कौन है अब्दुल करीम टुंडा, जिसने 5-6 दिसंबर 1993 की आधी रात को मचा दिया था तहलका ?

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दिन था 6 दिसंबर और साल 1992, ये कोई आम तारीख नहीं है. ये वही दिन था जब लगभग 2 लाख कार सेवक राम मंदिर का सपना लिए बाबरी मस्जिद पहुंचे थे. इनमें से हजारों लोग इस दौरान जय श्री राम के नारे लगा रहे थे. नारा ये भी दिया जा रहा था... राम लला आएंगे मंदिर वहीं बनाएंगे. इन नारों से उस दिन पूरी अयोध्या गूज रही थी. सड़कें मानों कारसेवकों से अटी पड़ी थीं. इन्हीं कारसेवकों ने पुलिस बैरिकेंटिंग को तोड़कर, आगे बढ़कर विवादित ढांचे में प्रवेश किया और मस्जिद की गुबंद और बाकी जगहों पर चढ़कर अपने हक की आवाज को उठाया था. जिसे कुछ लोग बर्दाश्त नहीं कर पाए थे.

ठीक इसके एक साल बाद यानी 5-6 दिसंबर, साल 1993 आधी रात का वक्त था, तभी अचानक कई ट्रेनों में विस्फोट हुए. जिसकी खबर आग की तरफ फैल जाती है. लखनऊ, कानपुर, हैदराबाद, सूरत और मुंबई में राजधानी एक्सप्रेस सहित 6 ट्रेनों में हुए इस सिलसिलेवार ब्लास्ट ने सबको हिलाकर रख दिया. दिल्ली में बैठी सरकार के भी हाथ-पांव ढीले पड़ गए. चारों ओर अफरा-तफरी का माहौल बन गया. इस विस्फोट में दो लोग मारे गए जबकि 22 लोग घायल हुए. जिन्हें इलाज के लिए अस्पताल रेफर कर दिया गया. आज भी बहुत से लोगों के जहन में अब भी उस सिलसिलेवार ट्रेन ब्लास्ट की यादें हैं जो 1993 में जिंदा थे या फिर बाद में उन्होंने इस घटना के बारे में पढ़ा. लेकिन अब फिर से इस मामले की चर्चा छिड़ी हुई है क्योंकि कोर्ट ने इस हमले के आरोपी अब्दुल करीम टुंडा को बरी कर दिया है. ऐसे में ये भी जानना बेहद जरूरी है कि आखिर कौन था अब्दुल करीम टुंडा, जिसको कोर्ट ने बरी किया और कैसे वो आतंकी गतिविधियों में शामिल हुआ.

