अंग्रेजों ने प्लास से नाखून खींचे फिर बेहोशी की हालत में फांसी पर लटकाया

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12 जनवरी, साल 1934 की वो सुबह जब देश के वीर सपूत सूर्यसेन को फांसी पर लटकाया जा रहा था। इससे पहले अंग्रेजों ने उनके हथौड़े से दांत तोड़ दिए, नाखून खींच लिए, ताकि वे अपनी अंतिम सांस तक वंदेमातरम न बोल पाएं। जब वे बेहोश हो गए तो खींचकर फांसी के तख्त तक ले जाया गया। यहां तक उनके शव को परिवार को न देकर उसे ‘बंगाल की खाड़ी’ में फेंक दिया गया। ब्रिटिश हुकूमत ने अमानवीय बर्बरता और क्रूरता सूर्यसेन के साथ क्यों की।

आखिर किस गुनाह में उनको फांसी दी जा रही थी। एक दोस्त ने 10 हजार रुपये के लालच में मुखबिरी की जिसके बाद वे गिरफ्तार हो गए। हम आपको ये भी बताएंगे कि बॉलीवुड में उनके जीवन में एक फिल्म भी बन चुकी है। आज कहानी द हीरो ऑफ चिट्टागोंग सूर्यसेन की। जिनका एक सपना था जो उनकी मौत के 17 साल बाद सच हुआ।

22 मार्च साल 1894 बंगाल के चटगांव में सूर्यसेन का जन्म हुआ था। अब ये जगह बांग्लादेश में आती है। पिता रामनिरंजन टीचर थे तो सूर्यसेन भी बीए करने के बाद चटगांव के नाओपोरा के एक स्कूल में पढ़ाने लगे। सूर्यसेन जिन्हें प्यार से लोग ‘मास्टर दा’ कहते भी थे। साल 1918 ये वो दौर था जब सूर्यसेन ने अंग्रेजों को देश से भगाने की ठानी और इसके लिए खुद की आर्मी तैयारी की।

आर्मी का नाम रखा ‘इंडियन रिपब्लिकन आर्मी।’ जैसे-जैसे वक्त बीता इस आर्मी से 500 से ज्यादा लोग जुड़ गए। इनमें लड़कों के साथ लड़कियां भी शामिल हुईं।

आर्मी तो तैयार हो गई लेकिन न हथियार थे और न ही पैसे। जिसके लिए सूर्यसेन ने 23 दिसंबर साल 1923 को चटगांव में असम-बंगाल रेलवे के ट्रेजरी ऑफिस को लूटा। फिर योजना बनी हथियारों को लूटने की। ये वो घटना थी जिसने अंग्रेजी सरकार को झकझोर कर रख दिया। दरअसल चटगांव में अंग्रेज दो जगहों में अपने हथियार रखते थे। और सूयर्सन ने क्रांतिकारी गणेश घोष और लोकनाथ के नेतृत्व में दो टीमें तैयार की। किसी को शक न हो इसके लिए सभी ने सिपाही की वर्दी पहनी।

18 अप्रैल, साल 1930 की रात गणेश घोष की टीम ने चटगांव के पुलिस शस्त्रागार पर और लोकनाथ की टीम ने चटगांव के सहायक सैनिक शस्त्रागार पर कब्जा कर लिया। लेकिन क्रांतिकारियों का किस्मत ने साथ नहीं दिया। उन्हें बंदूकें तो मिलीं, गोलियां नहीं मिल सकीं। क्रांतिकारियों ने टेलीफोन और टेलीग्राफ के तार काट दिए और रेल मार्गों को रोक दिया। ब्रिटिश सरकार के संपर्क तंत्र को खत्म कर दिया। एक तरह से पूरे चटगांव पर क्रांतिकारियों का कब्जा हो गया। इसके बाद इंडियन रिपब्लिकन आर्मी पुलिस शस्त्रागार के सामने इकठ्ठा हुई, और मास्टर सूर्य सेन ने अपनी सेना से सलामी लेकर झंडे को फहरा दिया।

इस खबर के बाद अंग्रेजी हुकूमत के हाथ-पांव फूल गए।

चार दिन बाद 22 अप्रैल, 1930 को ब्रिटिश फौज ने उस जलालाबाद की पहाड़ियों को घेर लिया, जहां क्रांतिकारियों ने शरण ले रखी थी। क्रांतिकारियों ने आत्मसमर्पण न करते हुए अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। इस जंग में 100 से ज्यादा अंग्रेज सैनिक मारे गए, वहीं 12 क्रांतिकारी शहीद हो गए।

लेकिन सूर्यसेन अंग्रेजों के हाथ नहीं लगे और अंग्रेजी फौज ने उनकी तलाश तेज कर दी। वे तीन सालों तक अंग्रेजों को छकाते रहे। इस दौरान उन्होंने करीब 22 अंग्रेज अफसरों की हत्या की।

उन पर उस जमाने में 10 हजार रुपये का इनाम भी रखा गया। इसके लालच में एक धोखेबाज साथी नेत्रसेन की मुखबिरी पर 16 फरवरी साल 1933 को सूर्यसेन गिरफ्तार हो गए। नेत्र सेन की इस धोखेबाजी के कारण एक देशभक्त ने नेत्रसेन की हत्या कर दी। साथी क्रांतिकारी तारकेश्वर ने सूर्यसेन को अंग्रेजों से छुड़ाने की योजना बनाई, लेकिन इसके पहले ये खबर अंग्रेजों को लग गई और तारकेश्वर भी पकड़ लिए गए।

12 जनवरी, साल 1934 जब ब्रिटिश तानाशाही ने अमानवीय बर्बरता और क्रूरता की हद पार करके सूर्यसेन को साथी क्रांतिकारी तारकेश्वर के साथ फांसी दे दी।

अपनी मौत से एक दिन पहले सूर्यसेन ने एक पत्र अपने क्रांतिकारी साथियों के नाम लिखा था। 

उन्होंने लिखा था कि ‘मौत मेरा दरवाजा खटखटा रही है। मेरे लिए ये वो पल है, जब मैं मौत को अपने परम मित्र के रूप में स्वीकार करूं। इस सौभाग्यशील, पवित्र और निर्णायक पल में, मैं तुम सबके लिए क्या छोड़ कर जा रहा हूं? सिर्फ एक चीज - मेरा सुनहरा सपना, स्वतंत्र भारत का सपना। दोस्तों, आगे बढ़ो और कभी अपने कदम पीछे मत हटाना। स्वतंत्रता जल्द मिलेगी’

सूर्यसेन ने ये सब हंसते हुए झेला, ताकि देश को आजादी मिल सके और उनका ये सपना उनकी मौत के 17 साल बाद साल 1947 को सच हो पाया। आजादी के बाद चटगांव सेंट्रल जेल के उस फांसी के तख्त को बांग्लादेश सरकार ने स्मारक घोषित किया जहां मास्टर सूर्यसेन को फांसी दी गई थी।

साल 2010 में रिलीज हुई डायरेक्टर आशुतोष गोवारिकर फिल्म ‘खेलें हम जी जान से’ जो सूर्यसेन के जीवन पर बेस्ड है। इस फिल्म में अभिषेक बच्चन ने सूर्यसेन का रोल प्ले किया है और साथ में दीपिका पादुकोण भी मुख्य भूमिका में थीं।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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