जब देश में बना पहला गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री

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'सिंहासन खाली करो, जनता आती है' जैसे नारों ने जब जोर पकड़ा। जब 'लोकतंत्र या तानाशाही' में किसी एक को चुनने के लिए देश की जनता अपील की गई। इसके बाद आम चुनाव हुए और आजादी के 30 साल पर पहली बार कोई गैर कांग्रेसी देश का प्रधानमंत्री बना। क्रांग्रेस को पहली करारी शिकस्त मिली थी। आज किस्सा 1977 के उस लोकसभा चुनाव का जब इंदिरा गांधी और संजय गांधी अपनी सीट भी नहीं बचा पाए थे।

साल 1947 देश को आजादी मिली और जवाहर लाल नेहरू बने देश के पहले प्रधानमंत्री। नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री और फिर 24 जनवरी साल 1966 में देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सत्ता पर काबिज हुई। इस बीच जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद गुलजारी लाल नंदा दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री भी रहे।

लगातार दूसरी बार जीत कर आईं इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी और उनको सत्ता संभाले कुल 08 साल हो गए थे।

साल 1974 में पटना के गांधी मैदान में जय प्रकाश नारायण ने एक बड़ी जनसभा की और 'संपूर्ण क्रांति' की घोषणा की। जेपी ने इस आंदोलन के लिए एक साल तक यूनिवर्सिटी और कॉलेजों को बंद करने को कहा था। इस आंदोलन से जो भी जुड़ा उसे जेल जाना पड़ा। इसी आंदोलन से जॉर्ज फर्नांडिस, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुशील मोदी और शरद यादव जैसे दिग्गज नेता निकले।

तभी तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने इंदिरा गांधी के कहने पर 25 जून साल 1975 को आपातकाल की घोषणा कर दी और ये आपातकाल 21 मार्च साल 1977 तक लागू रहा। इस दौरान मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन हुआ। इस दौरान देश के लोगों की अधिकारों को खत्म कर मनमानी की गई। जबरन नसबंदी करवाई गई। करीब 21 महीनों तक देश ये हालात देखे। 

जब आपातकाल खत्म हुआ तो ये लोगों के लिए दूसरी आजादी जैसा था। विपक्षी नेताओं को रिहा किया गया। हालात सामान्य होने लगे। और साल 1977 के जनवरी महीने में इंदिरा गांधी ने आम चुनाव की घोषणा की।

जनसंघ, भारतीय लोकदल, सोशलिस्ट पार्टी ने एक होकर जनता पार्टी बनाई और ये पार्टी ये कहकर लोगों के बीच गई थी कि वो लोकतंत्र को फिर से स्थापित करेगी।

इसी बीच जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे कांग्रेस के कुछ सीनियर लीडर ने कांग्रेस छोड़ी, जिससे पार्टी पर निगेटिव इम्पैक्ट पड़ा।

16 से 19 मार्च तक जनता ने अपना मताधिकार का प्रयोग किया। और जब 20 मार्च को परिणाम आया तो कांग्रेस को सिर्फ 154 सीटें मिले। कांग्रेस को करीब 200 सीटों का नुकसान हुआ था। वहीं जनता पार्टी ने 295 सीटों पर जीत दर्ज की थी। खुद इंदिरा गांधी रायबरेली सीट से राजनारायण के हाथों और उनके बेटे संजय गांधी अमेठी सीट से रविंद्र प्रताप सिंह से हार गए थे।

बिहार और उत्तरप्रदेश जैसे दो मुख्य राज्यों में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी। वहीं अन्य हिंदी भाषी राज्य जैसे राजस्थान और मध्यप्रदेश में कांग्रेस को सिर्फ एक-एक सीट मिली। राजधानी दिल्ली में भी कांग्रेस खाता नहीं खोल पाई थी। आपातकाल में जुल्मों का हिसाब जनता ने ले लिया था। जनता ने सत्ता की चाबी जनता पार्टी को दे दी थी।

जनता पार्टी इंदिरा गांधी को सत्ता से हटाने में कामयाब तो हो गई। लेकिन दिक्कत ये थी की अब पीएम कौन बनेगा। गठबंधन के सामने पीएम के चेहरे के लिए तीन बड़े नाम थे, मोरारजी देसाई, जगजीवन राम और चौधरी चरण सिंह। जनसंघ और कांग्रेस का पुराने धड़ा मोरारजी के नाम के पक्ष में थे, तो समाजवादी और युवा जगजीवन को प्रधानमंत्री देखना चाहते थे जबकि भारतीय लोकदल अपने नेता चौधरी चरण सिंह की वकालत कर रहा था। इस कश्मकश को बाद में इस गठबंधन की सरकार में फूट की वजह भी समझा जा सकता है। आखिरकार मोरारजी के नाम पर सहमति बनी।

29 साल 1896 गुजरात के वलसाड शहर के भदेली गांव में जन्मे मोरारजी देसाई एक ब्राह्मण थे साल 1930 में ब्रिटिश सरकार की नौकरी छोड़ दी और देश के आजादी के लिए कांग्रेस के आंदोलनों से जुड़े। जेल भी गए। इनको भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के सर्वोच सम्मान भारत रत्न और निशान-ए-पाकिस्तान से सम्मानित किया गया है।  

तारीख थी 24 मार्च और साल था 1977 जब मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री ने शपथ ग्रहण की और देश आजाद होने के 30 साल बाद पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी। हालांकि ये सरकार अपना पूरा कार्यकाल नहीं कर पाई और करीब तीन बाद साल ही गिर गई और 14 जनवरी साल 1980 को इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर फिर से बैंठी।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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