Singer Master Madan : बढ़ती पाप्यूरैलिटी ने सिर्फ 14 साल की उम्र में ले ली जान!

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ये बात 1930 के आसपास की है। शिमला के धरमपुर गांव में संगीत की महफिल सजी हुई थी। एक से बढ़कर एक सिंगर अपनी परफॉर्मेंस दे रहे थे। इन्हीं सबके बीच एक बच्चे को भी गाना गाने का मौका मिला। सिर्फ तीन साल की उम्र के इस बच्चे की गायकी सुन लोग मंत्रमुग्ध हो गए। आज के पहले ऐसी आवाज किसी ने नहीं सुनी थी।

लोगों ने इस बच्चे पर इनामों की बारिश हो गई। किसी ने पैसे दिए। किसी ने सोने की चेन और अंगूठी तक दे दी। धीरे-धीरे ये आवाज पूरे देश में छा गई। लेकिन खबर आई की सिर्फ 14 साल की उम्र में उसका निधन हो गया। किसी ने उसे दूध में पारा घोलकर पिला दिया था। वजह थी बढ़ती पाप्यूरैलिटी। आज कहानी 10-12 साल लंबे म्यूजिक करियर में कुल 08 गाने गाकर अपनी आवाज का जादू बिखेरने वाले मास्टर मदन की।

बादशाह अकबर के नवरत्न में शामिल अब्दुल रहीम जो एक महान कवि थे जिन्हें खान-ए-खाना की उपाधि मिली। उन्हीं के नाम पर पंजाब के जालंधर में गांव था खानखाना। जहां पत्नी पूरण देवी के साथ सरदार अमर सिंह रहा करते थे। अमर सिंह बिट्रिश गवर्नमेंट में एजुकेशन डिपार्टमेंट में तो काम करते ही थे। लेकिन दिलचस्पी म्यूजिक में भी रखते थे।

हारमोनियम और तबला बजाने में माहिर अमर सिंह के घर 28 दिसंबर साल 1927 को मदन का जन्म हुआ। मदन भी महज दो साल की उम्र में 14 साल बड़ी अपनी बहन शांति से म्यूजिक सीखने लगे। सिर्फ 03 साल की उम्र में शिमला के धरमपुर गांव में एक इवेंट में मदन ने 'वंदन है शारदा नमन करूं...' नाम का भजन गाया। ये उनकी पहली पब्लिक परफॉर्मेंस थी। कहते हैं कि उस इवेंट के बाद लोग उनकी आवाज के दीवाने हो गए। ये बात अपने दौर के मशहूर सिंगर केएल सहगल के कानों पर पड़ी। केएल सहगल तब शिमला में एक कंपनी में टाइपराइटर की नौकरी करते थे। वो मास्टर मदन के घर पहुंच गए। उन्हें रियाज करते सुना और उनसे बहुत प्रभावित हुए। मदन ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा शिमला से की। फिर वो अपनी बड़ी बहन के घर दिल्ली आ गए। दिल्ली में वो रेडियो में गाना भी गाते। 

मदन की उम्र के हिसाब से बहुत बड़ी बात थी। क्योंकि तब रेडियो में गुलाम अली खान, दिलीप चंदरवेदी, दीना क़व्वाल जैसे बड़े दिग्गज सिंगर भी गाते थे।

तभी म्यूजिक डायरेक्टर पंडित अमरनाथ मास्टर मदन की कुल आठ गजलें रिकॉर्ड की। जिसमें से एक गजल 'यूं ना रह रह के हमें तरसाइए आइए, आ जाइए, आ जाइए...' और 'हैरत से तक रहा है जहाने वफ़ा मुझे...’ बहुत मशहूर हुई। इसे साल 1935 में रिकॉर्ड किया गया था। गजल लिखने वाले शायर थे सागर निजामी।

कवि मैथिलीशरण गुप्त भी मास्टर मदन से काफी प्रभावित थे। उन्होंने अपनी किताब भारत भारती में उनके बारे में जिक्र किया किया है। 

 गाना गाने कहीं भी जाना होता तो मास्टर मदन अपने बड़े भाई मोहन के साथ जाते। इसके एवज में उनको सौ रुपये से लेकर 250 रुपये तक की फीस मिलती। जो उस दौर में बहुत बड़ी बात थी। धीरे-धीरे उनकी पॉपुलैरिटी पूरे देश में होने लगी।द हिंदू अखबार ने मास्टर मदन का एक फोटो बड़ी प्रमुखता से प्रकाशित किया था।

मास्टर मदन छोटी सी उम्र में इतने फेमस हो चुके थे कि तमाम नए सिंगर नाखुश से रहने लगे। उन्हें लगने लगा था की मास्टर मदन की वजह से उन्हें अच्छे मौके नहीं मिल पा रहे हैं।

मास्टर मदन ने अपनी लास्ट परफॉर्मेंस कोलकाता में दी। वो लोगों की गुजारिश में लगभग दो घंटे तक गाते रहे। यहां उन्होंने 'विनती सुनो मोरी अवधपुर के बसैया' गाया।कोलकाता से लौटने के बाद मास्टर मदन ने तीन-चार महीने ही और गाया होगा कि अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। दवाओं से उनके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हो पा रहा था। तो शिमला आ गए। लेकिन यहां भी उनके स्वास्थ्य में कुछ खास सुधार नहीं हुआ।

आखिरकार 5 जून 1942 को सिर्फ 14 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। मास्टर मदन मिलने वाले अवार्ड को अपने कपड़ों में जड़ लेते थे। इसलिए पदक पहने हुए ही मास्टर मदन का अंतिम संस्कार किया गया। लोग उनकी याद में आंसू बहा रहे थे। पूरी शिमला को एक दिन के लिए बंद रखा गया।

बताया जाता है कि उन्हें किसी ने दूध में पारा घोलकर पिला दिया था। इसकी वजह से वो बीमार रहे। कॉन्सपिरेसी थ्योरी के मुताबिक उनके ही किसी साथी सिंगर ने ऐसा किया था। क्योंकि उन्हें लग रहा था कि अगर मास्टर मदन रह गए, तो उन्हें लांघकर कोई आगे नहीं जा पाएगा।

साल 2022 में रिलीज हुई डायरेक्टर अन्विता दत्त की फिल्म कला में एक्टर इरफान खान के बेटे बाबिल खान ने इस फिल्म में 'जगन' का किरदार निभाया था, जो 'मास्टर मदन' की रियल लाइफ से प्रेरित था।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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