Shashi Kapoor : अपने दौर के सबसे हैंडसम एक्टर जो सुपरस्टार नहीं बन पाए

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जिनके बारे में कहा जाता है, कि वो अपने दौर के सबसे हैंडसम एक्टर थे।

जब एक्ट्रेस शर्मिला टैगोर ने उन्हें पहली बार देखा तो उन्होंने अपने आप से कहा 'ओ माय गॉड, दिस इज शशि कपूर’। जी हां, शशि कपूर, उनके जीवन में झांके तो हमें वो आर्टिस्ट नजर आएगा जिनका कॉमर्शियल फिल्मों से ज्यादा पैरलल सिनेमा और थियेटर से लगाव था। वो प्रेमी नजर आएगा जिनकी प्रेम-कहानी दुनिया में किसी भी प्रेम कहानी से अलग है।

एक मोटा आदमी नजर आएगा जिसका मोटापा अपनी पत्नी के गम में शोक मनाने जैसा था। एक मददगार इंसान के साथ वो एक्टर नजर आएगा जो बेहद खूबसूरत था और इसी की वजह से वो कभी सुपरस्टार नहीं बन पाया।

तारीख थी 18 मार्च और साल 1938 जब कोलकाता में शशि कपूर का जन्म हुआ। पिता पृथ्वीराज कपूर, भाई शम्मी कपूर और राज कपूर की तरह ही वे बॉलीवुड की दुनिया में आए और चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में साल 1948 में रिलीज हुई फिल्म आग, साल 1951 की फिल्म आवारा जैसी कुछ फिल्मों में काम किया।

इसके बाद साल 1953 से 1960 तक अपने पिता पृथ्वीराज कपूर के साथ पृथ्वी थियेटर में काम किया। और इसी दौरान थियेटर के साथ अपनी उम्र से चार साल बड़ी जेनिफर कैंडल से प्यार हुआ। लेकिन ये प्रेम कहानी इतनी आसान नहीं थी। दोनों के परिवारों को ये रिश्ता पसंद नहीं था।

लेकिन सचमुच में प्यार करना, प्यार में न्योछावर हो जाना, मिट जाना किसी को आता तो वे शशि कपूर हैं ।

शशि कपूर अपनी किताब 'पृथ्वीवालाज़' में लिखते हैं,

मेरे कहने पर शम्मी ने हमारे बारे में हमारे माता-पिता से बात की। उनके मनाने पर ही वो बहुत मुश्किल से हमारे रिश्ते के लिए राजी हुए।’

फिल्मों में बतौर एक्टर आने से पहले ही साल 1958 में शशि कपूर ने 20 साल की उम्र में जेनिफर से की शादी कर ली।

शशि कपूर की जिंदगी को मोटे तौर पर दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। जेनिफर के साथ और जेनिफर के बाद। जेनिफर का निधन साल 1984 में हो गया और उनके बिना शशि कपूर ने 33 साल का जीवन काटा। ये वो दौर था जब जेनि‍फर को खोने के दुख से वे कभी उबर नहीं पाए। उनको जीने की इच्छा ही जैसे खत्म हो गई. इसके बाद उनका वजन बढ़ना शुरू हुआ तो वो रुका ही नहीं।

एक बार उनके पुराने दोस्त और डायरेक्टर जेम्स आइवरी ने कहा, 'मोटे होना शशि कपूर के लिए पत्नी को खोने के शोक मनाने का एक तरीका था।'

साल 1961 में रिलीज हुई डायरेक्टर यश चोपड़ा की फिल्म धर्मपुत्र से उन्होंने बतौर एक्टर बॉलीवुड में अपना सफर शुरू किया। बलबीर राज कपूर नाम बदल कर शशि कपूर रख लिया।

फिल्म मेकर श्याम बेनेगल ने शशि कपूर को फिल्म जुनून और कलयुग के लिए डायरेक्ट किया है।

बीबीसी की खबर के मुताबिक वे कहते हैं, ‘शशि असाधारण एक्टर थे। लेकिन उन्हें अमिताभ बच्चन की तरह की फ़िल्में नहीं मिली जिससे जिनसे उन्हें स्टार और एक्टर दोनों का तमगा मिल पाता। उनको हमेशा एक रोमांटिक हीरो के रूप में देखा गया। लोगों की नजरें हमेशा उनके चेहरे की तरफ गईं। उस दौर में उन जैसा ख़ूबसूरत एक्टर नहीं था। नतीजा ये हुआ कि उनकी इस खूबसूरती की वजह से उनकी एक्टिंग बैकग्राउंड में चली गई और वो सुपरस्टार नहीं बन पाए।’

शशि कपूर ने मशहूर डायरेक्टर इस्माइल मर्चेंट के साथ कई फिल्मों में काम किया। बॉम्बे टॉकीज की शूटिंग के दौरान मर्चेंट के पास पैसों की कमी पड़ गई।

इस्माइल मर्चेंट अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि शशी कपूर ने मेरी मदद की और में किसी तरह से इस मुसीबत से निकल पाए।’

शशि कपूर दिन में तीन से चार फिल्मों की शूटिंग करते थे। साल दर साल 'सत्यम शिवम सुन्दरम' ‘चार दीवारी', 'मेहंदी लगी मेरे हाथ', 'प्रेमपत्र', 'नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे', 'जुआरी', 'कन्यादान', 'हसीना मान जाएगी' जैसी 150 से ज्यादा फिल्मों में काम किया।

दीवार, सुहाग, कभी-कभी, सिलसिला, नमक हलाल, काला पत्थर जैसी फिल्मों से शशि कपूर को अमिताभ बच्चन के साथ खूब पसंद किया गया।

कमर्शियल फिल्मों से कमाया पैसा शशि कपूर ने पैरलल फिल्मों में लगाया। उन्होंने जुनून, कलयुग, 36 चौरंगी लेन, विजेता, उत्सव जैसी फिल्में बनाई। हालांकि इन फिल्मों के निर्माण में उन्हें तगड़ा घाटा उठाना पड़ा। इस घाटे से उबरने के लिए अमिताभ बच्चन को लेकर फिल्म 'अजूबा' बनाई लेकिन ये भी फिल्म नहीं चली और इनको अपनी प्रॉपर्टी बेचनी पड़ी।

उस दौर में शशि कपूर ही गिने चुने एक्टर थे जिन्होंने द हाउसहोल्डर, शेक्सपियर वाला, बॉम्बे टॉकीज, हीट एंड डस्ट जैसी ब्रिटिश और अमेरिकन फिल्मों में काम किया। साल 1998 में रिलीज फिल्म सइड स्ट्रीट्स उनकी आखिरी फिल्म थी।

फिल्म जुनून, न्यू देल्ही टाइम्स और 'मुहाफिज' के लिए उन्हें तीन बार नेशनल अवॉर्ड मिला है। साथ ही उन्हें 2014 का दादासाहेब फालके अवॉर्ड मिला। अपने अंतिम दिनों में शशि की याददाश्त जाती रही।

4 दिसंबर साल 2017 वो दिन जब शशि कपूर ने दुनिया से अलविदा कह दिया।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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