कहानी बुद्ध के 'मुस्कुराने' की, भारत का न्यूक्लियर पावर दिखाने की!

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साल 1974 में 18 मई को और 11-13 मई को साल 1998 में किया गया परमाणु परीक्षण... भारत ने परमाणु परीक्षण के लिए जगह के अलावा दिन भी एक ही रखा... वो दिन था बुद्ध पूर्णिमा का.... कांग्रेस हो या बीजेपी, इंदिरा हों या अटल, जगह पोखरण ही रही, दिन भी बुद्ध पूर्णिमा का ही था और हुंकार भी एक थी... भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनाने की... पर परीक्षण तो परीक्षण ही होता है। दोनों का अंतर क्या था? वो किसे क्या दिखाना चाह रहे थे? वो किस तरह की ताकत को हासिल करना चाह रहे थे? क्या वो पाकिस्तान और चीन को डराना चाहते थे या फिर दुनिया में nuclear power बनने की ताकत को प्रदर्शित करना चाहते थे. आइए समझते हैं इससे जुड़े हर पहलु को...

भारत को परमाणु संपन्न राष्ट्र बनाने का भगीरथ प्रयास तो साल 1944 में तब शुरू हुआ जब डॉ होमी जहांगीर भाभा ने 1944 में मुंबई में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की स्थापना की... लेकिन ये प्रयास मुकम्मल हुआ 18 मई 1974 को बुद्ध पूर्णिमा के दिन जब बुद्ध एक बार मुस्कुराये थे। अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर तो 1953 में ही एटम फॉर पीस की थ्योरी दे चुके थे। भारत के पहले परमाणु परीक्षण के मेन हीरो थे होमी सेठना, जो कि एटॉमिक एनर्जी कमीशन के चेयरमैन थे, पीके आयंगर जो कि इस प्रोजेक्ट के डिप्टी हेड थे... आयगंर को मदद कर रहे थे धातु विज्ञानी राज गोपाल चिदंबरम, वैज्ञानिक राजा रमन्ना और विक्रम साराभाई... 

अब आते हैं मई 1974 में... राजस्थान के पोखरण रेंज की रेत बेहद तपी हुई थी। तापमान 44-45 चल रहा था। इस बंजर मरुस्थल में 107 मीटर गहरा गड्ढा खोदा गया। 13 मई को Atomic Energy Commission के अध्यक्ष होमी सेठना के नेतृत्व में परमाणु साइंटिस्ट्स ने उसे असेम्बल करना शुरू कर दिया था। हालांकि इसकी पूरी तैयारी बंबई के ट्रांबे स्थित परमाणु ऊर्जा केंद्र में कर ली गई थी। इस डिवाइस का नाम था पूर्णिमा। 14 मई की रात इस डिवाइस को शाफ्ट में डाल दिया गया। mythological stories में ब्रह्मास्त्र चलाने वाला भारत आधुनिक युग में इतिहास लिखने के करीब था... इस परीक्षण को लेकर पीके आयंगर इतने विश्वस्त थे कि उन्होंने कहा था कि अगर ये परीक्षण सफल नहीं होता है तो इसका मतलब ये है कि फिजिक्स के रूल्स सही नहीं हैं... पोखरण में भारत ने जिस धातु का इस्तेमाल कर पहला परमाणु विस्फोट किया वो  प्लूटोनियम था। ...3...2...1 मचान के पास मौजूद लाउडस्पीकर से काउंटडाउन शुरू हो गया। जैसे ही काउंटडाउन 5 की गिनती पर आया प्रणब ने हाई वोल्टेज स्वीच को ऑन किया।

