S. D. Burman : मोहब्बत और म्यूजिक के लिए छोड़ा राजसी ठाट-बाट

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बेहद सरल जीवन जीने वाले एसडी बर्मन का अंदाज दिल फरेब और मजाकिया था, जो भी शख्स दिल में बस जाए उसके लिए वो किसी भी हद तक जा सकते।

न तुम हमें जानो

न हम तुम्हें जाने...

मगर.. लगता है कुछ ऐसा

मेरा हमदम मिल गया

ये गाना है साल 1962 की देव आनंद की फिल्म ‘बात एक रात की’ का। इस गाने की जिन्होंने धुन बनाई वो थे इंडियन सिनेमा के दिग्गज म्यूजिक डायरेक्टर सचिन देव बर्मन।

एक बार एसडी बर्मन के घर में एक गाने की रिहर्सल चल रही थी। छह- सात इंस्ट्रूमेंट प्लेयर थे और एसडी बर्मन सभी को गाइड कर रहे थे। इसी दौरान उनकी पत्नी मीरा एक प्लेट में रसगुल्ले लाती हैं और सभी के सामने रखकर चली जाती हैं। अब सामने प्लेट में रसगुल्ले रखे थे पर कोई खा ही नहीं रहा।

क्योंकिएसडी बर्मन ने किसी से कहा ही नहीं कि ‘आप लोग रसगुल्ले ले लीजिए।’ पर नजरे बचाकर आने वाले दौर के महान क्लासिकल म्यूजिक डायरेक्टर और बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया गपागप पांच-छह रसगुल्ले खा गए।

उनको लगा एसडी बर्मन ने देखा नहीं। अगले दिन गाने की रिकॉर्डिंग हुई। हरिप्रसाद चौरसिया ने जब बांसुरी बजाई तो सभी ने उनकी खूब तारीफ की और तभी मौका देखकर एसडी बर्मन बोल पड़े – वाहदेखो-देखो कितना मीठा बजाया होरी नेकल हमारा पांच मीठा-मीठा रसगुल्ला जो खा गया था।’

सचिन देव बर्मनजिनकी निगाह पैनी थी। एक शाही राजघराने से ताल्लुक था, फिर भी बेहद कंजूस। कोई आता उससे चाय पूछते थे लेकिन तब जब वो जाने लगता। खाना खाने और पान खाने के शौकीन थेमजाल है की वो अपना एक पान किसी को दे दें।

एसडी बर्मन के रिश्तेदार खगेश देव बर्मन। उन्होंने एसडी बर्मन के बेटे आरडी बर्मन की बायोग्राफी - ‘आरडी बर्मन - द प्रिंस ऑफ म्यूजिक’ लिखी है जिसमें वो लिखते हैं कि 'मंदिर में घुसने से पहले एसडी बर्मन अपनी एक चप्पल कहीं तो दूसरी चप्पल कहीं और रखते। वो कहतेआजकल चप्पल चोरी ज्यादा होने लगी है। किसी ने पूछाचोर फिर भी आपकी चप्पल चोरी कर ले तोइस पर एसडी बर्मन कहतेचोर इतनी मेहनत करता हैतो वो वाकई इसे पाने का हकदार है।'

पर हांबेहद सरल जीवन जीने वाले एसडी बर्मन का अंदाज दिल फरेब और मजाकिया थाजो भी शख्स दिल में बस जाए उसके लिए वो किसी भी हद तक जा सकते। उनके ढेरों किस्से हैं।

शरीर दुबला और काठी सादी। फिर भी इनकी हस्ती का असर ये था कि कोई भी प्रभावित हो जाए। जिसकी खून में संगीत था। जिसके हाथों की लकीरों पर संगीत था। वो एसडी बर्मन जब दुनिया छोड़ कर गए तब भी वो एक गाने की रिकॉर्डिंग कर रहे थे। 

