नेपाल सरकार के चक्कर में रुक गयी भारतीय सेना में नेपाली गोरखा की भर्ती

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यूं तो पूरी दुनिया में इंडि‍यन आर्मी की मिसाल दी जाती है। लेकिन गोरखा राइफल्स के बिना भारतीय सेना की रेजिमेंट शक्ति अधूरी है। भारतीय सेना के साथ नेपाल से आए गोरखा जवानों से बनी इस रेजिमेंट का सफर 200 साल से भी ज्यादा पुराना है। गोरखा अपने साहस और युद्ध कौशल के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी ईमानदारी और वफादारी के लिए भी पहचाने जाते हैं। एक बार तो हिटलर ने खुद कह दिया था कि अगर गोरखा सैनिक उसके साथ आ जाएये तो वो पूरे विश्व को जीत सकता हैं। लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि अब भारतीय सेना में गोरखा जवान शामिल नहीं हो रहे हैं।

भारतीय सेना में सबसे ज्‍यादा गोरखा रेजिमेंट का जिक्र होता है। ये एक ऐसी रेजिमेंट है, जिससे न सिर्फ दुश्‍मन की सेना बल्‍कि भारतीय सेना की दूसरी रेजिमेंट्स में गोरखा की बहादुरी की मिसालें दी जातीं हैं। अब चाहे द्वितीय विश्व युद्ध हो या फिर कारगिल का युद्ध। सभी जगहों पर गोरखा सैनिकों ने अपने अदम्य शौर्य और खुखरी के बल पर दुश्मनों को नाको चने चबा दिये। गोरखा की बहादुरी को लेकर भारतीय सेना के फील्ड मार्शल जनरल मानेक शॉ कहते थे कि अगर कोई व्यक्ति कहता है कि उसे मौत से डर नहीं लगता, तो वह झूठ बोल रहा है या फिर गोरखा है।

लेकिन अब इन्हीं बहादुर गोरखों का इंडियन आर्मी में आना बंद हो गया है। क्योंकि नेपाल इसको लेकर सियासी खेल खेलने में जुटा हुआ है। दरअसल गोरखा जवानों की भर्ती न होने की कहानी अग्निवीर परीक्षा में छिपी हुई हैं।

भारतीय सेना में पिछले साल भर्ती का तरीका बदल गया। अब अग्निपथ स्कीम के तहत अग्निवीरों को भर्ती किया जा रहा है। जब पिछले साल अग्निवीरों की भर्ती हुई, तो भारतीय सेना ने नेपाल में गोरखाओं के लिए भर्ती रैली का आयोजन किया लेकिन, नेपाल सरकार ने इसकी इजाजत नहीं दी, जिसके बाद रैली भर्ती नहीं हुई। जिसके बाद भारत ने जब नेपाल सरकार से इस बारे में बात की तो जवाब मिला कि नेपाली नौजवान अग्निपथ स्कीम में आएंगे या नहीं, इसका फैसला नई सरकार लेगी। जिसके बाद नेपाल में पुष्पकमल दहल प्रचंड की अगुवाई में नई सरकार बनी। लेकिन अभी तक इस बारे में किसी ने बात नहीं की।

अब सवाल उठता है कि इंडियन आर्मी में नेपाली गोरखाओं की कमी कैसे पूरी हो रही है?

तो इसका जवाब भी सुन लीजिये। आजादी के वक्त तक गोरखा रेजिमेंट में करीब 90 पर्सेंट तक गोरखा जवान नेपाल आते थे और 10 पर्सेंट भारतीय मूल के गोरखाओं का शामिल किया जाता था। लेकिन धीरे-धीरे करके इस रेशियो को भी कम कर दिया।और भारतीय सेना में ये रेशियो अब 60 और 40 का हो गया। लेकिन साल 2022 में जब अग्निवीर भर्ती में नेपाली गोरखा शामिल नहीं होने आये। तो इस भर्तियों में कुछ भारतीय भूल के गोरखा और उत्तराखंड के कुमांऊ-गढ़वाल के युवकों को भर लिया गया। क्योंकि इन लोग की संस्कृति और खानपान से लेकर भौगोलिक परिस्थितियों नेपाली गोरखाओं के समान है।