8 बजकर 5 मिनट पर पी दस्तीदार ने न्यूक्लियर रिएक्शन शुरू करने वाले लाल बटन को दबा दिया। इधर इस आपाधापी में काउंटडाउन पहले ही बंद हो गया था। गिनती की आवाज न सुनने पर मचान पर मौजूद सेठना और रमन्ना ने सोचा कि न्यूक्लियर टेस्ट रोक दिया गया है। राजा रमन्ना अपनी जीवनी में लिखते हैं कि उनके साथी वेंकटेशन ने जो उस दौरान लगातार विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ कर रहे थे, अब चुप हो गए थे। अभी सब निराशा में ही थे कि अचानक धरती से एक रेत का पहाड़ सा उठा। लगा धरती ऊपर उठ रही है। एक मिनट तक ऐसा होने के बाद रेत फिर से नीचे जाने लगी। सभी लोग रोमांच और उत्तेजना में ही थे कि सबने महसूस किया कि एक जलजला आया है। कुछ भी सेकेंड में विस्फोट की आवाज आई। सभी वैज्ञानिक एक दूसरे को गले लगाने लगे। पोखरण से कोई 300 मील दूर नई दिल्ली में मई की उस सुबह पीएम आवास में काफी गहमा गहमी थी। इंदिरा को रेगिस्तान से एक खबर का इंतजार था, वो अपने लॉन में आम लोगों से मिल रही थीं। लेकिन मन ही मन वो टेंशन में थीं। इधर पोखरण में मचान के पास मौजूद हॉटलाइन काम नहीं कर रहा था। होमी सेठना वहां से जैसे-तैसे बदहवाशी में एक जीप चलाकर पोखरण गांव आए। यहां सेना का एक टेलिफोन एक्सचेंज था। जैसे-तैसे बड़ी मुश्किल से पीएम आवास फोन लगा। फोन पर भारत को न्यूक्लियर क्लब में शामिल करने वाले वैज्ञानिक ने लगभग चिल्लाते हुए कहा, " The Buddha is smiling." इंदिरा ने जब अपने लॉन में ये खबर सुनी तो वे झूम उठीं, एक विजेता की तरह, एक नायक की तरह... भारत अब परमाणु संपन्न राष्ट्र था। 

अमेरिका की कोई भी सैटेलाइट और उसकी कोई भी खुफिया एजेंसियां भारत के इस परमाणु कार्यक्रम का पता नहीं लगा सकी। जिसके बारे में भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री जगजीवन राम और विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह को भी जानकारी नहीं थी।

1974 से 24 साल आगे चलते हैं... (Alpha) साल 1998, तारीख 11 मई.... तिथि वही बुद्ध पूर्णिमा... लेकिन किरदार बदल गए थे... अब प्रधानमंत्री थे अटल बिहारी वाजपेयी और साइटिस्ट्स की टीम को लीड कर रहे थे मिसाइल मैन डॉ अब्दुल कलाम... 

पावर और डिप्लोमैसी की दुनिया में फायदा उसे ही मिलता है जो ताकतवर होता है। भारत ने पहला परमाणु परीक्षण तो कर लिया, लेकिन इसके बाद दुनिया के शक्तिशाली देश भारत पर CTBT (Comprehensive Test Ban Treaty) साइन करने का दवाब बनाने लगे। भारत के सामने स्थिति चुनौतीपूर्ण थी। चीन पाकिस्तान को बेधड़क न्यूक्लियर तकनीक सप्लाई कर रहा था। भारतीय सेना को भी पता था कि पाकिस्तान न्यूक्लियर हथियार हासिल कर चुका है। तब देश के सामने दो स्थिति थी, अगर भारत CTBT पर हस्ताक्षर कर देता हमेशा के लिए परमाणु हथियार बनाने से वंचित रह जाता और अगर इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं करता तो भारत को स्पष्ट रूप से ये बताना पड़ता कि वो इस संधि पर क्यों हस्ताक्षर नहीं कर पा रहा है... मई 1998 के बाद भारत को CTBT पर हस्ताक्षर करने का डेडलाइन दे दिया गया था... जिसका मतलब था कि इंडिया परमाणु हथियार बनाने की कोशिश भी नहीं कर सकता है। भारत न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (NSG) का सदस्य भी नहीं था यानी कि भारत को दुनिया को कोई देश यूरेनियम भी नहीं दे सकता था। 

