Saraswathi Rajamani : जब अंग्रेजों से बचने के लिए दो दिनों तक पेड़ पर रहीं

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सरस्वती राजमणि इंडियन नेशनल आर्मी (INA) की सबसे कम उम्र की पहली महिला जासूस बनीं। ये नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अपना भगवान मानती थीं। इन्होंने देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया। जिंदगी भर लोगों की सेवा की।

 

देश के सबसे अमीर लोगों में से एक थे पिताजी

ये 20 का दशक था तिरुचिरापल्ली के रहने वाले रामनाथन। उस वक्त देश के सबसे अमीर लोगों में से एक थे। साथ में वो एक देशभक्त भी थे। आजादी के लिए लड़ रहे क्रांतिकारियों की संघर्ष जारी रखने के लिए आर्थिक रूप से मदद करते। एक दिन अंग्रेजों को भनक लगी तो रामनाथन गिरफ्तारी से बचने के लिए तिरुचिरापल्ली से बर्मा के शहर रंगून चले गए। मौजूदा वक्त में बर्मा को म्यांमार और रंगून को यांगून कहा जाता है। उस दौर में  जाते थे।

गांधीजी से बोलीं - 'कम से कम एक अंग्रेज तो मारूंगी'

यांगून में रामनाथन के पास उनकी खानदानी सोने की खान थी। वक्त गुजरने के साथ रामनाथन की गिनती म्यांमार के प्रभावशाली लोगों में होने लगी। भारत की तरह म्यांमार में भी ब्रिटिश राज था। वो भी आजादी के लिए संघर्ष कर रहा था। महात्मा गांधी, साल 1929 और साल 1937 में दो बार म्यांमार गए वहां आजादी की लड़ाई को जोर दिया। साल 1937 में अपनी दूसरी यात्रा के दौरान गांधीजी यांगून में रह रहे रामनाथन के घर भी गए। रामनाथन अपने सभी परिवार के सदस्यों को गांधी जी से मिलवा रहे थे। उन्होंने देखा कि परिवार के सभी सदस्य हैं पर उनकी 10 साल की बेटी नहीं है। उसे ढूंढ़ा गया तो पाया। वो घर के बगीचे में खिलौने वाली पिस्टल से निशाना लगाने की प्रैक्टिस कर रही है। उसे देखकर न सिर्फ परिवार वाले बल्कि गांधीजी भी हैरान हुए। गांधीजी अहिंसा वादी थे। उस 10 साल की लड़की को यूं बंदूक ताने देख गांधीजी ने उससे बात कि, उससे सवाल किए की - 'ये क्या कर रही हो।', उस लड़की का जवाब था 'जब लुटेरे लूटते हैं, तो उन्हें गोली मार देते हैं। यहां भी ऐसा ही होगा। बड़ी होने पर मैं भी कम से कम एक अंग्रेज को तो मारुंगी।'

आइएनए की पहली महिला जासूस

ये वो लड़की थी जो इंडियन नेशनल आर्मी की सबसे कम उम्र की पहली महिला जासूस बनीं। आज कहानी सरस्वती राजमणि की जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अपना भगवान मानती थीं। सरस्वती राजमणि ने देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया। जिंदगी भर लोगों की सेवा की। वो सरस्वती राजमणि जिनकी फैमिली देश के सबसे अमीरों में शुमार थी वो जिंदगी के आखिरी दिनों में जर्जर घर में रही, बचत का कोई पैसा नहीं था कई साल तक पेंशन भी नहीं मिली।

