वो विदेशी डिशेज जो अब इंडिया में है बेहद पॉपुलर

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भारतीय रसोई की अनूठी पहचान, मां, मसाले और मजेदार पकवान आप शायरी से समझ गए होंगे की आज खाने की बात होगी। समोसा, जलेबी, गुलाब जामुन का जब भी नाम सुनते है तो मुंह में पानी आना लाजमी है। देश के घर-घर में ये डिशेज बेहद चाव से खाई जाती हैं। लेकिन आपको यकीन नहीं होगा कि ये डिशेज इंडियन नहीं हैं बल्कि विदेशी हैं। आज किस्सा उन डिशेज का जो किसी दूसरी कंट्री की फेमस डिश थी लेकिन अब इंडिया में भी बेहद पॉपुलर है।

सबसे पहले समोसा - ज्यादा खर्चा न हो और दोस्तों या ऑफिस में कलिग्स को ट्रीट देनी पड़े तो समोसे का ही ख्याल आता है। जब भी घर में कोई भी मेहमान आता है तो उनको समोसा खिलाए बगैर जाने नहीं देते।

समोसा 13वीं और 14वीं सदी में ईरान से अफगानिस्तान होते हुए इंडिया आया। तजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसी जगहों में समोसे में मीट को कटे प्याज के साथ मिलाकर बनाते थे। लेकिन जब समोसा इंडिया पहुंचा तो उसमें भरे जाने वाले मांस की जगह आलू ने ली। देश की कई जगहों पर समोसे में सूखे मेवे, चॉकलेट, पनीर या कोई दूसरी वेजिटेबल डालते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा आलू भरा ही समोसा मिलता है।

मशहूर लेखक और जेएनयू में रहे प्रो. पुष्पेश पंत लिखते हैं

समोसे का जिक्र इब्नेबतूता के ट्रैवेलॉग में मिलता है। शंहशाह मोहम्मद बिन तुगलक समोसे को शौक से खाया करते थे। आइन-ए-अकबरी और अकबरनामा में भी समोसे का जिक्र मिलता है। जिसमें समोसे को संबूसक और संबोसा कहा गया है। बंगाल में जब ये पहुंचा तो इसके तिकोना होने के कारण उसे सिंघाड़ा कहा गया।

लेकिन आपको फिर से हैरानी होगी। इसमें भरा जाने वाला आलू जिसके बिना हमारा एक वक्त का खाना अधूरा रहता है। न जाने कितनी सब्जी जिसमें आलू न पड़े तो स्वाद नहीं आता है। लेकिन ये आलू भी विदेशी है। 14वीं सदी में जब पुर्तगाली इंडिया में आए थे तो आलू अपने साथ लाए।

जलेबी सुबह नाश्ते के वक्त मिल जाए तो क्या कहने। पूरा दिन तरो-ताजा ही रहता है।

लेखक पुष्पेश पंत बताते हैं कि जब फारसी आक्रमणकारी भारत आए तब से जलेबी प्रचलन में आई। जलेबी को जोलाबिया, जेरी, जिलापी भी कहते है। तब से लेकर ये इंडिया की पॉपुलर डिश बन गई। नॉर्थ इंडिया में लोग पतली वहीं साऊथ इंडिया में लोग थोड़ी सी मोटी जलेबी खाना पसंद करते है।

अगर खाने के मेन्यू में गुलाब जामुन हो तो जश्न का मौका फिका पड़ जाता है।

लेकिन ये भी फारसी डिश हैं। हम जिस गुलाब जामुन को जानते हैं, वो है तली हुई खोये की गेंद जिसे चाशनी में भिगोते हैं। लेकिन पहले फारसी इसे शहद में भिगो कर खाते थे। फारसी डिश ‘लुकामत अल कदी’ भारत आते-आते गुलाब जामुन बन गया। कहते है मिडिल ईस्ट और सेंट्रल ईस्ट के लोग इसे बेहद पसंद करते है।

वहीं कुलफी, फिरनी और फालूदा भी मिडिल ईस्ट और सेंट्रल ईस्ट के लोगों की देन है। कोई भी पूजा हो तो प्रसाद के रूप में हलुआ मिलता है। ये हलुआ भी अरेबिक डेलीकेसी है। जिसे हलऊ कहते है। हलऊ का अरबी में मतलब होता है मिठा।

वहीं सुबह-शाम पी जाने चाय भी चीन की खोज है।

कहते है कि चीनी शासक शेन नुंग बग़ीचे में बैठे गर्म पानी पी रहे थे। तभी एक पेड़ की पत्ती उस पानी में आ गिरी जिससे उसका रंग बदला और महक भी उठी। राजा ने चखा तो उन्हें इसका स्वाद बड़ा पसंद आया और इस तरह चाय का इनवेंशन हुआ। भारत में अंग्रेज़ों ने चाय के प्रोडक्शन की शुरुआत साल 1836 और साल 1867 में श्रीलंका में की। पहले खेती के लिए बीज चीन से ही आते थे लेकिन बाद में असम चाय के बीज़ों का यूज होने लगा। 19वीं सदी से पहले तक चाय की खपत न के बराबर थी।

लेकिन आज भारत के हर चौराहे, हर नुक्कड़ पर आपको कुछ मिले न मिले चाय जरूर मिल जाएगी। आज पूरी दुनिया इंडियन टी की दीवानी है। यहां चाय की 50 से ज़्यादा तरह की वैरायटी और दर्जनों रेसिपी मिलेगी। 

इस लिस्ट में राजमा चावल, दाल-चावल भी है जो इंडियन नहीं है। राजमा मेक्सिको और ग्वाटेमाला से भारत पहुंचा और दाल-चावल जो एक नेपाली डिश है वो North India के रास्ते से भारत आया। वहीं गरमा-गरम नान एक मुगलिया डिश है। वहीं चिकन टिक्का मसाला की जड़ें स्कॉटलैंड से जुड़ी बताई जाती हैं। ये ब्रिटेन का एक नेशनल डिश भी है। 

ये कुछ उदाहरण भर है। ऐसी कई डिशेज है जो भारत की नहीं है लेकिन इंडियन इनको बेहद पसंद करते है।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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