एसडी बर्मन को समझने के लिए हमें 14वीं सदी में चलना पड़ेगा। साल था 1400, त्रिपुरा में मानिक्य वंश की शुरुआत हुई और महा मानिक्य महाराजा बने। 449 साल बीतेसाल आया 1849, अब मानिक्य वंश के 44वें महाराजा थे ईशान चंद्र बर्मन। जिन्होंने 14 साल त्रिपुरा पर राज किया और साल 1862 में ईशान चंद्र का निधन हो गया। इनके निधन के बाद गद्दी के हकदार थे बेटे नवद्वीप चंद्र बर्मन। पर गद्दी मिली ईशान चंद्र बर्मन के भाई बीर चंद्र बर्मन को।

नवद्वीप चंद्र बर्मन महाराजा तो नहीं बने इनकी शादी मणिपुर की राजकुमारी निर्मला देवी हुई। निर्मली देवी के नौ बच्चे हुए। पांच बेटे और चार बेटियां। पांच बेटों में सबसे छोटे थे 1 अक्टूबरसाल 1906 को कोमिलाबांग्लादेश में जन्मे सचिन देव बर्मन।

जब दो साल के हुए तो मां निर्मला देवी का निधन हो गया। पिता की परवरिश मिली और बचपन राजसी ठाठ-बाट में बीता। पढ़ाई बोर्डिंग स्कूल से हुई। बीए किया। एमए किया। लेकिन वक्त के साथ रुझान म्यूजिक की तरफ गया।

वजह होगी की इनके पिता भी एक सितार वादक और सिंगर थे। साल 1927,  21 साल की उम्र में वो म्यूजिक सीखने लगे। उन्होंने लोक संगीत को बहुत करीब से सुना। म्यूजिक के लिए वो राजसी ठाठ बाट छोड़ चुके थे। पैसे चाहिए थे तो बतौर सिंगर साल 1932 में कोलकाता रेडियो में काम किया। और अगले कुछ सालों में बंगाली फिल्मों के लिए गाने रिकार्ड करने लगे। इसमें इनकी मदद म्यूजिक डायरेक्टर केसी डे ने की।

साल 1944 वो कलकत्ता से मुंबई आ गए। इसकी वजह बने फिल्मिस्तान स्टूडियो के शशधर मुखर्जी जो एसडी बर्मन के म्यूजिक से बेहद प्रभावित थे। शशधर मुखर्जी ने अशोक कुमार की साल 1946 की दो फिल्में ‘शिकारी’ और ‘आठ दिन’ में म्यूजिक देने का मौका दिया। पर दोनों ही फिल्मों का म्यूजिक कुछ खास कमाल नहीं कर पाया।

निराशा हुई मुंबई छोड़कर जाने वाले थे। अशोक कुमार के कहने पर रुके। संघर्ष जारी रखा। साल 1947 की फिल्म ‘दो भाई’ के लिए म्यूजिक दिया और फिल्म का गाना ‘मेरा सुंदर सपना बीत गया’ हिट हो गया। 

साल 1950 ये वो वक्त था जब देव आनंद और गुरु दत्त भी अपने शुरुआती दौर में थे। एसडी बर्मन और देव आनंद की जोड़ी बनी जो अगले 23 साल तक चली। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

चार दशक के करियर में अफसर – 1950, बाजी -1951, जाल – 1952,  देवदास – 1955, फंटूश – 1956, प्यासा – 1957,  काला पानी - 1958कागज के फूल -1959, बंदिनी – 1963, जिद्दी - 1964गाइड – 1965, ज्वैलथीफ – 1967, प्रेम पुजारी – 1970,  तेरे मेरे सपने – 1971, चुपके-चुपके – 1975, त्याग (आखिरी फिल्म) - 1977 जैसी 100 से ज्यादा फिल्मों में अपने संगीत से जान डाली।

कहते नौशाद ने म्यूजिक को क्लासिक बनायाओपी नेय्यर ने उसमें बचपन डाला। लेकिन एसडी बर्मन के म्यूजिक में सुबह का तेज भी था और शाम की गहरी उदासी भी। उनकी धुनों में आम आदमी की तकलीफ भी थी और खासमखास की अदायगी भी।