सुभाष चंद्र बोस से हुई थीं प्रभावित 

11 जनवरी साल 1927, म्यांमार में रामनाथन को बेटी हुई। नाम रखा – राजमणि।साल 1942 दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत के बाहर रहने वाले भारतीयों को अंग्रेज साम्राज्य के खिलाफ हथियार उठाने के लिए प्रेरित कर रहे थे। उनकी विचारधारा और इंडियन नेशनल आर्मी के देशभक्ति के गीतों का राजामणि पर गहरा प्रभाव पड़ा। तब 15 साल की उम्र में राजामणि रेडियो और जनसभाओं में नेताजी के भाषणों को सुनतीं उन्हें अपनी डायरी में लिखा करतीं। वो नेताजी की नारे 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' से खासा प्रभावित हुईं। साल 1944, पैसे इकट्ठा करने और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में लोगों को भर्ती करने के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस यांगून आए। तब उनसे मिलने राजामणि भी पहुंची। सोने और हीरे के जेवर लेकर, उन्होंने ये सारे जेवर इंडियन नेशनल आर्मी को दान कर दिए। नेताजी सुभाष चंद्र बोस को ये पसंद नहीं आया वो राजमणि के घर गए। राजमणि के पिता रामनाथन ने इंडियन नेशनल आर्मी को तीन लाख रुपये दान किए थे।

जब नेताजी ने दिया नाम

नेताजी ने राजमणि के पिता रामनाथन से कहा – 'मासूमियत के चलते राजमणि ने ये जेवर दान कर दिए हैं। इसे मैं वापस करने आया हूं।' पर देश के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना लिए राजामणि ने जेवर लेने से मना कर दिया। राजमणि बोलीं - 'ये जेवर जो मैं दान कर रही हूं। ये मुझे पिताजी ने दिए हैं और अब ये मेरे हैं।' नेताजी राजामणि के दृढ़ संकल्प और बुद्धि से प्रभावित हुए पर जेवर लेने के लिए तैयार नहीं हुए। नेताजी और राजमणि ने काफी देर तक बात की। फिर राजमणि जेवर लेने के लिए तैयार हुईं पर एक शर्त पर उन्हें इंडियन नेशनल आर्मी में शामिल किया जाए। नेताजी ने राजमणि को इंडियन नेशनल आर्मी में एक नर्स की जिम्मेदारी दी और एक नया नाम भी दिया। नेताजी ने राजमणि से कहा - 'लक्ष्मी यानी धन तो आता-जाता रहता है, पर विद्या यानी सरस्वती हमेशा साथ रहती है। इसलिए आज से तुम्हारा नाम है सरस्वती राजमणि।'

जब अंग्रजों की जासूसी करने का मिला मिशन

इंडियन नेशनल आर्मी में अपने शुरुआती दिनों में राजमणि घायल सैनिकों की देखभाल करतीं। पर उन्हें देश के लिए और कुछ करना था। एक दिन उन्होंने देखा कि कुछ गांव के लोग अंग्रेज फौज को पैसे लेकर उन्हें सूचना दे रहे हैं। राजमणि ने ये जानकारी नेताजी को दी। रंगून में ही आईएनए के मुख्यालय था। नेताजी ने राजमणि की कुशलता देखी तो रानी लक्ष्मी बाई रेजीमेंट में शामिल किया, उन्हें आर्मी की ट्रेनिंग दी गई। यहां पर उनकी दोस्ती दुर्गा नाम की एक महिला से हुई। दुर्गा भी बेहद साहसी थीं। दोनों को एक मिशन दिया गया - अंग्रेज सैनिकों की जासूसी करने का।

बाल काट कर लड़कों की तरह रहने लगीं

राजामणि और दुर्गा ने अपने बाल कटवा लिए। अब वो लड़कों की तरह रहने लगी। अंग्रेज़ों के मिलिट्री कैंप और अफसरों के घरों में कपड़े धोने, जूतों पर पॉलिश करने और साफ-सफाई करने के दौरान जो कुछ महत्वपूर्ण फाइलें, जरूरी सूचनाएं मिलतीं वो नेताजी तक पहुंचातीं। दोनों को हिदायत थी - 'अगर पकड़े जाओ तो खुद को गोली मार लेना।' एक दिन जासूसी करते दुर्गा को अंग्रेजों ने पकड़ लिया उन्हें जेल में बंद कर दिया। उधर राजमणि ने तमाम खतरों के बाद भी फैसला किया कि वो दुर्गा को बचाएंगी। वो डांसर का वेश बनाकर जेल गईं, वहां अंग्रेज अफसरों को खूब शराब पिलाई जब वो बेहोश हो गए। राजमणि, दुर्गा को जेल से बाहर निकाल लाईं।पर जब जेल के बाहर खड़े अंग्रेज सैनिकों ने दुर्गा और राजमणि को भागते देखा, तो उन पर गोलियां चला दी। एक गोली राजमणि के पैर में लगी। लेकिन उन्होंने दौड़ना बंद नहीं किया। अंग्रेजों से बचने के लिए वो दोनों एक पेड़ में चढ़ गई। जहां दो दिनों तक रहने के बाद किसी तरह यांगून यानी रंगून में इंडियन नेशनल आर्मी के कैंप पहुंची।

