Veteran Actress Dina Pathak : किराए के कमरे में गुजारी जिंदगी

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दीना पाठक ने ज्यादातर मां और दादी के किरदार निभाए और अपनी सादगी की वजह से कई बार लोगों को भावुक किया। ये फिल्मों में आने से सालों पहले ही थियेटर में अपना नाम बना चुकीं थी। आजादी के लिए लड़ाई लड़ी तो कॉलेज से निकाला गया।

 

शांता गांधी थीं बड़ी बहन

साल 1931, सौराष्ट्र के एक धनी और पढ़ी-लिखी फैमिली से ताल्लुक रखने वालीं शांता गांधी जो 14 साल की उम्र में मेडिकल की पढ़ाई करने इंग्लैंड गईं। लेकिन वो पढ़ाई अधूरी छोड़कर अल्मोड़ा के महान डांसर उदय शंकर के डांस ग्रुप और इप्टा यानी इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन ज्वाइन करती हैं। सिविल इंजीनियर पिता का साथ मिला तो अपने सपनों की तरफ कदम बढ़ाया और एक महान थियेटर आर्टिस्ट, डांसर और डायरेक्टर के रूप में फेमस हुईं। इंदिरा गांधी की क्लासमेट रहीं शांता गांधी साल 1984 में पद्मश्री से सम्मानित हुईं और साल 1982 से 1984 तक संगीत नाट्य एकेडमी की अध्यक्ष भी रहीं।

एक्टिंग में रहता एक चुलबुलापन

इनकी दो बहनें थीं - एक तरला गांधी जो एक बेहतरीन थियेटर आर्टिस्ट थीं और धर्मेंद्र के साथ फिल्म 'शोला और शबनम' में बतौर एक्ट्रेस नजर आईं। वहीं दूसरी बहन वो दिग्गज एक्ट्रेस थीं जिन्होंने 'मौसम' (1975), 'गोलमाल' (1979), 'खूबसूरत' (1980), 'उमराव जान' (1981), 'तमस' (1988), 'मोहन जोशी हाजिर हों' (1984) जैसी फिल्मों में काम किया। ज्यादातर मां और दादी के किरदार निभाए और अपनी सादगी की वजह से कई बार लोगों को भावुक किया। उनकी एक्टिंग में एक चुलबुलापन भी रहता।

थियेटर के जरिए लोगों को किया जागरूक

आज कहानी फिल्मों में आने से सालों पहले ही थियेटर में अपना नाम कमा चुकीं दीना गांधी उर्फ दीना पाठक की। जिनकी जिंदगी में बेहद उतार चढ़ाव हैं। आजादी के लिए लड़ाई लड़ी तो कॉलेज से निकाला गया। थियेटर के जरिए लोगों को जागरूक किया तो जेल में डाल दिया गया। प्यार और शादी उनसे की जो बॉलीवुड स्टार्स के कपड़े सिलते। लेकिन किस्मत, उनका साथ ज्यादा दिनों तक नहीं रहा। इस वजह से दो बेटियों की जिम्मेदारी और जीवन का गुजारा अकेले करना पड़ा। करीब 47 साल की उम्र में हिंदी फिल्मों में कदम रखा। दशकों तक काम करने के बाद भी जिंदगी भर किराए के कमरे में रहीं।

जब कॉलेज से निकाल दिया गया

4 मार्च, साल 1922 गुजरात के अमरेली शहर में दीना पाठक का जन्म हुआ। बहन शांता गांधी रंगमंच से जुड़ी थीं, जिस वजह से बचपन से ही मन एक्टिंग की तरफ गया। साल 1940 जब 17-18 साल की हुईं तो गुजराती थियेटरों में काम करने लगीं। वो इप्टा से भी जुड़ीं। ये वो वक्त था जब महिलाओं का थियेटर में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। पर दीना पाठक ने इस बात की परवाह किए बगैर महिलाओं के लिए बनीं समाज की कुप्रथाओं के खिलाफ आवाज उठाई साथ आजादी की लड़ाई भी लड़ी। वो अपने नाटकों के जरिए जनता को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट रहने को जागरूक करतीं। इसलिए जेल भी जाना पड़ा। इस वजह से उन्हें मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से निकाल दिया गया। एक इंटरव्यू में दीना पाठक ने बताया था कि 'कॉलेज से निकाले जाने के बाद मैंने मुंबई के दूसरे कॉलेज में एडमिशन लिया और बीए किया।'

