जॉय मुखर्जी का वो चार्म जो हमेशा किया जाएगा याद

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कई कामयाब फिल्में और बॉलीवुड के रोमांटिक हीरो के रूप में भरपूर पॉपुलैरिटी पाने के बाद भी ये कभी भी बेहद कामयाब एक्टरों में शामिल नहीं हो पाए। आज कहानी बॉलीवुड के पहले चॉकलेटी ब्वॉय जॉय मुखर्जी की। जिनकी लंबी हाइट, गोरा रंग, घने बाल और अलग सी खूबसूरती उनकी खासियत थी। सायरा बानो उन्हें ‘मैड मैन’ कहा करती थीं। और उस दौर में उनकी तुलना हॉलीवुड के सुपरस्टार रॉक हडसन से होती थी।

जिनके चाचा सुबोध मुखर्जी डायरेक्टर हो। अशोक कुमार और किशोर कुमार जैसे दिग्गज कलाकार जिनके मामा हो। जिनके भाई देब और शोमू मुखर्जी और पिता शशिधर मुखर्जी फिल्म प्रोड्यूसर हो वो जॉय मुखर्जी एक्टर नहीं बनना चाहते थे।

जब वे बीए की पढ़ाई कर रहे थे, तभी एक दिन पिता शशिधर मुखर्जी ने पूछ लिया कि आखिर जिंदगी में करना क्या चाहते हैं? इस सवाल के साथ ही उन्होंने फिल्म 'हम हिंदुस्तानी' का कांट्रेक्ट भी जॉय के सामने रख दिया। उन्होंने अनमने मन से ये फिल्म साइन कर ली और सोचा की पॉकेट मनी ही निकल आएगी। लेकिन जब फिल्म का ट्रायल शो हुआ, तो थियेटर से भागकर घर आ गए, क्योंकि पर्दे पर अपनी एक्टिंग और लुक देखकर वे बर्दाश्त नहीं कर पाए। लेकिन किस्मत को मंजूर नहीं था कि जॉय यूं थियेटर से भागें, आखिरकार उन्हें एक्टिंग में ही करिअर बनाना पड़ा। साल 1960 में रिलीज हुई फिल्म ‘लव इन शिमला’ से बॉलीवुड में डेब्यू किया। इस फिल्म से साधना ने भी अपना डेब्यू किया। फिल्म सुपरहीट रहीं। इसके बाद जॉय मुखर्जी ने बहुत ही कम समय में कई फिल्मों सारी फिल्मों में आशा पारेख, माला सिन्हा और सायरा बानो के साथ रोमांटिक फिल्में की और वे बॉलीवुड में चाकलेटी ब्वाय कहे जाने लगे।

इसके बाद साल दर साल 'उम्मीद', 'एक मुसाफिर एक हसीना', 'जिद्दी', 'जी चाहता है', 'इशारा', 'दूर की आवाज', 'आओ प्यार करें', 'बहू-बेटी', 'ये जिंदगी कितनी हसीन है', 'साज और आवाज' 'शागिर्द', 'एक कली मुस्काई', 'हमसाया', 'दिल और मोहब्बत', 'एहसान', 'इंस्पेक्टर', 'सांझ की बेला' जैसा फिल्में रिलीज हुई।

वक्त बदला और बॉलीवुड में धर्मेद्र, जितेंद्र, राजेश खन्ना जैसे एक्टरों का जमाना आ गया। इसके बाद जॉय की रोमांटिक इमेज धूमिल होने लगी। अपनी गिरती पॉपुलैरिटी को देखकर वे एक्टिंग छोड़कर फिल्मों का प्रोडक्शन और डायरेक्शन करने लगे। इसके बाद उन्होंने 'छैला बाबू' और 'हमसाया' जैसी फिल्में बनाई। लेकिन नाकामी ही हाथ लगी।

जॉय मुखर्जी ने साल 1985 में रिलीज हुई फिल्म ‘फूलन देवी’ में बड़े ठाकुर का रोल किया। जो बेहद पॉपुलर हुआ। फिर साल 2009 में धारावाहिक 'ऐ दिल-ए-नादान' से टीवी पर भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

24 फरवरी साल 1939 को जन्मे जॉय मुखर्जी ने 09 मार्च 2012 को इस दुनिया से अलविदा कह दिया।

जॉय मुखर्जी की एक अटकी हुई फिल्म 'लव इन बांबे' जिसको वे साल 1971 में ही बना चुके थे। ये फिल्म किन्ही कारणों में उस समय न रिलीज होकर करीब 42 साल बाद साल 2013 को उनके बेटों के प्रयासों के बाद रिलीज हो पाई। लेकिन ये फिल्म कुछ कमाल नहीं कर सकी।

जॉय को लोगों से मिलना, ऑटोग्राफ देना कभी रास नहीं आया। यहां तक कि मीडिया से भी वे दूरी ही रहते। इसकी वजह शायद यही रही होगी कि उन्हें ठोक-पीटकर एक्टर बना दिया गया था।जॉय मुखर्जी को फिल्मी दुनिया में बहुत बड़ी कामयाबी तो नहीं मिली, लेकिन उनके चार्म को हमेशा याद किया जाएगा।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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