Singer Mohammed Rafi : जिनके लिए गायकी इबादद थी

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हज से लौटे एक मशहूर सिंगर से मौलवियों ने कहा – अब आप गाना न गाएं।

मौलवियों की बात मानकर उन्होंने गाना छोड़ दिया। लेकिन उसके बाद उनके फैंस उदास होने लगे। फिल्म मेकर्स उस सिंगर के घर गए कहा किआप गाना फिर से गाना शुरू करें।

उस सिंगर ने गायिकी को इबादत बताते हुए दोबारा से गाना शुरू कर दिया।

चाहे वो पहले प्यार का अल्हड़पन हो या फिर दिल टूटने का दर्दरूठे प्यार को मनना हो या फिर उसकी तारीफ करनी हो। इन्होंने अपनी आवाज से इश्क के हर तरह के रूप में रंग भरे। दुखखुशीआस्था, देशभक्ति हर तरह के एहसास को अपने सुरे से उकेरा।

कभी भी ये नहीं पूछते कि, गाने के लिए कितना पैसे मिलेगा। सिर्फ एक रुपये में कई गाने गा दिए। 

आज कहानी सदी के ग्रेट सिंगर मोहम्मद रफी की। जो बेहद शर्मीले और धार्मिक थे। न किसी से ज्यादा बातचीत और न ही किसी से लेना-देना। सिर्फ एक छोटी सी दुनिया थी, म्यूजिक और इनकी फैमिली।

24 दिसंबर साल 1924 का मोहम्मद रफी का जन्म पंजाब में हुआ। घर में गाना गाने की मनाही थी। 6 भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर रफी जिन्हें सब प्यार से फीको कहते। रफी ने फकीरों को गाते सुना तो खुद गाना शुरू किया। पढ़ाई-लिखाई में दिलचस्पी नहीं थी। पिता हाजी अली मोहम्मद जो दाढ़ी और बाल काटने का काम करते थे।

उन्होंने कहा – पढ़ाई लिखाई नहीं करनी तो बड़े भाई से बाल काटने का हुनर सीखो। लेकिन, रफी दुकान में भी अक्सर गुनगुनाया करते। ये देखकर बड़े भाई रफी को उस्ताद अब्दुल वाहिद खान के पास ले गए, गाना सीखने के लिए कहा। अब तक रफी का पूरा परिवार लाहौर में शिफ्ट हो चुका था।

रफी ने 13 साल की उम्र में ऑल-इंडिया एक्जीबिशन, लाहौर में पहली परफॉर्मेंस दी। और यही से इनकी किस्मत बदल गई। दरअसल यहां पहले अपने दौर के दिग्गज सिंगर केएल सहगल गाना गाने वाले थे। इसी दौरान बिजली चली गई। इस बात से नाराज सहगल ने गाने से इनकार कर दिया। ऐसे में आयोजकों ने रफी से परफॉर्म करने को कहा। उनका गाना केएल सहगल और म्यूजिक डायरेक्टर श्याम सुंदर ने सुना तो तारीफ करते नहीं थके। उन्होंने रफी को पंजाबी फिल्म ‘गल बलोच’ का गाना ‘परदेसी..सोनिए ओ हीरिए’ गाने का मौका दिया। ये गाना सुपरहिट हुआ।

ये रफी का जादू ही था कि जब उनकी आवाज मुंबई में बैठे एक्टर और प्रोड्यूसर नाजिर अहमद खान के कानों पर पड़ी, उन्होंने रफी के लिए एक तार भेजा। जिसमें 100 रुपये और मुंबई का टिकट था।

रफी का पहला गाना 1945 की फिल्म ‘गांव की गोरी’ का ‘अजी दिल हो काबू में’ गाना रिकॉर्ड हुआ। इसी वक्त रफी ने फिल्म ‘पहले आप’ का भी एक गाना रिकॉर्ड किया। जो एक साल पहले साल 1944 में ही रिलीज हो गई। गाने के बोले थे ‘हिंदुस्तान के हम हैं’। इसके बाद रफी की जिंदगी पूरी तरह से बदल गई।

