Singer Manna Dey : मुश्किल गानों के महारथी की कहानी

Home   >   किरदार   >   Singer Manna Dey : मुश्किल गानों के महारथी की कहानी

137
views

‘हमारी ही मुठ्ठी में आकाश सारा

जब भी खुलेगी चमकेगा तारा।

कभी ना ढले जो, वो ही सितारा

दिशा जिस से पहचाने संसार सारा।।’

ये गीत है साल 1991 में रिलीज हुई नाना पाटेकर की फिल्म प्रहार का। बोल हैं गीतकार मंगेश कुलकर्णी के और 72 साल की उम्र में अपने दौर के ग्रेट सिंगर मन्ना डे ने अपनी खूबसूरत आवाज से इस गीत को सजाया था। मन्ना डे का ये आखिरी गीत था।

मन्ना डे वो नायाब हीरा थे जो इंडियन सिनेमा में म्यूजिक का एक नया अध्याय ले आए। हम सभी ने अपने दौर के दिग्गज सिंगर मोहम्मद रफी, किशोर कुमार और मुकेश के गाने तो सुने होंगे। इसी दौर में मन्ना डे के भी गाने खूब मशहूर हुए। ऐसे न जाने कितने गाने हम सभी ने सुने होंगे लेकिन मन्ना डे इतने वर्सटाइल सिंगर थे कि हमें जान ही नहीं पड़ता कि ये दमदार आवाज मन्ना डे की है।

हर किसी कलाकार की तरह इनके जीवन में भी कई किस्से-कहानियां हैं। जब इसको लंबे वक्त तक काम नहीं मिला। एक वो भी दौर आया जब अपनी इमेज के चलते क्लासिकली ट्रैंड सिंगर मन्ना डे ने किशोर कुमार के साथ गाने से मना कर दिया। मोहम्मद रफी की आवाज की दुनिया फैन थी लेकिन रफी खुद जिनकी आवाज के फैन थे वो मन्ना डे थे। आखिर क्यों इतनी शानदार आवाज के बाद भी वे कभी ए-लिस्टर सिंगर नहीं बन सके।

कलकत्ता के एक बंगाली परिवार में 1 मई साल 1919 को मन्ना डे का जन्म हुआ। बचपन में पिता पूरन चन्द्र डे  और मां  महामाय से ज्यादा वे चाचा कृष्ण चंद्र डे के पास रहते। कृष्ण चंद्र डे 30 के दशक में बंगाली फिल्मों में मशहूर सिंगर और म्यूजिक डायरेक्टर थे। वो क्लासिकल म्यूजिक के टीचर थे और  म्यूजिक डायरेक्टर एस डी बर्मन के भी गुरु रहे हैं। बचपन में कुश्ती और फुटबॉल की तरफ रुझान रखने वाले मन्ना डे का झुकाव म्यूजिक की तरफ अपने चाचा की वजह से आया।

मन्ना डे ने अपनी ऑटोबायोग्राफी ‘यादें जी उठी’ लिखी है। जिसमें वे लिखते हैं कि घर में डॉक्टर भी थे और इंजीनियर भी । इसी वजह से पिताजी चाहते थे मन्ना डे एक वकील बने। लेकिन, पूरी तरह से म्यूजिक में रमे मन्ना डे कॉलेज के दिनों में क्लास में बैठ कर खूब ताल दे-देकर गानें गाते। प्रिंसिपल ने भी डांटने की बजाय सपोर्ट किया।

ग्रेजुएशन करने बाद वे साल 1942 में मुंबई आ गए। वहां एसडी बर्मन के साथ बतौर असिस्टेंट म्यूजिक डायरेक्टर काम करने लगे। वक्त गुजरा तो डायरेक्टर फानी मजूमदार की फिल्म ‘तमन्ना’ के गीत ‘जागो आई उषा पोंची बोले जागो’ सुरैया के साथ गाने का मौका मिला। ये गीत  सुपरहिट हुआ और उनकी गाड़ी चल पड़ी।

साल 1943 में डायरेक्टर विजय भट्ट की फिल्म ‘राम राज्य’ रिलीज हुई, जिसमें मन्ना डे ने एक गाने को आवाज दी। ‘राम राज्य’ एक ऐसी फिल्म थी, जिसे महात्मा गांधी ने अपनी जिंदगी में देखा।

काम जमने लगा तो म्यूजिक ने ही मन्ना डे को अपनी जीवनसाथी सुलोचना कुमारन से मिलवाया। साल 1953 को मन्ना डे ने केरल की सुलोचना कुमारन से शादी की। इनकी दो बेटियां सुरोमा और सुमिता है। 

एक ऐसा भी दौर था जब मन्ना डे को अपमान का सामना करना पड़ा फिर अपनी आवाज की दम की वजह से फिल्म मेकर्स को झुकना पड़ा। किस्सा है साल 1956 में रिलीज हुई फिल्म ‘चोरी चोरी’ के गीत ‘ये रात भीगी¬-भीगी’ का। फिल्म प्रोड्यूसर ए.वी. मय्यपन इस गीत में लता के साथ मुकेश की आवाज चाहते थे। लेकिन म्यूजिक डायरेक्टर शंकर-जयकिशन मुकेश की जगह गाने को मन्ना डे से गवाना चाहते थे। मय्यपन नहीं माने तब राज कपूर ने समझाया और जब ये गाना रिकॉर्ड हुआ। तो मन्ना डे की आवाज सुनकर मय्यपन ने कहा कि, मुझे गर्व होगा, अगर ये गाना आपकी आवाज में फिल्म से जुड़ेगा।

