जब हैदराबाद को भारत का हिस्सा बनाने के लिए चला 'ऑपरेशन पोलो'

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आज कहानी हैदराबाद रियासत के भारत में विलय कहानी जितनी दिलचस्प है, उतनी ही संघर्षपूर्ण | Manchh न्यूज़

 

आजादी के दो महीने 11 दिन बाद जम्मू-कश्मीर, 06 महीने 05 दिन बाद जूनागढ़ की रियासत का भारत में विलय हो गया।

हैदराबाद रियासत के निजाम ने ऐलान कर दिया वो किसी भी कीमत पर भारत के साथ नहीं जाएंगे, वो स्वतंत्र रहेंगे। पर ऐसा हुआ नहीं। 

आज कहानी देश की सबसे बड़ी रियासत हैदराबाद के भारत में विलय की। ये कहानी जितनी दिलचस्प है, उतनी ही संघर्षपूर्ण।

इसके लिए भारत को पांच दिन लड़ाई लड़नी पड़ी। करीब 65 जवान शहीद हुए और कई घायल हो गए।

आपको ये भी बताएंगे कि सरदार पटेल ने हैदराबाद को ‘पेट का कैंसर’ क्यों कहा और इस पूरी कार्रवाई को ‘ऑपरेशन पोलो’ नाम ही क्यों दिया।

15 अगस्त साल 1947, आजादी मिली पर अंग्रेज देश के दो टुकड़े कर गए, भारत और पाकिस्तान। तब अंग्रेज देश में मौजूद 565 रियासतों को ये छूट दी कि वो भारत या पाकिस्तान, किसी में भी मिल सकते हैं या स्वतंत्र रह सकते हैं।

देश का छोटी-छोटी रियासतों में बंटा होना आर्थिक और सामाजिक विकास में रोड़ा था। इसके लिए इन रियासतों का भारत में विलय करना जरूरी था, तब इस काम का बीड़ा उठाया देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने।

उन्होंने कहा था कि ‘भारत को ये बर्दाश्त नहीं उसके क्षेत्र का कोई ऐसा हिस्सा रह जाए जो उस संघ को नष्ट कर दे जिसे सब ने मिलकर अपने खून पसीने ने बनाया है’।

565 में से 562 रियासतों ने भारत में विलय का फैसला किया पर हैदराबाद रियासत के निजाम मीर उस्मान अली खान किसी भी कीमत पर भारत में मिलना नहीं चाहते थे। 

हैदराबाद का मुद्दा नासूर बन रहा था और इसलिए सरदार पटेल ने हैदराबाद को ‘भारत के पेट में कैंसर’ कहा और इस समस्या को ठीक करने का संकल्प लिया।

निजामों और मोतियों का शहर कहे जाने वाले हैदराबाद की रियासत आजादी के वक्त भारत की सबसे बड़ी रियासत थी। क्षेत्रफल इतना की इंग्लैंड और स्कॉटलैंड समां जाएं।

करीब एक करोड़ 70 लाख लोग रहते। जिसमें 85 फीसदी हिंदू, 12 फीसदी मुसलमान और बाकी ईसाई, जैन और अन्य धर्म के लोग थे। हैदराबाद रियासत के पास अपनी सेना, दूरसंचार सेवा, रेलवे नेटवर्क, डाक सेवा और रेडियो प्रसारण सेवा थी।

उस वक्त निजाम मीर उस्मान अली खान दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति माना जाता था। साल भर में करीब 25 मिलियन डॉलर कमाता। जितना अमीर था उतना ही कंजूस, नया कपड़ा शायद ही पहनता। जो कपड़े पहनता उसमें भी प्रेस नहीं होती। शायद ही कभी किसी को शाही भोजन पर बुलाता।

सरदार पटेल ने मीर उस्मान अली खान से बातचीत शुरू की, पर निजाम किसी बात पर तैयार नहीं हुए।

हैदराबाद की आबादी के 85 फीसदी हिंदू थे, जबकि अल्पसंख्यक होते हुए मुसलमान प्रशासन और सेना में महत्वपूर्ण पदों पर थे।

इतिहासकार केएम मुंशी की किताब एंड ऑफ एन एराके मुताबिक निजाम ने महम्मद अली जिन्ना को संदेश भेजा और जानने की कोशिश की, क्या भारत के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान हैदराबाद का समर्थन करेगा?

निजाम ने रजाकार नामक एक निजी सेना का गठन किया गया। रजाकारों ने बहुसंख्यक हिंदुओं पर जमकर अत्याचार किए। लोग डरकर हैदराबाद और आस-पास के इलाकों को छोड़कर भागने पर मजबूर हो गए।

सरदार पटेल को भनक लगी कि हैदराबाद पूरी तरह से पाकिस्तान के कहने में है। यहां तक कि पाकिस्तान पुर्तगाल के साथ हैदराबाद का समझौता कराने की फिराक में था जिसके बाद वो गोवा में अपने लिए बंदरगाह बनवाना चाहता था।

वहीं हैदराबाद के निजाम ने राष्ट्रमंडल का सदस्य बनने की भी इच्छा जाहिर की थी।

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू इस पूरे मुद्दे को बातचीत से हल करना चाहते थे। पर सरदार पटेल हैदराबाद पर सैन्य कार्रवाई के पक्ष में थे। दो बार भारतीय सेना की हैदराबाद में घुसने की तारीख तय हुई पर राजनीतिक दबाव के चलते रद्द करना पड़। ये भी डर था कि पाकिस्तान की सेना इसके जवाब में अहमदाबाद या मुंबई पर बम गिरा सकती है।

आखिर में सरदार पटेल ने जनरल केएम करियप्पा से पूछा कि अगर हैदराबाद के मुद्दे पर पाकिस्तान की तरफ से कोई हमला होता है तो क्या उन हालात से निपट पाएंगे?

करियप्पा ने जवाब हां में दिया। तब 13 सितंबर साल 1948 - सरदार पटेल ने भारतीय सेना को हैदराबाद भेज दिया।

इस कार्रवाई को ऑपरेशन पोलो का नाम दिया गया क्योंकि उस वक्त हैदराबाद में विश्व में सबसे ज्यादा 17 पोलो के मैदान थे।

उधर, पाकिस्तान की सेना की इतनी हैसियत नहीं कि वो भारत पर हमला कर सके और तो और ऑपरेशन पोलो के दो दिन पहले 11 सितंबर 1948 को मोहम्मद अली जिन्ना का निधन भी हो गया।

ये पूरा ऑपरेशन पांच दिन चला। इस लड़ाई में 1373 रजाकार मारे गए। हैदराबाद स्टेट के 807 जवान भी मरे। और भारतीय सेना के 66 जवान शहीद हुए और 100 से ज्यादा घायल हुए।

17 सितंबर, साल 1948 हैदराबाद के निजाम उस्मान अली खान ने आत्मसमर्पण कर दिया।

पाकिस्तान ने फिर इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में उठाने की कोशिश की, वो इसमें कामयाब भी हुआ।

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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