Singer Sudha Malhotra : एक अनकही प्रेम कहानी, जिसने एक आवाज को थाम दिया

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सिंगर सुधा मल्होत्रा (Singer Sudha Malhotra ) ने अपनी सिंगिंग के दम पर पहचान बनाई। लेकिन महज 09 साल अंतराल में उनका करियर खत्म हो गया। इनकी एक अनकही प्रेम कहानी भी है जिसमें साहिर की कविता थी और आवाज से अहसास भरे थे सुधा मल्होत्रा ने।

एक गीत जो विदाई का उपहार था

तुम मुझे भूल भी जाओ तो, ये हक है तुमको, मेरी बात और है, मैंने तो मोहब्बत की है।’ ये गीत है साल 1959 की फिल्म ‘दीदी’ का। साहिर लुधियानवी ने लिखा है और सुधा मल्होत्रा ने इस गीत को  आवाज दी और धुन भी बनाई है। साहिर के साथ उनका ये आखिरी काम था। रिकॉर्डिंग के बाद साहिर साहब सुधा मल्होत्रा से बोले, 'खूबसूरती से गाई गई ये धुन एक-दूसरे के लिए हमारा विदाई उपहार हो।' फिर वो एक दूसरे से कभी नहीं मिले। सुधा मल्होत्रा ने बॉलीवुड से भी दूरी बना ली। वजह एक अनकही और दबी प्रेम कहानी थी।

साहिर की कविता, सुधा की आवाज

इस प्रेम कहानी में साहिर लुधियानवी की कविता थी और उसमें अपनी आवाज से एहसास भरे थे सुधा मल्होत्रा ने। वो सुधा मल्होत्रा जिन्होंने अपनी सिंगिंग के दम पर पहचान बनाई। उस दौर का हर बड़े से बड़ा म्यूजिक डायरेक्टर उनके साथ काम करना चाहता था। उनकी आवाज में एक ताजगी थी। लेकिन महज नौ साल अंतराल में उनका करियर खत्म हो गया।

बचपन से ही म्यूजिक का शौक

लाहौर के रहने वाली एक पंजाबी फैमिली में 30 नवंबर, साल 1936 को जन्मी सुधा मल्होत्रा चार भाइयों में सबसे बड़ी थीं। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि मेरा बचपन लाहौर में बीता। घर में सभी म्यूजिक के शौकीन थे, तो मेरी दिलचस्पी भी सिंगिंग में गई। माता-पिता ने प्रेरित किया तो मैंने शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू किया।’

गुलाम हैदर के सामने गाना गाया

छह साल की उम्र में एक प्रोग्राम में गाया। वहां म्यूजिक डायरेक्टर गुलाम हैदर मौजूद थे। उन्होंने सुधा मल्होत्रा की आवाज सुनी तो कहा ‘सुधा, एक दिन तुम बहुत नाम कमाऊंगी।’

अनिल बिस्वास ने मौका दिया

एक इंटरव्यू में सुधा मल्होत्रा ने बताया था कि  ‘10–11 साल की उम्र में मैं लाहौर के ऑल इंडिया रेडियो पर गाना गाने लगी। फिर साल 1947 का बंटवारा हुआ तो मेरी फैमिली लाहौर से दिल्ली आ गई। पिताजी शिक्षक थे। कुछ वक्त के बाद पिताजी की भोपाल में प्रिंसिपल की नौकरी लग गई। मेरा ननिहाल मुंबई में था, जहां अक्सर आना जाना लगा रहता। एक दिन मेरा गाना मामा जी के दोस्त म्यूजिक डायरेक्टर अनिल बिस्वास ने सुना तो उन्होंने मुझे फिल्म में एक गीत गाने का मौका दिया।’

14 साल की उम्र में पहला गीत गाया

साल था 1950 और फिल्म थी दिलीप कुमार और कामिनी कौशल की ‘आरजू’। गीत के बोल थे - 'मिला दे नैन'। सुधा मल्होत्रा ने 14 साल की उम्र में पहली बार किसी फिल्म के लिए गीत गया तो म्यूजिक डायरेक्टर अनिल बिस्वास ने ताली बजाकर हौसला बढ़ाया। गाना सुपरहिट हुआ और सुधा मल्होत्रा ने खूब सुर्खियां बंटोरी।

135 फिल्मों के लिए 250 से ज्यादा गाने गाए

आने वाले वक्त में इन्होंने 'धूल का फूल', 'काला पानी', 'बरसात की रात', 'अब दिल्ली दूर नहीं', 'देख कबीरा रोया' जैसी करीब 135 फिल्मों के लिए 250 से ज्यादा गाने गाए। जो सुपरहिट हुए। लेकिन अभी इनका करियर उड़ान भरता की एक दिन इन्होंने इंडस्ट्री से दूरी बना ली।वजह थी शादी, और शादी का फैसले का कारण बने गीतकार साहिर लुधियानवी।

