उस पहले भारतीय की कहानी जिसे कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने के बाद अमेरिका की नागरिकता मिली

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भारत के प्रधानमंत्री पीएम मोदी का अमेरिकी दौरा समाप्त हो चुका है, जिसकी चर्चा पूरे देश में रही। इस दौरे के बाद भारतीयों के लिए अमेरिकी वीज़ा के नियमों में भी राहत मिली है। आज अमेरिका में भारतीय मूल के निवासियों की संख्या भी अच्छी खासी है। साल 2012 के आंकड़ों के मुताबिक, न्यू जर्सी में रहने वाले भारतीयों की कुल संख्या दो लाख 92 हजार 256 है। लेकिन अगर बात की जाए 19 वीं सदी की तो अमेरिका की नागरिकता मिलना आसान नहीं होता था। उसी दौर में एक भारतीय ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अमेरिका की नागरिकता हासिल की। आज हम बात कर रहे हैं अमेरिका की नागरिकता लेने वाले पहले भारतीय की...

अमेरिका में 19वीं सदी में सालों से जारी नस्लभेद का दौर था। उस माहौल में भीकाजी बलसारा पहले ऐसे भारतीय बने, जिन्होंने अमेरिकी नागरिकता हासिल की। बलसारा बंबई के पारसी थे, जो साल 1900 में टाटा समूह के लिए कपास खरीदार के तौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका पहुंचे और न्यूयॉर्क में रहने लगे। ये वो दौर था जब अमेरिका में सिर्फ आजाद श्वेत लोगों को ही यूएस की नागरिकता दी जाती थी, जो कि 1790 के नैच्‌रलाइज़ेशन एक्‍ट के तहत मिलती थी। अमेरिका की नागरिकता लेने के लिए ये साबित करना बेहद जरूरी होता था कि वो आजाद और श्वेत हैं। 

भीकाजी बलसारा ने इस कानून के आधार पर ही अपनी पहली लड़ाई साल 1906 में न्‍यूयॉर्क के सर्किट कोर्ट में लड़ी। The New York Times में 29 मई साल 1910 में छपे एक रिपोर्ट के मुताबिक भीकाजी ने दलील दी कि "स्वतंत्र श्वेत व्यक्ति" क्या हैं? क्या वो खास तौर से उन उत्तरी यूरोपीय देशों से संबंधित हैं जो अमेरिकी राज्यों में रहते थे, जब फादर्स ने "स्वतंत्र श्वेत व्यक्तियों" को छोड़कर सभी को नागरिकता से प्रतिबंधित करने के लिए अपना क़ानून पारित किया था?

जज लैकोम्बे ने जून 1909 में बलसारा को नागरिकता देते हुए कहा कि “आवेदक उच्च चरित्र और असाधारण बुद्धि का सज्जन व्यक्ति प्रतीत होता है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने नैच्‌रलाइज़ेशन के आदेश के खिलाफ अपनी अपील में ये तर्क नहीं दिया है कि वो किसी शारीरिक, मानसिक या नैतिक बाधा से पीड़ित है, बल्कि ये कि वो एशियाई देशों में से एक है, जिसके इस देश में माइग्रेशन पर लॉ मेकर्स ने कभी विचार नहीं किया था।

भीकाजी को न्यूयॉर्क के साउथ कोर्ट के जज एमिल हेनरी लैकोम्बे ने इस उम्मीद के साथ अमेरिका की नागरिकता दे दी कि संयुक्त राज्य अमेरिका के वकील उनके इस फैसले को को चुनौती देंगे। साथ ही कानून की आधिकारिक व्याख्या के लिए अपील करेंगे। अमेरिकी अटॉर्नी ने लैकोम्बे की इच्छाओं का पालन किया और 1910 में इस मामले को सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स में ले गए। सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स ने सहमति जताई कि पारसियों को श्‍वेत के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इसी फैसले के आधार पर बाद में एक दूसरी फेडरल कोर्ट ने ए के मजूमदार को अमेरिका की नागरिकता दी थी।

