retd. Justice S. Abdul Nazeer से पहले भी कई जज बनाये गए Governor और Vice-Chancellor

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देश के 13 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को नए राज्यपाल मिल गए हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कुछ नए चेहरों को राज्यों में केंद्र सरकार का प्रतिनिधि बनाकर भेजा है, तो कुछ राज्यपालों का ट्रांसफर किया गया है। राष्ट्रपति भवन से जारी राज्यपाल के 13 नामों की लिस्ट में जो सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित कर रहा है, वो है- रिटायर्ड जस्टिस एस. अब्दुल नजीर का।

ऐसी नियुक्तियों पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं और इन्हें राजनीति से प्रेरित बताया जाता रहा है। जस्टिस नजीर के राज्यपाल बनने पर फिर से ये नियुक्ति सवालों के घेरे में है, जिसपर कांग्रेस ने सवाल उठाएं हैं। जस्टिस नजीर अयोध्या मामले में फैसला सुनाने वाली 5 जजों की बेंच में शामिल थे। नोटबंदी के फैसले को सही ठहराने वाली बेंच की अगुवाई भी जस्टिस नजीर ने ही की थी। आज हम बात करेंगे कि रिटायर होने के बाद ज्यादातर पूर्व मुख्य न्यायाधीश अपने-अपने तरीके से अलग क्षेत्रों में सक्रिय रहते हैं। कुछ पूर्व चीफ जस्टिस अगर राजनीति में गए हैं, तो कुछ विश्वविद्यालयों के चांसलर बने हैं। एक चीफ जस्टिस ने तो राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिए अपने पद से ही इस्तीफा दे दिया था। वहीं, कुछ न्यायाधीशों ने रिटायर होने के बाद खुद को किसी भी रोल से जोड़ना जरूरी नहीं समझा। जस्टिस एस. अब्दुल नजीर पिछले महीने ही सुप्रीम कोर्ट जज के पद से रिटायर हुए हैं। 4 जनवरी, 2023 को रिटायर हुए जस्टिस अब्दुल नजीर ने अपने विदाई भाषण में संस्कृत का एक बहुत ही प्रसिद्ध श्लोक धर्मो रक्षति रक्षितः कोट किया था। सर्वोच्च न्यायालय की जिस पीठ ने 9 नवंबर, 2019 को अयोध्या विवाद का फैसला दिया था, जस्टिस नजीर उसके दूसरे सदस्य हैं, जिन्हें रिटायरमेंट के बाद सरकारी नियुक्ति मिली है। जस्टिस नजीर से पहले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई को राज्यसभा सांसद बनाया जा चुका है। अब रिटायर्ड जस्टिस एस. अब्दुल नजीर को आंध्र प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया गया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के राज्यसभा में मनोनीत किये जाने के बाद विवाद छिड़ गया था।

आजादी के बाद से देश में अब तक 50 सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे हैं। हालांकि देश के ज्यादातर मुख्य न्यायाधीश रिटायरमेंट के बाद किसी न किसी कमीशन के चेयरमैन जरूर बनते रहे हैं। शुरूआत करते हैं देश के दूसरे चीफ जस्टिस बने पतंजलि शास्त्री से, जो चेन्नई से ताल्लुक रखते थे। क्योंकि देश के पहले चीफ जस्टिस एच जे कनिया का पद पर रहने के दौरान ही साल 1951 में हार्ट अटैक से निधन हो गया था। जिसके बाद पतंजलि शास्त्री करीब तीन साल तक पद पर रहे। जिनको रिटायर्मेंट के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय का प्रो वाइस चांसलर बना दिया गया। इसके साथ ही वो कई बोर्ड में भी शामिल रहे, लेकिन अचानक उनकी दिलचस्पी राजनीति की ओर बढ़ी और वो उस समय मद्रास संविधान सभा के सदस्य बन गए, इसे आज की भाषा में आप विधायक भी कह सकते हैं। वो इस भूमिका में 1958 से 1962 तक रहे। बिजन कुमार मुखर्जी 1954 से लेकर 1956 तक सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे। दरअसल, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्‍हें पहले ही इस पद का प्रस्ताव दिया था। लेकिन तब उन्होंने इसे ठुकरा दिया। उन्होंने नेहरू से कहा कि उनसे सीनियर जज सुप्रीम कोर्ट में हैं। इसलिए उन जज को ही सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया जाए। उसके बाद जब 1954 में जब उनकी बारी आई तो वो इस पद पर आए। साल 1959 में बिहार के बीपी सिन्हा चीफ जस्टिस बने। वो पद पर 1964 तक रहे यानि वो करीब चार साल इस पद पर रहने वाले जजों में शामिल हो गए। जैसे ही वो रिटायर हुए उन्होंने अपना जीवन आध्यात्मिकता और धार्मिकता के नाम कर दिया। वो अपना मन पूजा पाठ में लगाने लगे। बाद में उनकी आंखों की रोशनी जाती रही.. 1986 में पटना में उनका निधन हो गया।

