जब भारतीय बल्लेबाज ने बचाई पाकिस्तान की पहले तेज गेंदबाज की जान

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14 अक्टूबर के दिन अहमदाबाद के नरेन्द्र मोदी स्टेडियम में 48 साल का इतिहास बदलने की सोच लेकर पाकिस्तान मैदान में उतरेगा, क्योंकि 50 ओवर के वर्ल्डकप में भारत कभी पाकिस्तान से नहीं हारा... लेकिन मैदान की इस जंग से परे, भारत और पाकिस्तान के खिलाड़ियों के बीच के रिश्तों के कई रंग और भी हैं और ये रिश्ता तब से चलता आ रहा है जब 1947 से पहले भारत का विभाजन भी नहीं हुआ था। ये वो दौर था जब अविभाजित भारत की एक ही टीम थी जो इंटरनेशनल लेवल पर भारत के लिए खेलती थी। आज किस्सा साल 1947 के बंटवारे के दौर में जब भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी ने पाकिस्तान के पहले तेज़ गेंदबाज़ की जान बचाई थी।

किस्सा है साल 1947 का... तब तक बंटवारा हो चुका था। उस दौर की भारतीय टीम में लाला अमरनाथ, सीके नायडू, अब्दुल हफ़ीज़ कारदार, फ़ज़ल महमूद, अमीर इलाही और गुल मोहम्मद जैसे खिलाड़ी थे। हालांकि बंटवारे के बाद अब्दुल हफीज़ कारदार, अमीर इलाही और गुल मोहम्मद पाकिस्तान के लिए खेलने लगे। ये ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होंने भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए क्रिकेट खेला। गुल मोहम्मद लाहौर के रहने वाले थे। इनका जिक्र इसलिए क्योंकि इन्हें पाकिस्तान क्रिकेट के पहले पोस्टरबॉयज़ में से एक माना जाता है।

साल 1947 के ऑस्ट्रेलिया दौरे के लिए भारतीय टीम का चयन होना था। राय सिंह, लाला अमरनाथ, फ़ज़ल महमूद सभी धर्मों के खिलाड़ी ट्रायल में थे। इनमें से फ़ज़ल महमूद के साथ जो हुआ उसे कोई कभी नहीं भूला। जिसकी दास्तां अपनी ऑटो बॉयोग्राफी डॉन टू डस्क में फ़ज़ल महमूद ने लिखी है। वो लिखते हैं कि “मुझे कुछ महीने पहले ही एडवांस में बता दिया गया था कि 15 अगस्त 1947 के दिन लाहौर से पुणे में ट्रेनिंग कैंप के लिए आना है। 14 अगस्त 1947 को मैं लाहौर में था। लेकिन, तब तक बंटवारा हो चुका था। ऐसे वक्त में मैं लाहौर से पुणे जा रहा था। जब, बंटवारे के बाद लाख़ों लोग पलायन कर रहे थे। पंजाब दंगों में जल रहा था। वो बहुत ख़तरनाक सफ़र था।”
दरअसल, शुरुआती योजना के मुताबिक, भारत को आज़ादी बाद में मिलनी थी, इसलिए भारत के क्रिकेट चयनकर्ता नए हालात से निपटने के लिए तैयार नहीं थे। फ़ज़ल महमूद अपनी बायोग्राफ़ी में लिखते हैं, “आखिरकार 1947 का इंडिया कैंप को भंग कर दिया गया। मेरे सामने चुनौती ये थी कि मज़हबी दंगों के बीच पुणे से वापस अपने घर लाहौर कैसे पहुंचे। जो, अब पाकिस्तान बन चुका था। मैं पुणे से ट्रेन से बॉम्बे आया और मेरे साथ सीके नायडू भी थे। कुछ कट्टरपंथियों की नज़र ट्रेन में मुझ पर पड़ गई। जो, मुझे नुकसान पहुंचाना चाहते थे। लेकिन, सीके नायडू ने मुझे बचाया। वो अपना बैट लेकर सबके सामने खड़े हो गए और सबको कहा कि मुझसे दूर रहें।”

सीके नायडू के बारे में आपको बता दें कि वो अविभाजित भारत के पहले कप्तान थे और दिग्गज खिलाड़ियों में से एक थे। उनके नाम पर ही कर्नल सीके नायडू लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड रखा गया है। बंटवारे के बाद 1952 में पहली बार पाकिस्तानी टीम भारत दौरे पर आई थी। उस दौरे में लाला अमरनाथ और अब्दुल हफ़ीज़ कारदार जैसे कई खिलाड़ी ऐसे थे। जो, अविभाजित भारत में साथ खेलते थे, लाहौर में रहते हुए मिंटो पार्क में साथ में प्रैक्टिस करते थे। कहते हैं कि जब पाकिस्तानी टीम आई तो लाला अमरनाथ ख़ुद उन्हें लेने गए थे। इसके बाद भारत और पाकिस्तान के खिलाड़ियों का आना-जाना लगा रहा और दोस्ती के किस्से भी बनते रहे। चाहें वो इमरान खान और सुनील गावस्कर के आपसी रिश्ते हों या जावेद मिंयादाद और दिलीप वेंगसरकर के बीच। ये ऐसे रंग हैं जो भारत और पाकिस्तान मैच में इस अहसास को जिंदा रखते हैं कि कभी हम साथ ही खेलते थे।

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