जब कुछ रुपये के लालच में इंग्लैंड के राजा ने दहेज में मिली मुंबई को ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों सौंपा

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साल 1608 जब कैप्टन विलियम हॉकिंस ने भारत के एक बंदरगाह पर अपने जहाज 'हेक्टरका लंगर डालकर ईस्ट इंडिया कंपनी के आने का ऐलान कर दिया। ये दौर था जब भारत में डच और पुर्तगाली पहले से ही अपना वर्चस्व बनाने की जद्दोजहद कर रहे थे। हिंदुस्तान के सबसे ताकतवर और दौलतमंद मुगल बादशाह अकबर का निधन हो चुका था। वहीं दिल्ली के तख्त पर बैठे बादशाह जहांगीर को एक साल हो चुके थे। आज हम वो किस्सा बताएंगे जो इस घटना के 60 साल बाद घटित हुआ। जब ‘सपनों के शहर’ मुंबई को एक पुर्तगाली राजा ने राजनीतिक लाभ के कारण अपने दामाद इंग्लैंड के राजा को दहेज में दे दिया और कुछ रुपये के लालच में फिर इस शहर को ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों सौंप दिया। इसी आड़ में आए अंग्रेजों ने फिर भारत को कई सालों तक गुलाम रखा और अपनी हुकूमत की।  

मुंबई एक ऐसा शहर जहां हर कोई अपनी पहचान बनाने की भाग-दौड़ में बस दौड़ ही रहा है। ये कभी बोमबहियाकभी बॉम्बे तो कभी बम्बई के नाम से जाना गया।

अगर इतिहास के पन्नों को खंगाले तो पता चलता है कि मुंबई पहले सात छोटे - छोटे द्वीपों में बंटा था। इन द्वीपों पर गांव बसे हुए थे और ग्रामीण मछली पालन का काम करते थे। तीसरी शताब्दी में महान शासक सम्राट अशोक ने भी शासन किया। साल 1343 के आसपास गुजरात के राजाओं का परचम रहा। ये वो वक्त था जब भारत में डच के साथ-साथ पुर्तगाली आए। उन्होंने पाया कि व्यापार के लिए एक सबसे बेहतरीन जगह मुंबई है। यहां पर कब्जा जमाने के लिए साल 1507 में पुर्तगालियों ने आक्रमण कर दिया लेकिन वो अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाए। वक्त बीता लेकिन पुर्तगालियों ने मुंबई को पाने का ख्वाब नहीं छोड़ा। वे बार-बार हमले करते रहे।

साल 1534 जब हमलों से परेशान गुजरात के शासक ने बहादुर शाह ने पुर्तगालियों से संधि कर ली। अब मुंबई पुर्तगालियों के अधीन आ चुका थी।

साल 1608 ये वो वक्त था भारत के सूरत के बंगरगाह में ईस्ट इंडिया कंपनी एक जहाज अपना लंगर डाल देता है। व्यापार करने वे भी आए थे तो उनको भी मुंबई में ही अपना वर्चस्व कायम करना था। वे यहां बड़े पैमाने पर व्यापार करना चाहते थे। इसके लिए अंग्रेजों और पुर्तगाली कई बार एक दूसरे भिड़े।

साल 1652 तक आते आते ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की ‘सूरत परिषद’ में पुर्तगालियों से मुंबई को खरीदने का प्रस्ताव रखा गया। लेकिन उनका ये दांव भी नहीं चला और बात नहीं बनी।

एक वेबसाइट में छपे इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल के लेख के मुताबिक, इस विवाद को खत्म करने के लिए पुर्तगाल के राजा ने अपनी बेटी कैथरीन की शादी इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय से करने का फैसला किया। साल 1661 में दोनों की शादी हो गई। इस एक फैसले से अंग्रेज और पुर्तगालियों के बीच दूरी को खत्म कर दिया। और इस शादी के एवज में पुर्तगालियों ने ब्रिटेन को बहुत कुछ दिया। यहां तक राजा को मुंबई द्वीप को दहेज के रूप में दे दिया गया। लेकिन इसके सात साल बाद ही ये ईस्ट इंडिया की कंपनी के अधीन हो गया।

तारीख थी 27 मार्च और साल था 1668 जब दहेज में मिली इस मुंबई को राजा चार्ल्स द्वितीय ने ईस्ट इंडिया कंपनी को मात्र 10 पाउंड प्रति साल की दर पर पट्टे पर दे दिया। फिर कंपनी ने यहां रेशमकपासतम्बाकूचावल और मलमल का व्यापार बड़े पैमाने किया। अंग्रेजों का मुंबई पर कब्जा हुआ और इसके बाद पूरे देश में उनकी हूकूमत हुई जो भारत की आजादी तक चलती रही।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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