईं, लेकिन इसने नादिरा के करियर की दिशा बदल दीं। अब उनके पास हीरोइन के रोल आने ही बंद हो गए। हर डायरेक्टर उनसे विलेन का ही रोल करवाना चाह रहा था। कई महीनों उन्हें काम नहीं मिला मजबूरन उन्हें विलेन के रोल करने पड़े। लेकिन फिल्म में निभाए गए उनके विलेन के रोल हीरोइन पर भारी होते होते थे। पाकीज़ा’, ‘दिल अपना प्रीत परायी’, ‘हंसते ज़ख्म’, ‘अमर अकबर एंथनी जैसी फिल्मों में भी देखा गया। वे अपने पहनावे से भी चर्चा में रहती थीं। साल 1975 में रिलीज हुई फिल्म जूली के लिए उन्हे फिल्मफेयर का बेस्ट सपोर्टिंग रोल का खिताब मिला। नादिरा आखिरी बार साल 2000 में रिलीज हुई शाहरुख खान की फिल्म जोशमें लेडी डिकोस्टा के रोल में नजर आईं। पांच दशक तक फिल्मों में काम करने वालीं नादिरा की शादी एक हफ्ते में ही टूट गई थी। इसलिए अंतिम समय उन्हें अकेले में काटना पड़ा। उनके साथ कोई नहीं था। सिर्फ उनकी मेड थी। अल्कोहलिक लिवर डिसऑर्डर, पैरालिसिस जैसी बीमारियों के चलते नादिरा ने नौ फरवरी साल 2006 को दुनिया से अलविदा कह दिया।

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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