वैसे ये भी आपको बता दें कि हर साल 1200 से 1300 नए गोरखा सैनिक हमारी सेना में शामिल किए जाते हैं। भारतीय सेना में अभी गोरखा की 7 रेजिमेंट हैं। आजादी के वक्त ये गोरखा रेजिमेंट 10 हुआ करती थीं। लेकिन आजादी के बाद जब भारत और ब्रिटेन के बीच बंटवारा हुआ। तो 6 रेजिमेंट भारत के हिस्से आईं, तो 3 ब्रिटेन को मिलीं और जबकि एक डिसबैंड कर दिया गया। जिसके बाद भारतीय सेना ने एक और गोरखा रेजिमेंट बनाई। भारत में कई शहरों में गोरखा रेजि‍मेंट के सेंटर हैं। इसमें वाराणसी, लखनऊ, हिमाचल प्रदेश में सुबातु, शिलांग के ट्रेनिंग सेंटर मशहूर हैं। गोरखपुर में गोरखा रेजिमेंट की भर्ती का बड़ा केंद्र है। लेकिन भारत, नेपाल और ब्रिटेन के अलावा ब्रूनेई और सिंगापुर में भी गोरखा रेजि‍मेंट किसी न किसी रूप में हैं।

अब आपके मन में ये सवाल होगा कि भारतीय सेना और ब्रिटेन की सेना तक गोरखा रेजीमेंट कैसे पहुंची। तो इसका जवाब गोरखा रेजिमेंट के गठन में छिपी हुई है। गोरखा रेजिमेंट के गठन की कहानी भी बहुत दिलचस्‍प है। साल 1815 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी का युद्ध नेपाल राजशाही से हुआ था, तब नेपाल को हार मिली थी, लेकिन नेपाल के गोरखा सैनिक बहादुरी से लड़े थे। जिसके बाद अंग्रेजों और नेपाल राजशाही के बीच सुगौली संधि हुई। फिर 24 अप्रैल 1815 को गोरखा रेजिमेंट  का गठन किया गया।

आखिर गोरखा रेजिमेंट हमारे लिए इतनी जरूरी क्यों है ये भी जान लेते हैं।नेपाली गोरखा पहाड़ी लड़ाका होता, इसके साथ वो साहस और वफादारी के लिए जाना जाता है। ये शारिरिक और मानसिक रूप से काफी शक्तिशाली होते हैं औऱ जिस भी युद्ध में उतर जाए। जबतक उस युद्ध का रिजल्ट नहीं आता तब तक लड़ते रहते है और जीत दिलाकर ही वापस लौटते है। 9 गोरखा राइफल्स रेजिमेंट के नेपाली मूल के जवानों को अब तक 9 विक्टोरिया क्रास, एक अशोक चक्र, पांच पीवीएसएस, पांच महावीर चक्र समेत कई पुरस्कार मिल चुके हैं। 

गोरखा की पहचान 'खुखरी' है जो एक तरह का धारदार खंजर होता है। इसके साथ ही ‘गोरखा’ सिपाही जब भी दुश्मन पर हमले के लिए आगे बढ़ते हैं। तो उनकी जुबान पर एक नारा होता है- 'जय महाकाली, आयो गोरखाली'

भारत और पड़ोसी देश नेपाल के बीच हमेशा से मैत्रीपूर्ण संबंध रहे हैं। दोनों देशों के बीच नागरिकों को आने-जाने के लिए न ही पासपोर्ट की जरूरत पड़ती है और न वीजा की। लेकिन अग्निवीर स्कीम के बाद से इस दोस्ती के बीच दरार पैदा कर दी है। जिसका खामियजा गोरखा जवानों को उठाना पड़ रहा है।

 

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