47 के बंटवारे के बाद रफी ने अपने पूरे परिवार को लाहौर से मुंबई बुला लिया। 

रफी की बहू यास्मीन खालिद अपनी किताब 'मोहम्मद रफी मेरे अब्बा... एक संस्मरण' में लिखतीं हैं कि अब्बा की पहली शादी 13 साल की उम्र में अपने चाचा की बेटी बशीरन बेगम से हुई। लेकिन, जल्द ही तलाक हो गया। इस शादी से उनका एक बेटा सईद हुआ। इस शादी के बारे में घर के बाहरी लोगों से छिपा कर रखा गया।’

वो आगे लिखती हैं कि  साल 1944 में 20 साल की उम्र में अब्बा की दूसरी शादी बिलकिस बानो से हुई। जिनसे उनके तीन बेटे खालिद, हामिद, शाहिद और तीन बेटियां परवीन, नसरीन और यास्मीन हुईं।

साल 1948 में जब महात्मा गांधी का निधन हुआ तो रातों रात रफी की आवाज में 'सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों, बापू जी की अमर कहानी' गाना रिकॉर्ड किया गया। जिसे सुनकर जवाहरलाल नेहरू अपने आंसू नहीं रोक पाए। उन्होंने रफी को अपने घर मिलने बुलाया और बाद में 15 अगस्त को सिल्वर मेडल से नवाजा।

रफी की बहू यास्मीन खालिद अपनी किताब 'मोहम्मद रफी मेरे अब्बा...एक संस्मरणमें लिखतीं हैं कि ‘अब्बा बहुत कम बोलने वाले, जरूरत से ज़्यादा विनम्र। वो न शराब पीते न ही सिगरेट। पान भी नहीं खाते। पार्टियों में भी नहीं जाते। उन्हें खाना खाने का शौक था। रिकॉर्डिंग करने के बाद वो पतंग उड़ाया करते। उन्हें स्टाइलिश घड़ियां और फैंसी कारें पसंद थीं।

रफी ने 20 भाषाओं में करीब 26 हजार गाने गाए। 6 बार फिल्मफेयर और एक बार नेशनल अवार्ड जीता। रफी ने भजनकव्वाली, लोकगीत, क्लासिकल म्यूजिक हो या फिर गजल, गाने को हर तरह के रूप को अपनी आवाज दी। रफी अपने दौर के हर स्टार्स की आवाज बने। और तो और सिंगर किशोर कुमार के लिए भी 10 से ज्यादा गाने गाए।

रफी को ऑटोग्राफ साइन करना नहीं आता था। जैसे-जैसे वो पाप्यूलर होते गए उन्होंने ऑटोग्राफ देने की प्रैक्टिस की।

एक इंटरव्यू में उनके बेटे शाहिद रफी ने बताया था कि, ‘अब्बा ने दस्तखत की प्रैक्टिस के लिए बहुत सारे कागज बर्बाद कर दिए। लेकिन, जब वो इसमें पारंगत हो गए तो एक पत्रकार ने उनकी तारीफ करते हुए कहा कि, पूरी फिल्म इंडस्ट्री में अब्बा के ही दस्तखत सबसे सुंदर हैं।

रमजान का महीना था। 31 जुलाई, साल 1980 की रात रफी को हार्ट अटैक को आया। सिर्फ 56 साल की उम्र में ये महान गायक दुनिया छोड़ चुका था। अगली सुबह मुंबई में जोरों की बारिश हो रही थी। फिर भी रफी को अंतिम विदाई देने के लिए हजारों लोग सड़कों पर थे। मानों कुदरत भी आंसू बहा रही थी।

साल 1967 में पद्मश्री से सम्मानित मोहम्मद रफी अपनी आवाज के जरिए हमारे आसपास हमेशा रहेंगे।

अपने निधन से दो दिन पहले साल 1981 की फिल्म 'आस पास' के लिए रफी ने आखिरी गीत रिकॉर्ड किया। जिसके बोल थे -

तेरे आने की आस है दोस्त

शाम फिर क्यों उदास है दोस्त।

महकी-महकी फिजा ये कहती है

तू कहीं आसपास है दोस्त।।

तू कहीं आसपास है दोस्त।।

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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