SEA में Pollution के दिखे ऐसे Side Effect जिससे NEW ZEALAND में हुई Plastic Rain

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प्लास्टिक रेन, कोई कल्पना नहीं है, बल्कि यह हकीकत बन चुकी है। हम इसे देख नहीं सकते और महसूस नहीं कर सकते लेकिन, इसे नजरअंदाज भी नहीं कर सकते। भारत समेत पूरी दुनिया में प्लास्टिक रेन हो रही है। क्या हैं ये प्लास्टिक बारिश और अब ये समझना जरूरी है कि आखिर ये प्लास्टिक कहां से आ रही है. क्या ये कभी पूरी तरह से बारिश का भी रूप ले सकता है?

एनवायरमेंटल साइंस एंड टेक्वोलॉजी की इस हफ्ते छपी स्टडी के मुताबिक ये माइक्रोप्लास्टिक हैं, जिन्हें अगर एक जगह इक्ट्ठा किया जाए। तो पूरा प्लास्टिक का पहाड़ खड़ा हो जाएगा। लेकिन ये आंखों से नहीं दिखेगा। माइक्रोप्लास्टिक का साइज 5 मिलीमीटर होता है। ये गाड़ियों, कपड़ों और पुराने टायरों समेत कई चीजों में होते हैं।

नई रिसर्च के मुताबिक ऑकलैंड के शहरी इलाकों की छतों के प्रत्येक वर्ग मीटर में हर दिन औसतन 5 हजार माइक्रोप्लास्टिक के कण गिरते हैं। अगर साल का आंकड़ा देखें तो सालभर में 74 मेट्रिक टन प्लास्टिक इक्ट्ठा हो रहा है। ये इतना प्लास्टिक है जिससे 30 लाख पानी की बॉटल्स बनाई जा सकती है. ऐसा ही न्यूजीलैंड में भी देखने को मिला।

अभी तक ये क्लियर नहीं हो पाया है कि इन माइक्रोप्लास्टिक के कणों का हमारी सेहत पर क्या असर पड़ रहा है। लेकिन ये बार-बार कहा जा रहा है कि इससे डाइजेशन से लेकर हमारी फर्टिलिटी पर भी बुरा असर डालता है प्लास्टिक की वजह से कैंसर भी होता है।  ये माइक्रोप्लास्टिक इतने छोटे होते हैं कि सांस लेने पर ये हमारे शरीर के अंदर चले जाते हैं। साल 2021 में माइक्रोप्लास्टिक के असर पर हुई रिसर्च में खुलासा हुआ है कि सांस के जरिए से हर व्यक्ति के शरीर में औसतन 74 हजार प्लास्टिक के पार्टिकल, एक साल में जाते हैं। 

इस साल की शुरुआत में हुए एक रिसर्च में इंसानी खून में भी माइक्रोप्लास्टिक के पार्टिकल मिले थे। फिलहाल माइक्रोप्लास्टिक पॉल्यूशन को कम करने के लिए तकनीकें बनाई जा रही हैं। जो इसके माइक्रोफाइबर को लगभग 95 प्रतिशत तक खत्म करने का दावा करती हैं। 

 

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