देश में खाप पंचायतों का क्या है इतिहास, कब और कैसे शुरू हुई 'फैसला तो हो गया ताऊ...' कहने की प्रथा?

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देश में इन दिनों सबसे चर्चित मुद्दा है राजधानी दिल्ली में पहलवानों का धरना... और अब खाप नेता प्रदर्शन कर रहे पहलवानों के समर्थन में आ गए हैं और भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व प्रमुख और बीजेपी के लोकसभा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। खाप नेताओं ने बृजभूषण शरण सिंह की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की है और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया है। वहीं बीते शुक्रवार को हरियाणा के कुरूक्षेत्र में हुए एक महापंचायत सम्मेलन में सरकार को इस मामले पर कार्रवाई करने के लिए 9 जून की समय सीमा दी है। माना जा रहा है कि खाप पंचायतों का समर्थन मिलना पहलवानों के पक्ष को मजबूती दे सकता है, क्योंकि खाप पंचायतों की अपनी एक राजनीतिक क्षमता होती है। आज हम बात करेंगे कि खाप पंचायतें क्या होती हैं और देश में इनका इतिहास क्या है?

देश में खाप पंचायतों का अपना इतिहास रहा है। खाप पारिवारिक और सामाजिक तौर पर संगठित होते हैं। एक गोत्र या बिरादरी के सभी लोग मिलकर खाप पंचायत बनाते हैं। इसके अलावा कई गांवों को मिलाकर भी खाप पंचायत बनाई जा सकती है। आसान भाषा में समझें तो खाप पंचायतें गांवों का एक सामुदायिक संगठन होती हैं, जो किसी खास जाति या गोत्र से मिलकर बनती हैं।

एमसी प्रधान की बुक द पॉलिटिकल सिस्टम्स ऑफ़ द जाट ऑफ़ नॉर्थन इंडिया (1966) के मुताबिक, खापों के तीन तरह के काम होते थे।

1- पारिवारिक / गांव के विवादों को सुलझाना

2- विश्वास के सिद्धांतों को बनाए रखना / उनकी रक्षा करना 

3- क्षेत्र को बाहरी आक्रमण से बचाना।

खाप पंचायतें अपने समुदाय में फैसले लेने में खास भूमिका निभाती हैं और समाज के बनाए नियमों से इतर जाने वालों को खाप पंचायतें सजा भी सुनाती हैं। सजा के तौर पर कुछ मामलों में जुर्माना भी लगाया जाता है और इसके अलावा खाप पंचायतों की ओर से दिया जाने वाला सबसे बड़ा दंड सामाजिक बहिष्कार होता है। हालांकि, खाप पंचायतों का कोई कानूनी आधार नहीं है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट भी खाप पंचायतों को गैर-कानूनी घोषित कर चुका है। 

दरअसल, खाप दो शब्‍दों को मिलाकर बनाया गया है। इसमें ख के मायने ‘आकाश’ से और आप का मतलब ‘जल’ से है। खाप शब्‍द की प्रचलित परिभाषा है कि एक ऐसा संगठन, जो आकाश की तरह सबसे ऊपर है और जल की तरफ साफ और सभी के लिए है। हालांकि, खाप पंचायतों में पुरुषों का वर्चस्‍व रहता है। इनमें महिलाओं का कोई प्रतिनिधित्‍व नहीं होता है। खापों के संगठन और नेता सामाजिक प्रभुत्व के आधार पर चुने जाते हैं। वैसे तो खाप पंचायतें पूरे देश में मौजूद हैं। फिर भी हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में इनका प्रभाव ज्यादा है। महापंचायत को सर्व खाप पंचायत भी कहा जाता है। जब भी किसी सामूहिक मुद्दे पर फैसला लेना होता है तो कई खापें अपने प्रतिनिधि को शामिल कर सर्व खाप बनाती हैं। इसके बाद उस मुद्दे पर चर्चा और फैसले के लिए महापंचायत बुलाई जाती है। महापंचायत का फैसला सभी खाप स्‍वीकार करती हैं। मौजूदा समय में सिर्फ जाटों की 3,500 से ज्‍यादा खाप हैं। 

खाप कई तरह की होती हैं। इनमें बड़वासनी खाप में 12 गांव होते हैं। वहीं, कराला खाप में 17, चौहान खाप में 5, तोमर खाप में 84, दहिया चालीसा खाप में 40, पालम खाप में 365 और मितरोल खाप में 24 गांव शामिल रहते हैं। सर्वपाल खाप फरीदाबाद, बल्लभगढ़ से लेकर मथुरा के छाता, कोसी तक फैली है। इस खाप में करीब 1,000 गांव हैं। सर्वखाप को जाट जाति की सबसे बड़ी पंचायत व्यवस्था के तौर पर स्‍वीकार किया जाता है। इसका मुख्यालय मुजफ्फरनगर के सोरम गांव में है।

खाप पंचायतें प्राचीन समाज का रूढ़िवादी हिस्‍सा मानी जाती हैं। ये कई मामलों में आधुनिक समाज और जीने के बदलते हुए पैमानों के साथ तालमेल बैठाने में नाकाम नजर आती रही हैं। यही वजह है कि खाप पंचायतों में आज भी महिलाओं और युवाओं का प्रतिनिधित्‍व नहीं है। यहां बुजुर्गों की ओर से लिए गए फैसले सभी को मानने होते हैं। युवाओं को खाप पंचायतों में बोलने तक की अनुमति नहीं दी जाती है। कई बार देखा गया है कि खाप पंचायतों ने प्रेम विवाह या एक गोत्र में शादी करने वालों के खिलाफ ऐसे फैसले दिए हैं, जो समाज को शर्मसार करने के लिए काफी हैं। कई बार इनका नाम इज्‍जत के नाम पर की गई हत्‍याओं में भी उछला है।

अगर खाप के इतिहास की बात करें तो खाप की शुरुआत राजा हर्षवर्धन के शासनकाल से मानी जाती है। इतिहासकारों का मानना है कि सन् 643 में कन्‍नौज में क्षत्रियों का बड़ा जुटान हुआ था। इसका नाम हरियाणा सर्वखाप पंचायत रखा गया था। बता दें कि राजा हर्षवर्धन के शासनकाल में हरियाणा पूर्व में देहरादून, मैनपुरी, बरेली तो पश्चिम में गंगनहर तक और उत्‍तर में सतलज नदी तक तो दक्षिण में चंबल नदी तक फैला हुआ था। उस समय की सर्वखाप पंचायत में 300 खाप और संगठन शामिल हुए थे। इसी सर्वखाप पंचायत में थानेसर के सम्राट हर्षवर्धन का कन्‍नौज के राजा के तौर पर राज्‍याभिषेक हुआ था। उस समय सर्वखाप के केंद्रों में थानेसर, दिल्‍ली, रोहतक और कन्‍नौज शामिल थे। खाप का 1857 की क्रांति में भी काफी योगदान रहा था।

खाप उत्तर भारत की राजनीति में भी अहम स्थान रखते हैं। उनके संबंध सभी दलों से हैं। खाप नेता इससे पहले 2020-21 में तीन विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए थे। नतीजतन तीनों कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा। अब देखना है कि खाप नेताओं के सामने आने के बाद पहलवानों के आंदोलन को कितना बल मिलता है।

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