Actor Farooq Sheikh की कहानी जो फिल्म में अपने किरदारों को जीते थे

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‘चश्मे बद्दूर’ के सीधे-साधे सिद्धार्थ हो, ‘कथा’ का शातिर वासु, ‘शतरंज के खिलाड़ी’ का लंपट शकील या फिर ‘उमराव जान’ का नवाब सुल्तान। इन सभी किरदार को निभाने वाले फारुख शेख अपनी एक्टिंग से मिडिल क्लास फैमली के दर्शकों के दिलों पर ऐसी छाप छोड़ते थे जिसे मिटाना मुश्किल होता था। ये अपने रोल को जीते थे। वे पक्के नमाज़ी भी थे। हम ये भी किस्सा बताएंगे कि क्रिकेट से पहली मोहब्बत करने वाले फारुख शेख जब एक्टर बने तो उनको फीस के रूप में एक भी पैसा नहीं मिला।

गुजरात के अमरेली में एक जमींदार परिवार में 25 मार्च साल 1948 में जन्मे फारुख शेख कॉलेज के दिनों में थियेटर करते थे। इस दौरान इतने कमाल के रोल किए कि साल 1974 में रिलीज हुई फिल्म ‘गर्व हवा’ के बॉलीवुड में ब्रेक मिल गया।

एक टीवी शो में इंटरव्यू के दौरान फारुख शेख ने बताया था कि

‘मैं मुंबई में लॉ की पढ़ाई कर रहा था। मेरे पिता भी लॉयर थे। कॉलेज का आखिरी साल था और हम लोग थियेटर में छोटे रोल कर लिया करते थे। उस समय एमएस सथ्यू ‘गरम हवा’ फिल्म बनाने जा रहे थे, लेकिन उनके पास पैसे नहीं थे। उन्होंने मुझसे और मेरे दोस्तों से संपर्क किया, हम लोगों ने तय किया कि दूसरी फिल्मों की तरह छोटे-मोटे रोल कर लेंगे’।

उन्होंने कहा था कि ‘लेकिन एमएस सथ्यू ने मुझे लीड रोल का ऑफर दे दिया। बलराज साहनी के बेटे का रोल था। मैंने सोचा ये करना सही रहेगा। बेहद संजीदा विषय पर बनाई गई फिल्म के लिए सथ्यू साहब ने 750 रुपये का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया। वो भी पैसा मुझे 20 साल बाद दिया गया। उन दिनों इस तरह की फिल्मों के लिए बजट मिलना काफी मुश्किल होता था। 750 रुपये के लालच में हमने फिल्म ‘गरम हवा’ कर ली, जो 20 साल बाद चुकाए गए।’

‘किसी से न कहना’, ‘बीवी हो तो ऐसी’, ‘एक बार चले आओ’, ‘लाखों की बात’, ‘यहां-वहां’, ‘फासले’, ‘रात के बाद’, ‘खेल मोहब्बत का’, ‘मेरे साथ चल’, ‘मोहनी’, ‘मेरा दामाद’, ‘नूरी’, ‘गमन’ जैसी 75 से ज्यादा फिल्मों में काम किया।

दीप्ति नवल और फारुख शेख की जोड़ी 70 के दशक में सबसे हिट थी। दोनों ने एक साथ ‘रंग-बिरंगी’, ‘चश्मे बद्दूर’, ‘कथा’, ‘साथ-साथ’ जैसी करीब सात से ज्यादा फिल्मों में काम किया। इस जोड़ी की आखिरी फिल्म 'लिसन अमाया' थी, जो कि साल 2013 में रिलीज हुई थी।

ज्यादातर कुर्ते पायजामे में नजर आने वाले फारुख शेख नमाज़ को लेकर बेहद पाबंद थे।

फिल्म डायरेक्टर सई परांजपे ने एक बार इंटरव्यू में बताती हैं कि

‘शुक्रवार का दिन हो। फिल्म की शूटिंग चल रही हो और कोई बहुत जरूरी सीन शूट किया जाना हो, अचानक पता चला कि फारुख तो हैं ही नहीं। नमाज़ पढ़ने चले गए हैं। लेकिन उनका स्वभाव ऐसा था कि सबका दिल जीत लेते थे।’

कहा जाता है कि फारुख जितने अच्छे एक्टर थे उतने ही अच्छे क्रिकेटर भी थे। उन्होंने भले ही अपने करियर के रूप में एक्टिंग को चुना हो, लेकिन क्रिकेट पर भी उनका बराबर फोकस रहता था। वो फिल्म की शूटिंग के साथ-साथ क्रिकेट पर भी पूरा ध्यान देते थे। उस दौर में भारत के टेस्ट मैच क्रिकेटर वीनू मांकड़ हर साल सिर्फ दो ही क्रिकेटरों को कोचिंग देते थे, जिनमें से फारुख भी एक थे।

फारुख शेख ने अपने कॉलेज की दोस्त रूपा जैन नौ साल रिलेशन में रहने के बाद शादी की।

साल 2010 में फिल्म लाहौर के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल अवार्ड मिला।

बेहतरीन एक्टिंग से दर्शकों को प्रभावित करने वाले फारुख शेख ने 65 साल की उम्र में 28 दिसंबर साल 2013 को दिल का दौर पड़ने से हमेशा के लिए दुनिया अलविदा कह दिया। इनके निधन के बाद साल 2014 में उनकी तीन फिल्में यंगिस्तान, चिल्ड्रन ऑफ वार, संगिनी रिलीज हुई।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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