साल 1969 में पद्मश्री मिला। साल 1970 में फिल्म आराधना का गाना 'सफल होगी तेरी आराधना' गाने के लिए 'बेस्ट प्लेबैक सिंगर' और साल 1974 की फिल्म 'जिंदगी-जिंदगीका म्यूजिक देने के लिए 'बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर' का 'नेशनल अवार्ड' मिला। साल 1954 की फिल्म 'टैक्सी ड्राइवरऔर 1973 की फिल्म 'अभिमानका म्यूजिक देने के लिए 'फिल्मफेयर' जीता।

एसडी बर्मन एक लड़की को संगीत सिखाते-सिखाते दिल थे बैठे। ये लड़की कोई और नहीं गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की शिष्या - मीरा दासगुप्ता। दोनों शादी करना चाहते थे। पर परिवार खिलाफ था क्योंकि एसडी बर्मन एक राजसी खानदान से ताल्लुक रखते और मीरा एक आम लड़की।

पर एसडी बर्मन ने साल 1938 में मीरा से शादी। वो परिवार के खिलाफ गए। वहीं परिवार वालों ने भी  एसडी बर्मन से सारे रिश्ते तोड़ दिए।

मीरा ने एक बेटे को जन्म दिया - आर डी बर्मन जिन्हें प्यार से पंचम दा कहा जाता है। आगे चलकर आरडी बर्मन की वजह से एसडी बर्मन कश्मकश में पड़े। ये वो वक्त था जब आरडी बर्मन भी फिल्मों में म्यूजिक दे रहे थे। इंडस्ट्री में एसडी और आरडी दोनों के म्यूजिक का कंपेरिजन होने लगा था।  

आरडी बर्मन की बायोग्राफी - ‘आरडी बर्मन - द प्रिंस ऑफ म्यूजिक’ में खगेश देव बर्मन लिखते हैं कि मीरा से अब और सहन नहीं हो रहा था। उन्होंने अपने पति एसडी बर्मन से पूछाआपको क्या हो गया हैइतने दिनों से आप अपने बेटे का संगीत सुनकर शाबाश कहते हुए बड़े उत्साह से उछल रहे थे। अब इतना उदास चेहरा क्योंएसडी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,  क्या आप चाहते हैं कि मैं ये स्वीकार करूं कि पंचम का कद मुझसे बड़ा हो गया है?’

पर एक दिन एसडी बर्मन अपने बेटे आरडी बर्मन से हार के भी जीत गए। खगेश देव बर्मन लिखते हैं कि आरडी बर्मन ने पिता से कहा मेरे सिर पर हाथ लगाकर मुझे आशीर्वाद दोमैं तुम्हारा योग्य बेटा बनना चाहता हूं। इसके बाद आरडी ने पहली बार अपने पिता की आंखों में खुशी के आंसू देखे। एसडी बर्मन ने कहाअपने बेटे से हार अब तक की सबसे बड़ी जीत है। दुनिया के इतिहास में इससे बड़ी कोई जीत नहीं है।’

एसडी बर्मन की साहिर लुधियानवी से भी अनबन हुई। लता मंगेशकर से भी झगड़ा हुआपर वो ज्यादा दिनों तक किसी से भी रूठे नहीं रह सकते। पूरी जिंदगी म्यूजिक को दे दी। 

साल 1975 की फिल्म मिली के गाने – बड़ी सूनी सूनी है जिंदगी ये जिंगदी रिकॉर्ड करते वक्त उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ और वो कोमा में चले गए।

एसडी बर्मन का दूसरा प्यार फुटबॉल था। वो करीब 6 महीने तक कोमा में रहे। उसी दौरान एक मैच में उनकी फेवरेट टीम मोहन बागान जीती।

ये खबर आरडी बर्मन ने एसडी बर्मन के कानों में जोर से कहीएसडी बर्मन ने आंखें खोली पर अफसोस ये कुछ वक्त के लिए ही था। 31 अक्टूबर साल 1975, वो दिन जब वो इस दुनिया को छोड़कर चले गए।

साल 1957 की फिल्म प्यासा जो गुरु दत्त की क्लासिक फिल्म थी। इसका एक गाना है जिसे एसडी बर्मन ने ही अपनी धुन से सजाया था।

हम आपकी आंखों में इस दिल को बसा दें तो

हम मूंद के पलकों को इस दिल को सज़ा दें तो

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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