बलसारा के पक्ष में आया ये फैसला अमेरिकी अटॉर्नी जनरल चार्ल्स जे. बोनापार्ट की 1907 की घोषणा के विपरीत था। उस फैसले में कहा गया था कि किसी भी कानून के तहत ब्रिटिश भारत के मूल निवासियों को श्‍वेत नहीं माना जा सकता है। 

हालांकि ये वो वक्त था जब भारतीय युवा अच्छी पढ़ाई के बूते सामाजिक सीढ़ी पर ऊपर बढ़ रहे थे। उदाहरण के तौर पर एक नाम है धन गोपाल मुखर्जी, जो कि साल 1910 में यूसी बर्कले आए। उस समय उनकी उम्र महज 20 साल की थी। वो बच्चों की किताबों के प्रतिभाशाली लेखक थे। उन्‍हें ‘गे-नेक: द स्टोरी ऑफ ए पिजन’ के लिए साल 1928 में न्यूबेरी मेडल से सम्‍मानित भी किया गया था। इसके बाद साल 1912 में गोबिंद बिहारी लाल कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी पहुंचे। वो सैन फ्रांसिस्को एग्जामिनर के science editor बने और इसके साथ ही बाद में वो पत्रकारिता के लिए पुलित्जर पुरस्कार जीतने वाले पहले भारतीय अमेरिकी बने। पुलित्जर पुरस्कार अमेरिका के भीतर अखबार, पत्रिका , आनलाइन पत्रकारिता, साहित्य के लिए कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा दिया जाने वाला पुरस्कार है। यह 1917 में शुरू हुआ था। जो कि अमेरिकी पत्रकारिता में सबसे prestigious award है। इसी कड़ी में साल1922 में येल्लाप्रगडा सुब्बा राव अमेरिका आए और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में बायोकेमिस्ट बने। उन्होंने cells में energy source के तौर पर एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट के काम की खोज की और कैंसर के इलाज के लिए मेथोट्रेक्सेट डेवलप किया। 

दूसरे विश्‍व युद्ध के बाद अमेरिका ने भारतीय इमीग्रेशन के लिए दरवाजा फिर खोल दिया। साल 1946 के लूस-सेलर एक्ट के अकॉर्डिंग हर साल 100 भारतीयों को अमेरिका में प्रवास की अनुमति दी गई और फिर साल 1952 के नैच्‌रलाइज़ेशन एक्‍ट ने साल 1917 के prohibited area act को निरस्त कर दिया। इसे मैककारन-वाल्टर एक्ट के नाम से भी जाना जाता था। हालांकि इसमें भी हर साल केवल 2000 भारतीयों को ही अमेरिकी नागरिकता देने की रोक रखी गई। हालांकि वक्त के साथ ही हालात भी बदलते गए और साल 1955 आते आते सैन फ्रांसिस्को में 21 hotel enterprises में से 14 गुजराती हिंदु चला रहे थे। और साल 1980 तक भारतीयों के पास करीब 15,000 मोटल थे, जो अमेरिका के सभी होटलों और मोटलों का लगभग 28 फीसदी था।

भारत से 21 वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका में इमीग्रेशन में अहम बदलाव देखा गया। बेंगलुरु, चेन्‍नई, पुणे और हैदराबाद में आईटी सेक्‍टर में जबरदस्‍त डेवलपमेंट हुआ। इसके बाद तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु से बड़ी तादाद में लोग अमेरिका गए। अमेरिका की ओर से हर साल जारी किए जाने वाले टोटल एच-1बी वीजा में 80 फीसदी से ज्‍यादा भारतीयों को ही मिलते हैं। भारतीय मूल की अमेरिकी कमला हैरिस ने 20 जनवरी 2021 को अमेरिका की पहली महिला उपराष्ट्रपति बनकर इतिहास रच डाला। वो साल 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में जो बाइडेन के साथ चल रहे साथी के तौर पर उपराष्ट्रपति चुनी गईं। उनके अलावा 20 अन्‍य भारतीय अमेरिकियों को प्रशासन में प्रमुख पदों पर नामांकित किया गया था।

 

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