जेल से भागने के दौरान पैर में लगी

गोली लगने की वजह से राजमणि का पैर खराब हो गया था पर उन्हें इस बात का कोई दुख नहीं वो इसे इंडियन नेशनल आर्मी के गौरवपूर्ण दिनों की निशानी मानतीं।कुछ दिनों बाद राजमणि को नेताजी का एक पत्र मिला। जिसमें नेताजी ने राजामणि की बहादुरी की प्रशंसा की और उन्हें इंडियन नेशनल आर्मी का न सिर्फ सबसे युवा सदस्य बल्कि पहली भारतीय महिला जासूस भी माना। 18 अगस्त साल 1945 ताइवान में विमान हादसे में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का निधन हुआ। दो साल बाद 15 अगस्त साल 1947 को भारत आजाद हुआ। 4 जनवरी 1948, म्यांमार को भी आजादी मिल गई। करीब एक दशक बाद राजमणि साल 1957 में अपनी सारी प्रॉपर्टी बेचकर भारत आ गईं और तिरुचिरापल्ली में रहने लगे। यहां पेंशन के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़े। एक नहीं आजादी मिलने के लगभग 24 साल तक। इस दौरान उन्होंने जमा पूंजी से गुजर-बसर किया।

तमिलनाडू सरकार ने की थी मदद 

साल 2005 में एक न्यूज पेपर को दिए गए इंटरव्यू में सरस्वती राजमणि ने बताया था कि 'उन दिनों मैंने जब एक अफसर को बताया कि मैं इंडियन नेशनल आर्मी से जुड़ी थी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ काम करती थी। इससे नाराज होकर अफसर ने मेरे कागज फाड़ दिए। कहा, जाकर नेताजी से ही पेंशन ले लो।साल 1971 में राजमणि और इंडियन नेशनल आर्मी के अन्य सैनिकों को पेंशन मिलनी शुरू हुई। फिर लगभग 30 सालों का वक्त गुजरा। साल 2000 में एक न्यूज पेपर में खबर छपी की राजमणि बेहद जर्जर घर में रह रहीं हैं। फिर तमिलनाडु सरकार ने उन्हें रहने के लिए घर दिया। पैसों से मदद भी की।

एक पुराने घर में रहीं अकेली 

राजमणि जिंदगी के आखिरी वक्त तक दर्जियों की दुकानों पर जाकर कपड़ों की कतरन जमा करतीं। फिर उनके कपड़े बनाकर जरूरतमंदों को देतीं। साल 2006 में उन्होंने अपनी सारी पेंशन सुनामी पीड़ितों को दान देदी। साल 2008 में नेताजी के जन्म स्थल कटक के नेशनल म्यूजियम को अपनी वर्दी और अपना तमगा भी दान दे दिया। वो अब चेन्नई में एक पुराने घर में अकेली रहतीं। उनके पास बचत का कोई पैसा नहीं था। 13 जनवरी, साल 2018 दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनके जीवन पर कई टीवी सीरियल, फिल्में और वेब सिरीज बनीं हैं।

नेताजी को मानती थीं भगवान के समान 

साल 2005 में दिए एक इंटरव्यू में सरस्वती राजमणि ने नेताजी के बारे में बताया था कि 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस इतने दूरदर्शी थे, कि वो देख सकते थे कि कल क्या होने जा रहा है। वो अलग-अलग वेश में आकर आपको हमेशा चौंका देते। वो स्वामी विवेकानंद के आदर्शों पर चलते थे। नेताजी हमारे लिए भगवान के समान थे।'

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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