Sanjay Gandhi : बिना किसी ओहदे के सरकारी सिस्टम में रखते थे दखल

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‘दिल्ली के 1 अकबर रोड पर सुबह 8 बजे दिन शुरू हो जाता था। इस शख्स की सरकार में कोई हैसियत नहीं थी, लेकिन ज्यादातर लोग इन्हें 'सर' कहते। सरकारी अफसर इनको अपनी डेली रिपोर्ट देते और ऑर्डर लेते। वक्त के इतने पाबंद थे कि इनका डेली रूटीन देखकर कोई भी अपनी घड़ी मिला सकता था।’

ये लाइनें वेट्रन जर्नलिस्ट विनोद मेहता ने अपनी किताब - ‘द संजय स्टोरी’ में उस व्यक्ति के बारे में लिखी जो जब तक जिया हमेशा लाइम लाइट में रहा। जो दिल में आता कह देते। जो ठान लेते वो करके ही दम लेते। लाख समझाने पर भी अपनी चलाते।

आज कहानी, इंदिरा और फिरोज गांधी के दूसरे बेटे, राजीव के छोटे भाई और मेनका के पति संजय गांधी की। जो तेज गाड़ी चलाने और प्लेन उड़ाने का शौक रखते। इसी शौक ने सिर्फ 34 साल की उम्र में उनकी जान ले ली। उनकी मौत से कई लोग शोक में थे तो कई ऐसे भी थे जो खुश थे। संजय दुनिया से तो ये चले गए। लेकिन एक अधुरा सपना छोड़ गए जो उनके जाने के बाद पूरा हुआ।

14 दिसंबर, साल 1946, दिल्ली में संजय गांधी का जन्म हुआ। शुरुआती पढ़ाई देहरादून से करने के बाद स्विट्जरलैंड के इंटरनेशनल बोर्डिंग स्कूल ‘इकोल डी ह्यूमेनाइट’ से भी पढ़े। उनका पढ़ाई में मन नहीं लगता था। लेकिन मशीनों से प्यार था। ये प्यार उनका पैशन बना और उन्होंने इंग्लैंड में रोल्स रॉयस में ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग की इंटर्नशिप की। इस दौरान उन्होंने प्लेन उड़ाना भी सीखा।

1966 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद में रहस्यमय मौत हो गई थी। इसके बाद इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं। इसी बीच संजय गांधी अपनी इंटर्नशिप छोड़ कर भारत आ गए। इंदिरा गांधी के सत्ता संभालने के बाद कांग्रेस में बहुत सारे बदलाव आए। जैसे-जैसे इंदिरा की पार्टी में पकड़ मजबूत हुई। वैसे-वैसे संजय का रुतबा बढ़ा।

जर्नलिस्ट रशीद किदवई अपनी किताब ‘24 अकबर रोड’ में लिखते हैं कि ‘संजय गांधी की किसी भी बात को इंदिरा गांधी अनसुना नहीं करती थीं। न ही वो संजय गांधी के किसी फैसले के खिलाफ जाती थीं। यही वजह थी संजय गांधी को एक तरह की समांतर सत्ता मिल गई। सरकारी अफसर भी संजय गांधी के आदेश का पालन करते।’

इसी बीच संजय की जिंदगी में मेनका की एंट्री हुई। राइटर और जर्नलिस्ट खुशवंत सिंह अपनी ऑटोबायोग्राफी - ‘ट्रुथ, लव एंड लिटिल मैलिस’ में लिखते हैं कि ‘संजय और मेनका की पहली मुलाकात 14 दिसंबर 1973 को हुई। दोनों एक पार्टी में मिले। कॉलेज में ब्यूटी कांटेस्ट विनर रहीं मेनका तब 17 साल की थीं और संजय 27 के। मेनका मॉडलिंग में भी हाथ जमा चुकी थीं। इस मुलाकात के बाद दोनों अक्सर मिलने लगे।’

खुशवंत आगे लिखते हैं कि ‘जब संजय गांधी ने मेनका को अपनी मां इंदिरा गांधी से मिलवाया। तब मेनका बहुत नर्वस थीं। वहीं इंदिरा को ये नहीं लगा था कि ये लड़की एक दिन उनकी बहू बनेगी। संजय इससे पहले भी कई लड़कियों को घर लेकर आए थे। लेकिन 23 सितंबर 1974 को दोनों की शादी हो गई। इस मौके पर इंदिरा ने मेनका को गोल्ड सेट, अंगूठी और 21 साड़ियां गिफ्ट की।’

