Marshal Arjan Singh की कहानी, जो ड्यूटी से कभी नहीं हुए रिटायर

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साल 1965 ‘ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम’ के तहत पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जा करने की योजना बनाई। जनरल अयूब खान को यकीन था वे अपने मंसूबों में कामयाब होंगे। लेकिन वे इंडिया की ताकत से शायद वाकिफ नहीं थे। हमले की खबर पर रक्षा मंत्रालय ने इमरजेंसी मीटिंग बुलाई। इस मीटिंग में तीनों सेना के चीफ मौजूद थे। तत्कालीन रक्षा मंत्री वाईबी चव्हाण ने उस समय एअर फोर्स की कमान संभाल रहे युवा अफसर से पूछा कि – ‘आपको पाकिस्तान पर हमला करने के लिए कितना वक्त चाहिए’। उन्होंने जवाब दिया – ‘सिर्फ एक घंटा’। लेकिन महज 26 मिनट बाद ही भारत के लड़ाकू विमान अखनूर की तरफ बढ़ रहे पाकिस्तानी टैंक और सेना के खिलाफ उड़ान भर दी। जिसके बाद पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी। भारत युद्ध में जीत गया। लेकिन उस युवा अफसर को जिदंगी भर एक अफसोस रहा। बाद में वो युवा अफसर ‘मार्शल ऑफ द एयर फोर्स’ बनने वाले एकमात्र अधिकारी बना। कौन थे वो अफसर, क्या था उसका अफसोस।

इंडियन आर्मी में ‘फील्ड मार्शल’ और नेवी में ‘एडमिरल ऑफ फ्लीट’ का पद फाइव स्टार एयर ऑफिसर रैंक मार्शल के बराबर है। जो ‘एयर चीफ मार्शल’ के एक स्थान ऊपर होता है।

‘एडमिरल ऑफ फ्लीट’ का पद अभी तक किसी को नहीं मिला है। लेकिन आर्मी के दो ‘फील्ड मार्शल’ रहे हैं - पहले सैम मानेकशॉ और दूसरे केएम करियप्पा। लेकिन आज की कहानी असाधारण नेतृत्व क्षमता के धनी अर्जन सिंह की, जिनको साल 2002 में फाइव स्टार रैंक के साथ ‘मार्शल’ का ओहदा दिया गया। तीनों सेनाओं में फाइव स्टार रैंक के अफसर कभी रिटायर नहीं होते। ये एक सम्मान का पद होता है।

15 अप्रैल साल 1919 को पंजाब के लयालपुर में जो अब फैसलाबाद, पाकिस्तान में पड़ता है अर्जन सिंह का जन्म हुआ। पिता और दादा दोनों ब्रिटिश सेना में थे। तो वे भी सेना में जाने की तैयारी करने लगे। साल 1938 में रॉयल एयर फोर्स कॉलेज, क्रैनवेल, यूके में फ्लाइट कैडेट के रूप में एडमिशन लिया। फिर साल दर साल वे सेना में अपनी सेवा देते रहे।

1939 - Pilot Officer

1941 - Flying Officer

1942 - Flight Lieutenant

1944 - Squadron Leader

1945 - Wing Commander

1947 - Group Captain

1950 - Air Commander

1958 - Air Vice Marshal

1964 - Air Marshal

ये सफर इतना आसान नहीं था उन्हें एक बार कोर्ट मार्शल का सामना भी करना पड़ा वो भी ये कोर्ट मार्शल अंग्रेजों ने किया था। बात 1945 की तब भारत में ब्रिटिश शासन था। अर्जन सिंह पर आरोप था कि उन्होंने केरल की बस्ती के ऊपर बहुत नीची उड़ान भरी। अर्जन ने ये कहते हुए बचाव किया कि उन्होंने ऐसा प्रशिक्षु पायलट दिलबाग सिंह का मनोबल बढ़ाने के लिए किया। ये वही दिलबाग सिंह थे जो बाद में एयर चीफ मार्शल भी बने।

1965 युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना के प्रमुख के तौर पर अर्जन सिंह की अहम भूमिका को कभी नहीं भुलाया जा सकता। लेकिन अर्जन सिंह को जिंदगी भर एक मलाल रहा।

एक न्यूज पेपर को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि ‘हम 1965 में युद्ध जीत चुके थे और पाकिस्तान को तबाह करने की स्थिति में थे, तभी युद्ध विराम हो गया। जबकि हम उस वक्त पाकिस्तान के किसी भी हिस्से को नष्ट कर सकते थे। हमारे पास मेहर सिंह और केके मजूमदार जैसे बेहतरीन पायलट थे। जबकि पाकिस्तान अंबाला पार करने की स्थिति में भी नहीं था। दिल्ली-मुंबई-अहमदाबाद पहुंचना तो उसके सपने से भी दूर था। हमारे नेताओं ने युद्ध खत्म करने का निर्णय लिया। जिसका मुझे आजतक अफसोस है।’

साल 1969 में 50 साल की उम्र में उन्होंने वीआरएस ले लिया। 1965 में पद्म विभूषण से सम्मानित अर्जन सिंह ने करियर में 60 अलग-अलग तरह के विमान उड़ाए जब वे चीफ ऑफ एयर स्टाफ थे उस वक्त इंडियन एयरफोर्स में सुपरसोनिक फाइटर, टेक्निकल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और असॉल्ट हेलीकॉप्टर को शामिल किया था।

अर्जन सिंह ने सीमा पर न सिर्फ दुश्मन के दांत खट्टे किए बल्कि 1971 में उन्हें स्विट्जरलैंड में भारतीय राजदूत के रूप में नियुक्त किया। और जब वे साल 1989 को दिल्ली के उपराज्यपाल बने तो किसानों और गरीबों के मसीहा बने। उन्होंने राजधानी के लोगों की समस्याओं का समाधान करने और उनको हक दिलाने में अहम भूमिका निभाई। इस दौरान ‘जय जवान जय किसान’ के जयघोष को आगे करके कार्य किया था।

साल 2015 पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के पार्थिव शरीर को सलामी देते हुए अर्जन सिंह की एक तस्वीर वायरल हुई। जब वे उन्हें श्रद्धांजलि देने पालम एयरपोर्ट पहुंचे थे। यहां वो व्हीलचेयर पर आए थे, लेकिन कलाम को सलामी देते वक्त तनकर खड़े हो गए थे और पास जाकर सलामी दी थी।

16 सितंबर साल 2017 जब अर्जन सिंह 98 साल की उम्र उन्होंने दुनिया से अलविदा कह दिया। मार्शल अर्जन सिंह को राजकीय सम्मान के साथ 21 तोपों की सलामी देकर अंतिम विदाई दी गई।

अर्जन सिंह की जिंदगी में फिलॉसफी रही हैं । वे कहते थे कि ‘पेशे के प्रति ईमानदार रहो। ड्यूटी ऐसी करो कि न सिर्फ खुद बल्कि दूसरे भी संतुष्ट रहें। साथियों पर विश्वास करो। आखिरी लक्ष्य को पाने के लिए ईमानदारी से प्रयास करो। अगर आप इन सिद्धांतों पर चलते हैं तो जिंदगी में गलती नहीं होगी।’

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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