भारत के महान मुगल शासकों में से एक अकबर क्या वाकई अनपढ़ था ?

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मुगल शासकों में सबसे चर्चित नाम है अकबर का... मुगल वंश का तीसरा शासक और भारत के महान सम्राटों में से एक ऐसी शाही शख्सियत जिसने हकीकत में महानता के शिखर को छुआ... बहुत कम उम्र से ही अकबर की किताबों में गहरी दिलचस्पी थी। उसकी लाइब्रेरी में 24000 से भी ज्यादा खास किताबों का संग्रह था। दिलचस्प बात ये भी है कि मुगलों में बादशाहों को अरबी, उर्दू और फारसी समेत कई भाषाओं की जानकारी रही है। ऐसे में अकबर का अनपढ़ होना चौंकाता है। आखिर ऐसा क्या रहा जिसके चलते अकबर अनपढ़ रहा ?

अकबर अपनी शानदार उपलब्धियों, किताबों से लगाव, लेखकों और विद्वानों के लिए सम्मान के बावजूद अकबर अनपढ़ रहा। अनपढ़ इस मायने में कि वो न लिख सकता था, न पढ़ सकता था... इसके गवाह खुद अकबर का उत्तराधिकारी जहांगीर और पुर्तगाली प्रीस्ट जेसुइट, विद्वान फादर एंथनी मोनसेरेट भी रहे हैं, जो फतेहपुर सीकरी के शाही दरबार में 1580 से 1583 तक रहा। इनके अलावा अकबर के दरबार में और भी कई विद्वान, प्रतिलिपि तैयार करने वाले और उच्च कोटि के कैलिग्राफर थे। 

ऐसा नहीं था कि अकबर को तालीम देने की कोशिश नहीं की गई थी। इतिहासकार एलेन स्मार्ट के मुताबिक, अकबर जब चार साल चार महीने और चार दिन का हुआ तो हुमायूं ने मुल्लाजादा मुल्ला असमुद्दीन को उसका पहला शिक्षक नियुक्त किया। ये दिन उसने दरबार के ज्योतिषियों से विमर्श कर तय किया था। लेकिन अकबर की तालीम हासिल करने में जरा भी दिलचस्पी नहीं थी। वो पढ़ने से ज्यादा कबूतरों में दिलचस्पी ले रहा था। तब हुमायूं ने असमुद्दीन को हटाकर मौलाना बायज़ीद को शिक्षक नियुक्त किया। लेकिन वो भी अकबर की पढ़ाई में दिलचस्पी पैदा नहीं कर सका और उसकी छुट्टी कर दी गई। तब हुमायूं ने काफी खोजबीन कर मौलाना अब्दुल क़ादिर की नियुक्ति की। मौलाना ने काफी कोशिश की, लेकिन अकबर की रूचि वर्णमाला सीखने में नहीं रही। वो उससे विमुख ही रहा। अकबर अपना सारा समय जंगली ऊंटों, अरबी घोड़ों और कबूतरों के साथ बिताता था और उसे कुत्तों के साथ घूमना पसंद था।

दरअसल, अकबर अपनी पर्सनल लाइफ़ में डिस्लेक्सिया जैसी बीमारी से जूझता रहा था। अकबर को अक्षरों को पहचानने में मुश्किल होती थी और वो कभी पढ़ना नहीं सीख पाया। डिस्लेक्सिया एक तरह का लर्निंग डिसऑर्डर है जिसमें ध्वनियों की पहचान, अक्षरों और शब्दों को समझने में कठिनाई होती है। 1981 में इतिहासकार एलेन स्मार्ट काफी शोध के बाद इस नतीजे पर पहुंचती हैं कि अकबर की निरक्षरता डिस्लेक्सिया की वजह से रही होगी। एलेन स्मार्ट ने ये भी पाया कि डिस्लेक्सिया के शिकार किसी भी इंसान को चित्रों को समझने, पढ़ने में कठिनाई नहीं होती है। अकबर के मामले में ये विशेषकर महत्वपूर्ण है क्योंकि जहां पारंपरिक शिक्षक अकबर को पढ़ाने में नाकाम रहे, वहीं अब्दुल समद उसे पेंटिंग सिखाने में सफल रहा। इस चित्रकार के बनाये दो चित्रों में अकबर को पेंट करते दिखाया गया है। शायद यही वजह थी कि अकबर के समय में मुग़ल चित्रकला अपने उत्कर्ष पर था। देश विदेश के कई महत्वपूर्ण चित्रकार अकबर के दरबार की शोभा बढ़ा रहे थे।

