Veer Savarkar : पहले क्रांतिकारी, जिन पर आजाद भारत में चलाया गया मुकदमा

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28 मई, ये तारीख बेहद महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र के नए मंदिर के लिए। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का अंतिम संस्कार के लिए। और वीर सावरकर की जयंती के लिए। इसी तारीख को लेकर राजनीति गरमाई है।

विपक्षियों को ये अखरा कि, जिस दिन सावरकर का जन्म हुआ। उसी दिन नए संसद के उद्घाटन का दिन क्यों चुना गया। कहा कि, ये गांधी, नेहरू, पटेल, बोस  और आंबेडकर जैसे नेताओं को नकारने जैसा है। वहीं सत्ता पक्ष नए संसद को “नए भारत का प्रतीक” बता रहा है। कहा गया कि, 'ये गर्व की बात है कि, इसी दिन हिंदुत्व विचारक वीर सावरकर की जयंती होती है।'

आपको याद होगा कि, कुछ दिनों पहले राहुल गांधी ने कहा था 'मैं, कोई सावरकर नहीं हूं कि, माफी मांगू। मैं गांधी हूं और गांधी माफी नहीं मांगते।'

आखिर सावरकर ने अपनी जिंदगी में ऐसा क्या कर दिया कि उनकी चर्चा की जाती है? वो किसी के लिए हीरो हैं, तो किसी के लिए विलेन क्यों हैं? आज कहानी विनायक दामोदर सावरकर की, जिन्होंने बिना कलम-कागज के जेल की दीवारों पर पत्थर के टुकड़ों से 10 हजार से ज्यादा कविताएं लिखीं।

महाराष्ट्र के नासिक जिले के पास एक भागुर गांव है। जहां एक ब्राह्मण परिवार दामोदर पंत सावरकर और राधाबाई के घर 28 मई, साल 1883 को विनायक दामोदर सावरकर का जन्म हुआ। साल 1901 में सावरकर की शादी यमुनाबाई के साथ हुई। उनके तीन बच्चे हुए। बचपन में पढ़ाई में तेज सावरकर जून, 1906 को 23 साल की उम्र में वकालत की पढ़ाई करने इंग्लैंड गए। सावरकर लंदन पढ़ने तो गए थे लेकिन भारत को आजाद करने की लड़ाई मजबूती भी देने गए थे। लंदन में ग्रेस इन कालेज में एडमिशन लिया। इंडिया हाउस को अपना घर बनाया। तीन साल का वक्त गुजरा और वो इस दौरान अपने अभियान में जुटे रहे।

साल 1909 को, सावरकर के सहयोगी मदनलाल ढींगरा ने सर कर्जन वायली की हत्या कर दी। सावरकर ने पिस्टल मुहैया कराई थी। सावरकर को उस वक्त बंबई के गवर्नर ने भारत के सबसे खतरनाक पुरुषों में से एक बताया।

उन्हें साल 1910 में गिरफ्तार किया गया। दो आरोपों में 25-25 साल उम्र कैद की सजा मिली। कहा गया ये दोनों सजाए एक के बाद एक चलेंगी। यानी पूरे 50 साल की कैद। उन्हें अंडमान सेल्यूलर जेल में रखा गया। इस सजा के हिसाब से वो 23 दिसंबर, साल 1960 को ही जेल से रिहा हो पाते। इस जेल को सबसे क्रूर जेल में गिना जाता था।

एक धड़ा मानता है कि, सावरकर ने जेल से अंग्रेजों को कई दया याचिकाएं लिखी, माफी मांगी। जिसके बाद उन्हें जनवरी साल 1924, यानी 14 साल बाद इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि वो ताउम्र रत्नागिरी में ही रहेंगे। और राजनीति में भाग नहीं लेंगे। और यही घटना सावरकर के जीवन की सबसे विवादास्पद पहलुओं में से एक है।

कई इतिहास कारों का मानना था कि, अंडमान से जिस सावरकर को रिहा किया गया था, वो सावरकर अलग थेऔर जो सावरकर जेल गए थे वो सावरकर हिंदू-मुस्लिम भाईचारे और एकता के प्रबल समर्थक थे। इस बात का जिक्र साल 1857 के विद्रोह पर लिखी गई एक किताब में मिलता है। जो सावरकर ने ही जेल में रहते हुए लिखी थी। इस किताब को हिंदू-मुस्लिम एकता के रूप में देखा गया। सेल्युलर जेल से रिहा होने के बाद, सावरकर ने अपनी ऊर्जा अंग्रेजों के बजाय मुसलमानों और बाद में महात्मा गांधी और कांग्रेस के विरोध में लगाई। एक धड़ा मानता है कि जेल से रिहा होने के बाद सावरकर ने भारत की स्वतंत्रता दिलाने में कोई योगदान नहीं दिया। सावरकर ने एक विचारधारा के रूप में हिंदुत्व की नींव रखी। कहा कि भारत केवल हिंदुओं का है।

सावरकर पर साल 1937 में हिंदू महासभा के अध्यक्ष के रूप में अपने पहले भाषण में टू-नेशन थ्योरी का प्रचार करने का आरोप भी है। लेकिन इससे पहले दो अलग-अलग राष्ट्र का विचार साल 1888 में सर सैयद अहमद खान, साल 1899 में लाला लाजपत राय और साल 1930 में सर मोहम्मद इकबाल और चौधरी रहमत अली भी दे चुके थे।

सावरकर ने गांधी जी और कांग्रेस की नीतियों का हमेशा विरोध किया। लेकिन कई लोगों का मानना है कि देश विभाजन का बंटवारा करने वाली ताकतों में से एक हिंदू कट्टरता थी।

साल 1929 में सावरकर गोसडे से मिले थे और साल 1948 में, नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी। सावरकर को सह-आरोपी के रूप में गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन सावरकर को विशेष अदालत ने बरी कर दिया था। बाद इसे केंद्र सरकार ने उच्च न्यायालय में चुनौती नहीं दी।

लेकिन साल 1969 में न्यायमूर्ति जेएल कपूर जांच आयोग की एक रिपोर्ट में सावरकर को दोषी पाए गए थे। लेकिन तब तक सावरकर नहीं रहे। उन्होंने स्वेच्छा से भोजन, पानी और दवाओं का त्याग कर दिया था। जिसकी वजह से 26 फरवरी साल 1966 में उनका निधन हो गया।

उनको विलेन मानने वाले मानते है कि वो क्रांतिकारी थे जिसने अंग्रेजों से अपनी रिहाई के लिए माफी मांगी। और उनको हीरो मानने वाले मानते हैं कि सावरकर ही थे जिन्हें अपने विचारों के कारण बैरिस्टर की डिग्री खोनी पड़ी। वो पहले थे जिन्होंने लंदन में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन किए। सावरकर पहले ही थे जिनकी किताब प्रकाशित होने के पहले ही बैन कर दी गई। वो पहले क्रांतिकारी थे, जिन पर आजाद भारत में मुकदमा चलाया। जिन्होंने पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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