प्यार के बाद मेनका और संजय की जिंदगी में भी खटपट हुई। मेनका गांधी की इंदिरा से भी ज्यादा नहीं बनती। मेनका जब मां बनी तो संजय एक ऐसे पति के रूप में आए जो मेनका का बेहद ख्याल रखते। एक इंटरव्यू में मेनका ने कहा था कि - जब भी उनकी तबीयत खराब होती तो संजय सारा काम छोड़कर उनके पास ही रहते। 13 मार्च 1980 को बेटे वरुण गांधी का जन्म हुआ। जो मौजूदा वक्त में यूपी के पीलीभीत से सांसद हैं।

साल 1975। इंदिरा सरकार ने आपातकाल लगा दिया। आपातकाल के वक्त देश ने जो दौर देखा, उसमें संजय की बड़ी भूमिका थी। उन पर कई तरह के आरोप लगे। नसबंदी का फैसला इंदिरा गांधी का जरूर था लेकिन इसे लागू कराने का जिम्मा संजय गांधी पर था। संजय के लिए ये मौका एक लॉन्च पैड की तरह था क्योंकि उन्हें खुद को कम वक्त में साबित करना था। नसबंदी किए जाने वालों में 16 से 70 साल के लोग शामिल थे। लापरवाही के कारण करीब दो हजार लोगों की जान चली गई। इस प्रोग्राम की सभी डिटेल संजय को ही भेजी जाती थी।

संजय गांधी पर आरोप लगा कि साल 1975 में रिलीज हुई फिल्म 'किस्सा कुर्सी का' के प्रिंट उनके कहने पर जलाए गए। ये संजय की जिंदगी पर बेस्ड थी। इमरजेंसी के बाद संजय गांधी को कोर्ट ने जेल भेज दिया। हालांकि बाद में फैसला पलट दिया गया।

इसी तरह 1978 में आईएस जौहर की फिल्म 'नसबंदी' भी आपातकाल की नसबंदी पर बेस्ड थी। फिल्म में किशोर कुमार ने गाना गया था। बाद में किशोर कुमार के गानों पर ऑल इंडिया रेडियो पर बैन लगा दिया गया। इसी तरह से गुलजार की फिल्म 'आंधी' को भी बैन कर दिया गया था।

साल 1977 में इंदिरा गांधी सत्ता से बेदखल हो गईं। जनता दल की सरकार बनी। लेकिन साल 1980 में इंदिरा गांधी दोबारा से प्रचंड जीत के साथ सत्ता में लौटीं इसके पीछे संजय गांधी की ही चुनावी रणनीति थी। उन्होंने अपने कौशल से दिखा दिया कि वो एक मां के लाड़ प्यार में बिगड़े बच्चे नहीं हैं और न ही कोई सनकी तानाशाह मानसिकता वाले व्यक्ति।

संजय को जब भी वक्त मिलता, वो दिल्ली फ्लाइंग क्लब जाकर हल्के प्लेन उड़ाते। 

सरकार बनी तो उनके लिए विदेश से पिट्स-एस 2 प्लेन मंगवाया गया। 23 जून साल 1980 को सुबह 7 बजकर 58 मिनट पर वो इस फ्लेन को लेकर उड़े। लेकिन ये प्लेन क्रैश हो गया। संजय गांधी का इस हादसे में निधन हो गया। संजय गांधी ने भारतीय लोगों के लिए एक कार बनाने की सोची थी।

साल 1971 में मारुति मोटर्स लिमिटेड नाम की कंपनी अस्तित्व में भी आई। संजय गांधी मैनेजिंग डायरेक्टर बने। लेकिन भारत-पाकिस्तान वॉर, आपातकाल और फिर इंदिरा के सत्ता से बेदखल होने से ये सपना अधूरा रह गया। 1980 में जब इंदिरा की सरकार दोबारा बनी तो इस ओर काम शुरू हुआ। लेकिन कुछ दिनों बाद संजय गांधी का निधन हो गया। उनकी मौत के तीन साल बाद 1983 में मारुति 800 लॉन्च हुई। संजय गांधी जिंदा रहे तब तक कंपनी ने एक कार का भी प्रोडक्शन नहीं किया। लेकिन, बाद में यही कंपनी देश की सबसे बड़ी और सफल कंपनी के रूप में उभरी।

संजय की मौत के बाद उनके समर्थकों ने उनकी मूर्तियां बनाई। सड़क, चौराहे, कॉलेज, अस्पताल के नाम संजय के नाम पर रखे गए। लेकिन, इन सबके बीच एक वर्ग ऐसा भी था जो उनके निधन से खुश था। ये वही लोग थे जिस पर आपातकाल के वक्त जुल्मो सितम ढहाए गए थे।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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