जब दीना को हो गई मोहब्बत

मराठी, गुजराती और हिंदी भाषा में बेहद अच्छी पकड़ रखने वालीं दीना पाठक ने 26 साल की उम्र में साल 1948 की गुजराती फिल्म – 'करियावर' से फिल्मी करियर की शुरुआत की। पर इसके अलगे 18 सालों तक उन्होंने कोई भी फिल्म नहीं की वो इन सालों में थियेटर ही करती रहीं। इस दौरान दीना पाठक का दिल बलदेव पाठक के लिए धड़का, वो बलदेव पाठक जो गेटवे ऑफ इंडिया के पास कपड़े सिलने का काम करते थे। उनसे प्यार किया, शादी की। बलदेव पाठक जो आम दर्जी नहीं थेवो बॉलीवुड के कई दिग्गज अदाकारों के कपड़े डिजाइन किया करते। उन्होंने राजेश खन्ना और दिलीप कुमार जैसे स्टार्स के कपड़े भी सिले। पर बदलते फैशन के चलते दुकान चलना कम हुई तो घाटा हुआ। इस तनाव की वजह से सिर्फ 52 साल की उम्र में बलदेव पाठक का निधन हो गया। 

अकेले संभाली सभी जिम्मेदारी

अब ऐसे में दीना पाठक अकेले थीं। उन पर घर संभालने के साथ रोजी-रोटी कमाने की भी जिम्मेदारी थी। वो अपनी दोनों बेटियों को रोज सुबह पड़ोसी के घर छोड़कर काम पर निकल जातीं। जिस वजह से बच्चों के साथ उनका वक्त नहीं बीत पाता। अपनी मेहनत - लगन की वजह से एक दौर वो आया जब गुजरात में दीना पाठक के नाटकों की धूम रहती। नाटक 'भवई थियेटर' और 'मेना गुर्जरी' ने उनकी जिंदगी बदल दी। लोग दीना पाठक के नाटकों को देखने के लिए सुबह 4:00 बजे से लाइन में लग जाया करते। 'मेना गुर्जरी' वो नाटक है जिसे दीना पाठक ने साल 1957 में राष्ट्रपति भवन में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के सामने भी प्रस्तुत किया था। वहीं इस नाटक को आज भी परफॉर्म किया जाता है।

कमर्शियल फिल्मों की चमक-दमक नहीं आई पसंद

ये वो वक्त था जब उम्र के 44 साल गुजर गए थे। तब अपनी पहली हिंदी फिल्म में काम किया। साल था 1966 और फिल्म थी 'उसकी कहानी'ये फिल्म कमर्शियल हिट नहीं हुई। पर दीना पाठक की एक्टिंग पर डायरेक्टर और प्रोड्यूसर की नजर जा चुकी थी। 3 साल का वक्त और गुजरा साल 1969 में लगभग 47 साल की उम्र में उनकी एक साल में 'सात हिंदुस्तानी', 'द गुरु', 'सत्यकाम' और 'सारा आकाश' कुल चार फिल्में रिलीज हुई। इसके बाद अगले 36 सालों में 120 से ज्यादा हिंदी फिल्मों में अलग-अलग किरदार निभाकर पहचान बनाई। उन्हें कमर्शियल फिल्मों की चमक-दमक पसंद नहीं थी। इस वजह से ज्यादातर आर्ट फिल्में ही की। 80 के दशक के टीवी सीरियल 'मालगुड़ी डेज' में काम किया।

दोनों बेटियों ने बनाई अपनी पहचान 

दीना पाठक की दोनों बेटियां - रत्ना पाठक और सुप्रिया पाठक ने बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान बनाई। रत्ना पाठक ने एक्टर नसीरुद्दीन शाह और सुप्रिया पाठक ने एक्टर पंकज कपूर से शादी की। साल 1987 की फिल्म 'मिर्च मसाला' में दीना पाठक ने दामाद नसीरुद्दीन शाह और बेटी रत्ना पाठक के साथ काम किया।

शायद फिल्मों का रंग कुछ फीका रह जाता

दीना पाठक की आखिरी फिल्म साल 2003 की 'पिंजर' थी पर वो अपनी इस फिल्म को रिलीज होते हुए नहीं देख पाईं। एक साल पहले 11 अक्टूबर साल 2002 80 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया। साल 1980 में संगीत नाटक अकादमी और साल 2000 में गुजरात राज्य सरकार की तरफ से थियेटर के लिए दिए जाने वाले मेरिट अवार्ड से सम्मानित दीना पाठक को फिल्मों में लीड भूमिका तो नहीं मिली, पर शायद उन फिल्मों में ये न होतीं तो उसका रंग कुछ फीका रह जाता।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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