जब शांति भूषण की दलीलों से हारीं इंदिरा गांधी और देश में लगा आपातकाल

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12 जून साल 1975 इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ एक फैसला सुनाया। एक प्रधानमंत्री के खिलाफ फैसला आने के बाद पूरा देश हिल गया। फिर क्या था विपक्ष ने मोर्चा खोल दिया और बढ़ते आक्रोश को देखते हुए इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा दी। आज कहानी 97 साल की उम्र में दुनिया से अलविदा कहने वाले देश के पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ वकील शांति भूषण की। जिन्होंने मजबूती से केस लड़ा कि दिल्ली में इंदिरा की सत्ता को हिला दिया और ये फैसला देश के राजनीतिक इतिहास का नजीर बना।

वो साल 1971 था और 5वीं लोकसभा के चुनाव के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा बुलंद कर 545 सीटों में से 352 सीटें जीत ली। इस चुनाव में इंदिरा गांधी रायबरेली सीट से खड़ी थीं और उनके खिलाफ थे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण। जिनको एक लाख 10 हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा। राजनारायण अपनी जीत मानकर चल रहे थे और इस करारी हार के बाद उन्होंने इंदिरा गांधी की जीत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दे डाली। इंदिरा गांधी पर धोखाधड़ी और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग करने के साथ आठ गंभीर आरोप लगाए। तब इंदिरा गांधी की पैरवी पालखीवाला कर रहे थे और राजनारायण ने अपना केस लड़ने के लिए वरिष्ठ वकील शांति भूषण को चुना। उस वक्त केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया में भी पहला ऐसा मौका था, जब किसी केस में प्रधानमंत्री को कोर्ट में पेश होना पड़ा हो। इंदिरा गांधी को कई घंटों तक अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देना पड़ा। शांति भूषण ने तर्क और साक्ष्य प्रस्तुत कर बहुत ही मजबूती से केस लड़ा।

12 जून साल 1975 को दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने वो ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिससे पूरे देश हिल गया। सिन्हा ने आरोपों को सही मानते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द करने के साथ ही अगले छह सालों तक कोई भी चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य ठहरा दिया।

उस समय को याद करते हुए शांति भूषण ने एक इंटरव्यू में कहा था- इंदिरा गांधी के कोर्ट में आने से पहले जस्टिस सिन्हा ने कहा, अदालत में लोग तभी खड़े होते हैं जब जज आते हैं, इसलिए इंदिरा गांधी के आने पर किसी को खड़ा नहीं होना चाहिए। जो लोग कोर्ट में आए थे उनके लिए पास बांटे दिए गए थे।

इंदिरा गांधी इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं और जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर ने 24 जून साल 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर पार्शियल सस्पेंशन का आदेश दे दिया। फैसले के मुताबिक, इंदिरा गांधी संसद की कार्यवाही में भाग तो ले सकती हैं लेकिन वोट नहीं कर सकतीं। इस फैसले के खिलाफ विपक्ष ने इंदिरा गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उसी के अगले दिन 25 जून को दिल्ली में जयप्रकाश नारायण ने रामलीला मैदान में रैली की। इस रैली के बाद ही देश में मध्यरात्रि आपातकाल लागू कर दिया था। आपातकाल के जरिए इंदिरा गांधी ने सभी विपक्षी नेताओं को जेल में ठूंस दिया।

आपातकाल खत्म होने के बाद जनता पार्टी की सरकार बनी। शांति भूषण जनता पार्टी में शामिल हो गए और साल 1977 से 1979 तक केंद्रीय कानून मंत्री रहे। वे कुछ साल बीजेपी में भी रहे। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के पिता शांति भूषण एक एक्टिविस्ट भी थे। सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन के संस्थापकों की कतार में वे सबसे आगे रहे। इसके बाद अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन में भी शांति भूषण सक्रिय दिखे। उन्होंने ही लोकपाल का पूरा मसौदा ड्राफ्ट किया था।

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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