साल 1943 में पुरानी दिल्ली के छत्तालाल मियां में जन्में अब्दुल करीम टुंडा का परिवार गरीब था. उसकी हरकतें भी सही नहीं थी. पिता लोहे की ढलाई का काम करते. टुंडा की हरकतों से आजीज आकर पिता ने पुरानी दिल्ली छोड़ने का मन बनाया और गाजियाबाद जिले के पिलखुआ में बस गए. यहां टुंडा ने अपने भाइयों के साथ बढ़ई का काम सीखा और फिर उसी काम को करने लगा. समय धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था. तभी उसकी शादी पिता ने जरीना नाम की एक महिला से करा दी. जिसने तीन बच्चों इमरान, रशीदा और इरफान को जन्म दिया. फिर साल 1981 में वो जरीना को छोड़कर लापता हो गया. जब घर लौटा तो उसके साथ दूसरी पत्नी अहमदाबाद निवासी मुमताज थी. टुंडा की गतिविधियां संदिग्ध थीं. वो कई-कई दिनों तक घर से गायब रहने लगा. इसके बाद वो कपड़े का कारोबार करने मुंबई चला गया. मुंबई के भिवंडी इलाके में उसके कुछ रिश्तेदार रहते थे. 1985 में भिवंडी के दंगों में उसके कुछ रिश्तेदार मारे गए. आरोप है कि इसका बदला लेने के लिए उसने आतंकवाद की राह पकड़ी. और 1980 के आसपास वो आतंकी संगठनों के संपर्क में आया. लश्कर जैसे कुख्यात आतंकी गिरोह से जुड़े होने के आरोपी अब्दुल करीम का नाम टुंडा एक हादसे के बाद पड़ा था.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 1985 में टुंडा राजस्थान के टोंक जिले की एक मस्जिद में कुछ युवाओं को पाइप गन चलाकर दिखा रहा था. तभी गन फट गई, जिसमें उसके एक हाथ का पंजा उड़ गया. इसके कारण उसका नाम टुंडा पड़ गया. अब्दुल करीम टुंडा भारत की मोस्ट वांटेड लिस्ट में उन 20 आतंकवादियों में से एक था जिसे भारत ने 26/11 के आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान सरकार से सौंपने की मांग की थी. Times of India की रिपोर्ट के मुताबिक, इस लिस्ट में लश्कर-ए-तैयबा के हाफिज सईद, जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मौलाना मसूद अजहर और दाऊद इब्राहिम सहित कई अन्य नाम शामिल हैं और इनके साथ भी टुंडा का नाम जोड़ा गया था. कहा जाता है टुंडा के खिलाफ पहला मामला 1956 में चोरी का दर्ज हुआ था. टुंडा पर दिल्ली के कई थानों में मामले दर्ज तकरीबन 21 मामले दिल्ली और 13 मामले गाजियाबाद में दर्ज बताए जाते है. साथ ही कई शहरों में भी उसके नाम पर केस दर्ज है. रिपोर्ट्स की मानें तो मुंबई के डॉक्टर जलेश अंसारी, नांदेड के आजम गोरी और टुंडा ने तंजीम इस्लाम उर्फ मुसलमीन संगठन बनाकर बाबरी विध्वंस का बदला लेने के लिए 1993 में पांच शहरों में ट्रेनों में बम ब्लास्ट किए थे.

दावा है कि 1993 बम धमाकों के दौरान लश्कर-ए-तैयबा का विस्फोटक एक्सपर्ट था. इसी कारण से उसे 'डॉ बॉम्ब' कहा जाता है. बता दें इस केस को तत्कालीन सरकार ने CBI को सौंपा था. CBI ने 1994 में मामले को क्लब करते हुए टाडा कोर्ट अजमेर भेज दिया था. ट्रेनों में सीरियल धमाके के बाद 1996 में दिल्ली में पुलिस मुख्यालय के सामने बम विस्फोट हुआ. इस मामले में टुंडा पर आरोप लगे. इसको लेकर सुरक्षा एजेंसी इंटरपोल ने उसका रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया. अब्दुल करीम पर 33 आपराधिक मामले दर्ज हैं. 1997- 98 में करीब 40 बम धमाकों में भी टुंडा का नाम शामिल है.  CBI ने टुंडा को इन धमाकों का मास्टर माइंड माना था और 2013 में नेपाल बॉर्डर से उसकी गिरफ्तारी हुई थी. टुंडा पर देश की कई अन्य अदालतों में आतंकवाद के मामले चल रहे हैं. उस पर युवाओं को भारत में आतंकवादी गतिविधियां करने के लिए प्रशिक्षण देने का भी आरोप है. पुलिस के मुताबिक, टुंडा बम बनाने में माहिर है और आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के लिए काम कर रहा था. जब उसे गिरफ्तार किया गया तो पुलिस को कथित तौर पर उसके पास से एक पाकिस्तानी पासपोर्ट नंबर एसी 4413161 मिला, जो 23 जनवरी 2013 को जारी किया गया था. फिर साल 2016 में दिल्ली की एक अदालत से चार मामलों में क्लीन चिट मिल गई थी. हालांकि, 1996 के सोनीपत ब्लास्ट मामले में दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास की सजा और 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया था.  बता दें 1993 में पांच बड़े शहरों में हुए सीरियल ट्रेन ब्लास्ट के मामले में अजमेर टाडा कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया और टुंडा को बरी कर दिया है. साथ ही दो और आतंकवादी इरफान और हमीदुद्दीन को इसी कोर्ट ने उम्र कैद की सजा सुनाई है.कहा जा रहा है कि टुंडा के बरी होने के बाद CBI अब इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगा.

कानपुर का हूं, 8 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं, पॉलिटिक्स एनालिसिस पर ज्यादा फोकस करता हूं, बेहतर कल की उम्मीद में खुद की तलाश करता हूं.

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