Subhash Chandra Bose : जब लंदन में अफसरी की नौकरी छोड़कर भारत की तरफ किया रुख

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ये वो वक्त था जब भारत में अंग्रेजों की हुकूमत थी। पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंगे एक मशहूर वकील अपने बेटे को सिविल अफसर जैसे ऊंचे ओहदे में देखना चाहते थे। उन्होंने बेटे का टॉप स्कूल में एडमिशन करवाया। अच्छी शिक्षा दी। फिर एक दिन पिता का सपना पूरा हुआ। बेटे ने अपने पहले प्रयास में ही सिविल सर्विस परीक्षा पास कर ली। लंदन में नौकरी भी लग गई। लेकिन केवल एक साल बाद ही उस नौजवान ने इस्तीफा दे दिया। ये नौजवान कोई और नहीं नेता जी सुभाष चंद्र बोस थे। आखिर ऐसी कौन सी बात थी जब नेताजी ने भारत की तरफ रुख किया। वे 11 बार जेल भी गए। उन पर नजर रखी गई। देश छोड़कर जाना पड़ा। एक फौज तैयार की, जिसका नाम रखा 'आजाद हिंद फौज'

उस समय ओडिशा का कटक बंगाल प्रेसिडेंसी का हिस्सा था। जहां जानकीनाथ बोस अपनी पत्नी प्रभावती के साथ रहा करते थे। उनके 14 बच्चे थे। जिसमें 23 जनवरी, साल 1897 में जन्में सुभाष चंद्र बोस उनकी नौवीं संतान थे। साल 1902 में पांच साल की उम्र में मिशनरी स्कूल से पढ़ाई शुरू की। इसके बाद साल 1915 में प्रेसीडेंसी कॉलेज में फिलासफी सब्जेक्ट लेकर एडमिशन ले लिया।

सुभाष के पिता जानकीनाथ बोस बड़े सरकारी वकील थे। वे बंगाल विधानसभा के सदस्य भी थे और ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 'रायबहादुर' के खिताब से भी नवाजा। इसलिए घर में राजनीति से जुड़े लोगों का आना-जाना था।

सुभाष को भी बचपन से ही राजनीतिक माहौल मिला। सुभाष  धार्मिक और आध्यात्मिक भी थे। स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद के साहित्य को पढ़ते। गरीबों और शोषितों के लिए उनके मन में अलग जगह थी।

एक बार की बात है जब सुभाष को कॉलेज से निकाल दिया गया। इस वजह से वे एक्जाम भी नहीं दे पाए। फिर एक साल बाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पिता आशुतोष मुखर्जी की मदद से उनको दोबारा से एडमिशन मिला।

दरअसल हुआ यूं था कि साल 1916 जब कॉलेज में एक अंग्रेज प्रोफेसर ने भारतीयों के लिए कुछ अपशब्द कह दिए। इस बात पर सुभाष ने प्रोफेसर को थप्पड़ मार दिया। यही वो वक्त था जब सुभाष के मन में देश को आजाद कराने की बात आई।

लेकिन पिता जानकी नाथ बोस चाहते थे कि सुभाष सिविल की परीक्षा देकर बड़े अफसर बने। पिता का सपना पूरा करने के लिए सुभाष ग्रेजुएशन के बाद इंग्लैंड चले गए। जहां सिविल सर्विस की तैयारी की। अपने ही प्रयास में सुभाष ने साल 1920 में परीक्षा पास की। आईसीएस की वरीयता सूची में उन्हें चौथा स्थान मिला।

लेकिन, उस वक्त अंग्रेजों का भारतीयों पर जुल्म-ओ-सितम बढ़ रहा था। दरअसल, जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उन्हें विचलित कर दिया था। ये सारी खबरें उन्हें लंदन में नौकरी करते वक्त मिलती रहती। उन्होंने सोचा की अब ब्रिटिश हुकूमत के लिए अंग्रेजों की जी-हुजूरी नहीं करेंगे।

22 अप्रैल साल 1921 वो दिन जब गांधीजी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी नौकरी को ठोकर मार दी और देश की सेवा करने की ठानी। वे भारत लौट कर आ गए।

सबसे पहले वे भारत में महात्मा गांधी से मिले। लेकिन नेताजी, गांधी जी की कई बातों और विचारों से इत्तेफाक नहीं रखते थे, गांधी जी मानते थे कि हिंसक प्रयास से भारत को आजादी नहीं मिलेगी। नेताजी कहते थे अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए सशक्त क्रांति की जरूरत है। विचार अलग थे। लेकिन, दोनों का मकसद एक था 'भारत की आजादी'

साल 1921 से 1941 के बीच नेताजी को भारत के अलग-अलग जेलों में 11 बार कैद में रखा गया। वे साल 1941 में कोलकाता के एक घर में नजरबंद रहे। मौका देखकर वे वहां से भाग निकले । सबसे पहले पेशावर गए और फिर काबुल। काबुल से जर्मनी रवाना हुए। यहां उनकी मुलाकात हिटलर से हुई।

21 अक्टूबर साल 1943 को 'आजाद हिंद सरकार' की स्थापना करते हुए 'आजाद हिंद फौज' का गठन किया। 4 जुलाई, साल 1944 को बर्मा पहुंचे। और यहां उन्होंने नारा दिया 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।'

नेताजी के मौत की गुत्थी आजतक सुलझी नहीं है। 18 अगस्त, साल 1945 जापान में हवाई दुर्घटना में नेताजी की मौत हो गई। लेकिन अब तक इसका कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला। लोगों का मानना है कि नेताजी साल 1985 तक जीवित रहे। फैजाबाद के एक मंदिर में वे गुमनामी बाबा के नाम से रहते थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2016 में सुभाष चंद्र बोस से जुड़ी 100 गोपनीय फाइलों का डिजिटल संस्करण सार्वजनिक किया, ये दिल्ली के नेशनल आर्काइव में मौजूद हैं।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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