मन्ना डे को शुरुआती दौर में पापुलैरिटी नहीं मिली। वजह थी उनकी आवाज किसी एक्टर पर फिट नहीं बैठती। वे महमूद और प्राण के लिए गीत गाते। प्राण के लिए उन्होंने मनोज कुमार की फिल्म 'उपकार' में 'कस्मे वादे प्यार वफा...' और अमिताभ बच्चन की फिल्म जंजीर में 'यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी...' जैसे गीत गाए। वहीं महमूद के लिए फिल्म भूत बंगला का ‘आओ ट्विस्ट करें’ और फिल्म 'पड़ोसन' में ‘एक चतुर नार...’ जैसे गीत गाए। इस गाने को लेकर भी एक किस्सा है।

दरअसल, साल 1968 में रिलीज हुई फिल्म पड़ोसन के गीत ‘एक चतुर नार’ में किशोर कुमार ने भी अपनी आवाज दी थी। पहले मन्ना डे ने गाने से मना कर दिया। वजह थी कि इस गीत में बीच-बीच में कुछ मजाकिया शब्द थे। मन्ना डे का कहना था कि वो म्यूजिक में मजाक नहीं कर सकते। उनकी बात मानी गई। लेकिन जब रिकॉर्डिंग हुई तो किशोर कुमार ने मजाकिया अंदाज में गाना शुरू कर दिया। मन्ना डे चुप रहे और बगैर किसी मजाकिया शब्द का इस्तेमाल किए अपने हिस्से का गीत गाया।

मन्ना डे की आवाज में एक अजीब सी उदासी भी थी। चाहे वो फिल्म काबुलीवाला का 'ए मेरे प्यारे वतन' हो या फिर फिल्म आनंद का गीत ‘जिदंगी कैसी है पहेली हाय’। फिल्मी किस्सों की मानें तो मन्ना डे की आवाज से सजा गीत ‘जिंदगी कैसी है पहेली हाय’ पहले फिल्म के बैकग्राउंड में बजने वाला था, लेकिन जब सुपरस्टार राजेश खन्ना ने गीत को सुना तो कहा कि, इस गीत को उन पर पिक्चराइज किया जाना चाहिए। ये गीत जब रिलीज हुआ तो मन्ना डे के साथ-साथ राजेश खन्ना को भी करियर में नई ऊंचाइयां दे गया।

जब भी क्लासिकल या कोई कठिन गाना गवाना हो तो प्रोड्यूसर और म्यूजिक डायरेक्टर सिर्फ मन्ना डे को ही अप्रोच करते। क्लासिकल में पारंगत होने से वे टाइपकास्ट का शिकार हुए। जबकि ऐसा नहीं है। वे एक वर्सटाइल सिंगर थे।

साल 1970 में रिलीज हुई राज कपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ का ‘ऐ भाई जरा देख के चलो’ या फिर साल 1949 की फिल्म ‘चलती का नाम गाड़ी’ का 'बाबू समझो इशारे'। ये गाने इन्होंने ही गाए हैं । जो आज भी सुपरहिट है। उन्होंने फिल्म ‘श्री 420’ का 'दिल का हाल सुने दिल वाला', और फिल्म ‘बॉबी’ का 'ना मांगू सोना चांदी' जैसे गीत भी गाए हैं।

फिर भी ये ए-लिस्टर सिंगर नहीं बन सके। इनका क्लासिकल में स्पेशलिस्ट होना वरदान नहीं श्राप साबित हुआ।

मन्ना डे ने अपने पांच दशक के लंबे करियर में रोमांटिक, मस्ती भरे, झूमती कव्वाली और ठेठ रागों के साथ हर कैटेगरी के गीतों को अपनी आवाज दी। इन्होंने हिन्दी फिल्मों के अलावा बंगाली, गुजराती, मराठी, मलयालम, कन्नड़ और असमी भाषा में 3500 से भी ज्यादा गाने गाए हैं।

पद्मश्री, पद्म भूषण और साल 2007 में दादा साहेब फाल्के अवार्ड से नवाजे गए मन्ना डे ने 90 के दशक में म्यूजिक इंडस्ट्री से दूरी बना ली। 24 अक्टूबर, साल 2013 वो दिन जब उनका 94 साल की उम्र में हार्ट अटैक से निधन हो गया।

ऐसा कहते हैं कि मन्ना डे केवल शब्दों को ही नहीं गाते, वो शब्द के पीछे छिपे भाव को भी खूबसूरती से सामने लाते। शायद यही कारण है कि, कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी अमर कृति मधुशाला को आवाज देने के लिए मन्ना डे को ही चुना।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

Comment

https://manchh.co/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!