आपको याद होगा, 'तारे जमीन पर' फिल्म का नायक ईशान अवस्थी भी डिस्लेक्सिया से पीड़ित होता है। उसके मां -बाप और यहां तक कि बोर्डिंग स्कूल में भी उसकी परेशानी कोई नहीं समझ पाता है। संयोग से स्कूल में एक नए कला शिक्षक रामशंकर निकुंभ का आगमन होता है। वो समझ लेते हैं कि बच्चा डिस्लेक्सिया से पीड़ित है। वे उसकी क्षमता को पहचानने में मदद करते हैं।

अकबर अपनी इस कमी को अपनी स्मरण शक्ति से दूर करता था। जो उसके लिए पढ़ा जाता, उसे वो याद कर लेता। अब्दुल कादिर बदायुनी और अबुल फ़ज़ल की रचनाओं में ऐसे कई संदर्भ मिलते हैं जो अकबर की अभूतपूर्व स्मृति और किताबों में उसकी रूचि की गवाही देते हैं। उसने वाल्मीकि रामायण का फ़ारसी में सचित्र अनुवाद भी करवाया।

भले अकबर निरक्षर रहा, लेकिन अन्य मुग़ल शहजादों की तरह वो टर्किक और फ़ारसी भाषा में माहिर था और हिंदुस्तान के शिष्टाचार और रीति रिवाजों से अच्छी तरह वाकिफ था। पर्शियन अध्यापकों से वो ड्राइंग और बढ़ईगिरी जैसे शिल्पों की तालीम लेता रहा। कम उम्र में ही वो युद्ध कौशल में निपुण हो गया था।

पुर्तगाली  प्रीस्ट जेसुइट और यात्री एंटोनियो मोनसेरेट अपने यात्रा वृतांत में अकबर को "उत्कृष्ट निर्णय" और "अच्छी स्मृति" वाले व्यक्ति के रूप में वर्णित करते हैं। अकबर दूसरों को सुनकर खुद को शिक्षित करता था। स्वयं अकबर के बेटे जहांगीर ने अपने संस्करणों की किताब तुजुक-ए-जहांगीरी में अकबर की सभी धर्मों के जानकार लोगों, विद्वानों से बातचीत, बहस और विचारों का आदान प्रदान करने का प्रसंगों का उल्लेख किया है। सीकरी में अकबर के पंद्रह वर्षों के शासनकाल में हर गुरुवार को फतेहपुर सीकरी के इबादतखाने में धार्मिक बहस होती थी।

अबुल फज़ल अपनी किताब आईन-ए-अकबरी में लिखता है, 'अकबर रोज शाम को अपनी पसंदीदा किताब पढ़वाकर सुनता। वो किताब पढ़ने वालों का चुनाव उन लोगों में से करता जो रोजाना प्रार्थना में शामिल होते। वो उनमें से सबसे मधुर और प्रभावशाली आवाज वाले व्यक्ति को चुनता।'

ये जानना रोचक होगा कि इतिहास में दर्ज कई अहम शख्स भी डिस्लेक्सिया के शिकार थे। डिस्लेक्सिया की वजह से पिकासो को अपनी पढ़ाई के शुरुआती वर्षों में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा था। वो कक्षा के बुरे छात्र थे। उस दौरान वो चुपचाप बैठे रहने की बजाय अपना स्केच पैड निकालते और उस पर चित्र बनाते। कला विशेषज्ञों का मानना है कि डिस्लेक्सिया का स्पष्ट प्रभाव पिकासो के बनाए चित्रों पर दिखता है। 

आइंस्टीन भी डिस्लेक्सिक थे। 6 साल की उम्र में वो बोलना सीख पाए। प्राइमरी स्कूल में जहां याद करने और रटने पर ध्यान दिया जाता था, वो उनके लिए मुश्किल वक्त था। और बाद में स्कूल बदलने पर जहां रचनात्मक सोच और सीखने को प्रोत्साहित किया जाता - वहां उन्होंने बहुत कुछ सीखा।

 

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