सुधा के प्यार में गिरफ्तार हुए साहिर

दरअसल, साहिर लुधियानवी गीत लिखते और सुधा मल्होत्रा उनके गीतों को आवाज देतीं। यहां तक साहिर साहब अपने म्यूजिक डायरेक्टर से ये तक कहते कि 'अगर मेरे लिखे गीत को सुधा मल्होत्रा की आवाज मिलेगी तो मुझे खुशी होगी।' इस तरह साहिर लुधियानवी जो पहले से लेखिका अमृता प्रीतम की मोहब्बत में गिरफ्तार थे वो धीरे-धीरे सुधा मल्होत्रा से प्रेम करने लगे। कहा ये भी जाता है कि अमृता प्रीतम और साहिर लुधियानवी के बीच की दूरी की वजह सुधा मल्होत्रा ही बनीं।

साहिर के जज्बातों का सुधा की जिंदगी में असर

जब साहिर लुधियानवी के जज्बात, अफवाह और खबर बनकर फैले तो सुधा मल्होत्रा के जिंदगी में असर पड़ा। दोनों के मजहब अलग थे। घरवाले नाराज थे। अब सुधा मल्होत्रा के पास दो विकल्प थे। पहला या तो वो अपना सिंगिंग करियर जारी रखें। दूसरा वो घरवालों को खुश रखने के लिए शादी करें। इन्होंने दूसरा रास्ता चुना। साल 1960, सुधा मल्होत्रा ने “शिकागो रेडियो” के मालिक गिरधर मोटवानी से शादी कर ली।

शादी के बाद छोड़ा बॉलीवुड 

सुधा मल्होत्रा ने एक इंटरव्यू में कहा था उस दौर में फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं मानते थे। मैं एक इज्जतदार घराने की नई बहू थी तो इसकी इजाजत न मिलना स्वाभाविक था। इजाजत न मिलने के पीछे एक वजह और थी। साहिर लुधियानवी और मेरे बीच का रिश्ता। हम अच्छे दोस्त थे। जो कहा और सुना गया वो महज अफवाह थीं। ये अफवाहें न होती तो शायद मेरा करियर आगे बढ़ता। मैंने घर के बड़े-बुज़ुर्गों की इच्छा का सम्मान किया और फिल्मों को अलविदा कह दिया। महज 14 साल की उम्र में शुरू हुआ मेरा करियर 23 साल की उम्र में खत्म हो गया।’

ताउम्र अकेले रहे साहिर

इसके बाद सुधा मल्होत्रा के पहले से रेकॉर्ड हुए गीत कई सालों तक आते रहे और पसंद भी किए गए। सुधा मल्होत्रा की तो शादी हो गई। पर साहिर लुधियानवी ताउम्र अकेले रहे। वो साल 1980 में दुनिया को अलविदा भी कह गए।

जब 22 साल बाद फिर से गाना गाया

22 सालों का वक्त गुजर चुका था। एक बार सुधा मल्होत्रा किसी कार्यक्रम में एक गजल गा रही थीं। वहीं शो मैन राज कपूर भी मौजूद थे। उस वक्त राज कपूर साल 1982 की 'प्रेम रोग' बना रहे थे। फिर क्या था राज कपूर ने सुधा मल्होत्रा से फिल्म में गाना गाने का आग्रह किया। लंबे अरसे के बाद सुधा मल्होत्रा फिर से स्टूडियो पहुंचीं। इस गीत को सुधा मल्होत्रा ने साहिर साहब को डेडिकेट किया।

गाना रिकॉर्ड करते वक्त आखों में आंसू आए 

रिकॉर्डिंग के वक्त उन्हें साहिर साहब से अपनी पहली मुलाकात याद आई तो आंखों में आंसू आना स्वाभाविक था। आंखों में आंसू आना इसलिए भी स्वाभाविक था, क्योंकि गीत के बोल थे ..

ये प्यार था, या कुछ और था

न तुझे पता, न मुझे पता।

ये निगाहों का ही कसूर था

न तेरी खता, न मेरी खता।’

गाना छोड़ा पर रियाज नहीं

साल 2013 में पद्मश्री से सम्मानित सुधा मल्होत्रा आज 87 साल की उम्र में गाना तो नहीं गाती पर रियाज जरूर करती हैं। पति का निधन हो चुका है। मुंबई में बेटे-बहू और पोते-पोती के साथ रहती हैं। बेटा बिजनेस संभालता है, और बहू एक मैगजीन में एडिटर हैं।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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