भारत के सामने चुनौती बड़ी थी। मिशन को गुप्त रखना था। अत्याधुनिक अमेरिकी सैटेलाइट बाज की तरह आसमान में मंडरा रहे थे। इसी जिओ पॉलिटिकल परिदृश्य में अटल बिहारी वाजपेयी 19 मार्च 1998 को भारत के प्रधानमंत्री बने। 8 अप्रैल 1998 को वाजपेयी ने डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी (DAE) के चीफ आर चिदंबरम और डिफेंस रिसर्च डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) प्रमुख एपीजे अब्दुल कलाम को तलब किया और भारत के दूसरे परमाणु परीक्षण को हरी झंडी दे दी। अब वैज्ञानिको के पास तैयारी करने के लिए मात्र 32 दिन थे। दरअसल भारत के परमाणु वैज्ञानिक न्यूक्लियर टेस्ट की तैयारी काफी पहले से कर रहे थे। ये मिशन सिक्रेट रह सके इसके लिए भारत के सभी बड़े वैज्ञानिक अंडरकवर हो गए। BARC और DRDO के वैज्ञानिक जब भी पोखरण मुआयने के लिए आते तो वे सैन्य अफसरों की पोशाक में होते। पूर्व राष्ट्रपति और डीआरडीओ के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ कलाम को मेजर जनरल पृथ्वी राज बना दिया था। डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी के चीफ आर चिदंबरम मेजर जनरल नटराज बन गए। डॉ अनिल काकोदकर को भी नया कोड नेम दिया गया। टेस्ट साइट के डायरेक्टर के संथानाम भी कैप्टन बन गए। दरअसल सरकार किसी भी कीमत पर नहीं चाहती थी कि पोखरण रेंज में हो रहे उनके दौरों की खबर लीक हो। चुनौती उस Metal को पोखरण लाने की थी जिससे धमाका होना था। बात हो रही है प्लूटोनियम की... टेस्ट से 10 दिन पहले इंडियन आर्मी के चार ट्रकों में BARC से उस मेटल को एयरपोर्ट लाया गया और 1 मई की रात 3 बजे छत्रपति शिवाजी एयरपोर्ट से इस सामग्री को इंडियन एयर फोर्स के विमान एएन-32 से जैसलमेर लाया गया। यहां से आर्मी के काफिले में चार ट्रकों के जरिए प्लूटोनियम के गोलों को पोखरण लाया गाया।  प्लूटोनियम मिल जाने के बाद अब काम असेम्बलिंग का था। अमेरिकी खुफिया तंत्र को चुनौती देने के लिए ये काम अंधेरे में किया जा रहा था। जिस बंकर में ये असेम्बलिंग की जा रही थी उसे प्रेयर हॉल का नाम दिया गया था।  यहां पर विस्फोट के दूसरे उपकरण और अन्य सुविधाओं को तैयार करने में इंडियन आर्मी की 58th इंजीनियर रेजिमेंट पहले से ही लगी थी। 

भारत ने 11 मई को 3 और 13 को 2  परीक्षण किए। इसके लिए 5 साफ्ट बनाए गए। इनके नाम भी चौकाने वाले थे। व्हाइट हाउस साफ्ट 200 मीटर गहरा था, ताजमहल की गहराई 150 मीटर थी। सबसे पहले 10 मई को रात 8.30 बजे 'कुंभकरण' में न्यूक्लियर डिवाइस डाला गया। इसके बाद 11 मई को 4 बजे सुबह 'व्हाइट हाउस' और 7.30 बजे 'ताजमहल' में डिवाइस डाल कर सील कर दिया गया। 3.45 मिनट पर तीनों टेस्ट कर दिए गए। भारत 24 साल बाद एक बार फिर दुनिया को चकमा देकर परमाणु विस्फोट कर चुका था। टेस्ट का नाम ऑपरेशन शक्ति था। इसमें जो ऊर्जा पैदा हुई थी वो 45 किलोटन टीएनटी थी। 

परीक्षण जमीन के अंदर किया गया था। यहां पर फिजन और फ्यूजन तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। इस कामयाब ब्लास्ट की जानकारी मिलते ही दिल्ली में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दुनिया को इसकी जानकारी दी और इसी के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान का नारा दिया था। 

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