Saadat Hasan Manto : 'मैं कोई दर्जी नहीं, जो सबको कपड़े पहनाता फिरूं'

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मेरा पैदा होना ही सबसे बड़ी घटना है’ ये मैं नहीं वो कहते थे जिन पर अश्लीलता फैलाने के आरोप लगे। मुकदमे दर्ज हुए। कोर्ट में वकीलों को जवाब देते-देते थक गए तो पागल करार दिए गए। कई फिल्मों की स्टोरी लिखी। नाटक लिखे। देश के बंटवारे का दर्द अपनी कलम से सबसे बेहतर लिखने वालों में एक सआदत हसन मंटो। जो खुलकर बोलते। आप साहित्य के प्रेमी हैं, तो इनके बारे में जरूर सुना और पढ़ा होगा। इनकी कहानियां जितनी विवादित थी उससे कहीं ज्यादा सच्ची और पारदर्शी। जिसे बर्दाश्त कर पाना समाज के बस की बात नहीं थी। मंटो कहते थे कि ‘मेरी कहानियां नंगे समाज की सच्चाई दिखाती हैं। मैं कोई दर्जी नहीं, जो सबको कपड़े पहनाता फिरूं।’

मंटो की कहानियों में महिलाएं काल्पनिक नहीं होती थीं।

मशहूर राइटर विनोद भट्ट – ‘मंटो : एक बदनाम लेखक’ में लिखते हैं कि उन पात्रों को पढ़कर ऐसा लगता है, कि ये हमारे समाज का हिस्सा है, जिन पर पर्दा डालने की कोशिश की गई है। जैसे ही ये पर्दा हट जाएगा, समाज का नंगा चरित्र सामने आ जाएगा। मंटो की कहानियां अपने समय से बहुत आगे थीं, जिसमें समाज में फैले पाखंड और महिलाओं के प्रति हो रहे अत्याचारों के बारे में खुलकर लिखा गया है।

मंटो की कहानी ‘ठंडा गोश्त’ में ईश्वर की पत्नी का बेहद बेबाक और मजबूत किरदार चित्रित किया गया है। इस कहानी पर पाकिस्तान में विवाद हुआ, उन पर मुकदमा भी चलाया गया। अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाकर कहानी पर बैन लगा दिया।

11 मई साल 1914 को लुधियाना में मंटो का जन्म हुआ। मंटो का छोटा सा जीवन है जिसमें सिर्फ 41 साल हैं। इस सालों में वे अमृतसर, मुंबई और लाहौर में रहे। मंटो के कई अफसानों में इन शहरों का जिक्र मिलता है। यहीं के गली-कूचे, बदनाम बाजार और आम लोगों की जिंदगी को लेकर वे अपने अफसानों में रंग भरते हैं।

एक तरफ वे कहानियां गढ़ रहे थे। तो दूसरी तरफ साल 1934 में 20 साल की उम्र में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया। यहां के माहौल ने उसके मन में कुलबुलाती रचनात्मकता को और उकसाया। कहानी “तमाशा” लिखी जो साल 1935 में अलीगढ़ मैगजीन में छपी। एसके बाद वे अमृतसर आ गए कुछ वक्त बिताया फिर लाहौर चले गए। जहां अखबार के लिए काम किया ।

साल 1936 में उनकी शादी उनके माता-पिता ने साफिया दीन के साथ तय की थी। मंटो ने अपनी शादी पर एक पूरा निबंध लिखा, जिसका शीर्षक था ‘मेरी शादी’।

सआदत और साफिया का एक बेटा आरिफ था, लेकिन उसकी बचपन में ही मौत हो गई। बेटे की मौत ने मंटो और साफिया को झकझोर कर रख दिया। उसके बाद उनकी तीन बेटियां हुईं, निगहत, नुजहत और नुसरत ।

साल 1941 में दिल्ली आ गए। ऑल इंडिया रेडियो में काम किया। किसी बात को लेकर कहासुनी हुई तो साल 1942 में, ऑल इंडिया रेडियो नौकरी छोड़ दी और मुंबई लौट आए, और बॉलीवुड का रुख किया। 'शिकारी', आठ दिन, 'चल-चल रे नौजवान' जैसी फिल्में लिखीं।

भारत-पाकिस्तान बंटवारा बेहद दर्दनाक था। मंटो बंटवारे के बाद लाहौर चले गए। मंटो की कहानी ‘खोल दो’ में उसी बंटवारे का हाल दिखाया गया है। मंटो की ये कहानी बंटवारे के दौरान महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को दर्शाती है।

विनोद भट्ट – लिखते हैं कि उस दौर में मंटो को असभ्य और अश्लील करार दिया गया। उनकी कहानियों में उन विषयों पर खुलकर लिखा जाता, जिसके बारे में समाज बात भी नहीं करता था। उन्होंने ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जिस शब्दों को अश्लील और बोल्ड माना जाता है। उनकी कहानियां सभ्यता का नकाब ओढ़े समाज को चुनौती देती हैं, यही वजह है कि ये कहानियां लंबे समय तक विवाद का विषय बनी रहती हैं। मंटो और उनकी रचनाओं के बारे में पढ़ने के बाद यही महसूस होता है कि वो एक फेमिनिस्ट लेखक थे। जिन्होंने पुरुष होकर भी उस दौर में महिलाओं के मुद्दों पर खुलकर बात की। कहानियों में अश्लीलता के आरोप की वजह से मंटो को कई बार कोर्ट जाना पड़ा।’

महान साहित्यकारों मोहम्मद इकबाल और फैज अहमद फैज की तरह सआदत हसन मंटो भी हैं जिन्हें भारत और पाकिस्तान दोनों ही देश अपनी विभूति बताता है। 18 जनवरी साल 1955 में 41 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

मंटो कहते थे कि 'ऐसा होना मुमकिन है कि, सआदत हसन मर जाए और मंटो जिंदा रहे।'

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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