कुछ चीफ जस्टिस ऐसे भी रहे जो रिटायर्मेंट के बाद विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलर बने... इसमें सबसे पहले थे, पीबी गजेंद्रगडकर। उन्होंने कई किताबें लिखीं और 1966 में रिटायर होकर मुंबई यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर बने। इसी तरह साल 1993 से लेकर 1994 तक मुख्य न्यायाधीश रहे, एमएन वेंकटचलैया भी रिटायर होने के बाद सत्य साईं इस्टीट्यूट ऑफ हाई लर्निंग के चांसलर बन गए। साल 1994 से लेकर 1997 इस ऊंचे पद पर रहे एएम अहमदी रिटायर होने के बाद दो बार अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के चांसलर बने। इसी तरह विश्वेश्वर नाथ खरे जब 2004 में रिटायर हुए तो वो झारखंड सेंट्रल यूनिवर्सटी के चांसलर बन गए। कुछ चीफ जस्टिस ऐसे भी रहे जो पद छोड़कर या रिटायर होने के बाद राष्ट्रपति बने। इनमें सबसे पहले नाम आता है, के सुब्बाराव का... सुब्बाराव, साल 1966, मार्च में देश के मुख्य न्यायाधीश बने। लेकिन करीब दस महीने बाद विपक्षी दलों ने जब उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया तो उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि वो जाकिर हुसैन के खिलाफ ये चुनाव हार गए। 1968 से लेकर 70 तक सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे हिदातुल्लाह पद से रिटायर होने के बाद देश के छठे उप राष्ट्रपति बने। वो एक्टिंग राष्ट्रपति भी रहे।

सनद रहे कि जस्टिस नजीर पहले नहीं हैं जो रिटायर होने के बाद राज्यपाल बने, इनसे पहले भी साल 2013 से 2014 तक मुख्य न्यायाधीश रहे जस्‍टिस सदा शिवम ने रिटायर होने के बाद केरल में राज्यपाल का पद स्वीकार किया था। हालांकि, उनकी आलोचना भी बहुत हुई थी। उन्हें भी नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान ही ये भूमिका दी गई थी। इससे पहले भी रंजन गोगोई को रिटायर्मेंट के तुरंत बाद ही राज्यसभा के लिए मनोनित किया गया था। ऐसा सिर्फ मोदी सरकार में ही नहीं हो रहा। कांग्रेस से भी सुप्रीम कोर्ट के जज राज्य सभा में पहुंचे हैं। इससे पहले कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीतकर रंगनाथ मिश्रा 1998 से लेकर 2004 तक राज्य सभा सदस्य रहे। रंगनाथ का परिवार ओडिसा में कांग्रेस की राजनीति से गहरे तक जुड़ा रहा था। उनके पिता ओडिसा में कांग्रेस सरकार में मंत्री भी रहे थे। बाद में देश के मुख्य न्यायाधीश बने दीपक मिश्रा उन्हीं के बेटे हैं। हालांकि रंगनाथ मिश्र से भी पहले कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के एक और जज बहारुल इस्लाम को राज्य सभा में भेजा था।

देश के ज्यादातर रिटायर्ड चीफ जस्टिस ने पद से हटने के बाद किसी ना किसी तौर पर अलग अलग कमीशन के चेयरमैन का रोल स्वीकार किया। इसमें जस्टिस जेसी वर्मा से लेकर जस्टिस कमल नारायण सिंह और जस्टिस राजेंद्र मल लोढ़ा शामिल हैं। जस्टिस राजेंद्र मल लोढ़ा को रिटायर होने के बाद आईपीएल फिक्सिंग मामले में बीसीसीआई के ढांचे में आमूलचूल बदलाव के लिए संस्तुति करने वाले आयोग का चेयरमैन बनाया गया था।

 

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