यूरोप को भारत के ज़रिये मिल रहा रूस का सस्ता तेल किसे फ़ायदा पहुंचा रहा है?

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24 फरवरी 2022 को, रूस ने यूक्रेन के कुछ हिस्सों पर आक्रमण किया और कब्जा कर लिया, जिसकी यूरोपियन कंट्रीज़ ने कड़ी निंदा की। यूक्रेन पर हमले की सज़ा के तौर पर ईयू यानी यूरोपियन यूनियन ने बीते साल दिसंबर में रूसी कच्चे तेल पर लगभग बैनलगा दिया था, और फिर दो महीने बाद उसके रिफाइंड ऑयल प्रोडक्ट्स पर भी बैन लगा दिया गया। जबकि बैन लगाए जाने से पहले तक यूरोप अपनी जरूरी खपत का लगभग 30 फीसदी तेल रूस से खरीदता था।  इन प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखा। प्रतिबंधों का फायदा उठाते हुए भारत ने सस्ते दाम पर ज्यादा तेल खरीदा। जिसका नतीजा ये है कि आज भारत के रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का यूरोप के बाजारों में एक्सपोर्ट बढ़ा है। आइए समझते हैं कि कैसे बीते एक साल में भारत पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा सप्लायर बन कर उभरा है।

आप घर से ऑफिस आते जाते वक्त पेट्रोल लेने के लिए किसी न किसी नायरा के पेट्रोल पम्प पर रूकते होंगे। नायरा पेट्रोल पम्प भी बीते एक साल से ही आप देख रहे होंगे क्योंकि भारत में रिफाइनिंग कंपनियों में रिलायंस और नायरा एनर्जीस को  यूरोपीय बाज़ारों में रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के एक्सपोर्ट का अच्छा फायदा मिला है। जिसके चलते कंपनियों ने खासा तरक्की भी की है। आपको बताते चलें कि रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी विश्व की सबसे बड़ी रिफाइनरीस में से एक है, जहां से कच्चा तेल रिफाइन कर विदेशों में एक्सपोर्ट किया जाता है। माना जा रहा था कि रूसी तेल के इम्पोर्ट पर बैन से यूरोपीय यूनियन के साथ ही पूरे यूरोप में सप्लाई की किल्लत पैदा हो सकती है। यूरोप के लिए ये और ज्यादा चिंता की बात थी क्योंकि ये पहले से ही ऊंची महंगाई दरों से जूझ रहा था। लेकिन इस बैन के बावजूद यूरोप को रूसी तेल की सप्लाई जारी है। रूस का कच्चा तेल सीधे यूरोप तक न पहुंचने की वजह से वहां की तेल रिफाइनिंग कंपनियों के सामने उत्पादन की समस्या पैदा हो गई है। लेकिन भारत की प्राइवेट सेक्टर की रिफाइनरियों ने इसे यूरोप के सप्लाई गैप को भरने के अच्छे मौके के तौर पर देखा है। आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले साल जनवरी तक भारत से यूरोपीय यूनियन के देशों में रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का एक्सपोर्ट लगातार पांच महीने तक बढ़ता रहा। इस महीने ये 19 लाख टन तक पहुंच गया। फाइनेंशियल ईयर 2022-23 का ये हाईएस्ट मंथली फीगर था। अप्रैल 2022 से लेकर जनवरी 2023 तक भारत से यूरोप को किया जाने वाला रिफाइंड पेट्रोलियम का एक्सपोर्ट बढ़ कर 1.16 करोड़ टन तक पहुंच गया। 

इस ड्यूरेशन में भारत के रिफाइंड पेट्रोल प्रोडक्ट्स के एक्सपोर्ट का 15 फीसदी हिस्सा अकेले यूरोपीय बाज़ार में किया गया। बाद में ये बढ़ कर 22 फीसदी तक पहुंच गया। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक रूस के पेट्रोलियम उत्पादों पर यूरोपियन यूनियन के बैन के बाद भारत के रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का इस बाज़ार में एक्सपोर्ट लगातार बढ़ा है और अब भारत सबसे बड़े सप्लायर बनने की राह पर है। अमेरिका और यूरोप की ओर से बैन लगाए जाने के बाद भी भारत रूस से भारी मात्रा में रियायती दाम पर कच्चा तेल खरीद रहा है। पिछले साल फरवरी में छिड़े रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले तक भारत के इम्पोर्ट बास्केट में रूसी तेल की हिस्सेदारी सिर्फ एक फीसदी थी लेकिन एक साल में यानी फरवरी 2023 में ये हिस्सेदारी बढ़ कर 35 फीसदी पर पहुंच गई। इस समय तक भारत रूस से प्रतिदिन 1.4 मिलियन बैरल तेल खरीद रहा था। इस साल मार्च में खुद रूसी उप प्रधानमंत्री अलेक्जे़ंडर नोवाक ने बताया कि उनके देश ने पिछले एक साल में भारत को अपनी तेल बिक्री 22 फीसदी बढ़ाई है। भारत चीन और अमेरिका के बाद तेल का तीसरा बड़ा खरीदार है। लेकिन अमेरिकी और यूरोपीय प्रतिबंधों के बाद से जब रूस ने अपना तेल सस्ता किया तो भारत के लिए ये अपना तेल भंडार बढ़ाने का अच्छा मौका था। रूस से बढ़ी तेल सप्लाई का फायदा अब यहां की निजी तेल रिफाइनिंग उठा रही हैं और इनका सबसे अच्छा बाज़ार उन्हें यूरोप दिख रहा है।

भले ही यूरोपियन यूनियन ने रूसी तेल पर प्रतिबंध लगा रखा है लेकिन भारत के ज़रिये ये खूब तेल खरीद रहा है। ये भी दिलचस्प है कि यूरोपीय देशों ने रूस से सस्ते में कच्चा तेल खरीदने के भारत के कदम पर नाराज़गी जताई थी।

दिसंबर 2022 में भारत आई जर्मनी की विदेश मंत्री एनेलिना बेरबॉक ने जब रूस से तेल खरीदने पर भारत से शिकायत की थी, तो भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि पिछले नौ महीने में यूरोपियन यूनियन ने जितना तेल खरीदा है, भारत ने उसका छठा हिस्सा ही खरीदा है। अब यूरोपीय देशों में भारत से तेल मंगाने में कोई आपत्ति नहीं दिख रही है।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि भले ही कुछ पश्चिमी देश रूस से ज़्यादा तेल खरीदने को लेकर भारत से नाराज़ थे। दुनिया के सामने उन्होंने इस पर आपत्ति जताई थी लेकिन अंदर ही अंदर उन्हें इस स्थिति से कोई दिक्कत नहीं थी। अमेरिका और कई पश्चिमी देशों के लिए ये राहत की बात होगी कि भारत की रिफाइनिंग कंपनियों को ग्लोबल ऑयल की सप्लाई बरकरार रहे। क्योंकि इससे यहां के रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स उनके मार्केट में आ सकें और वहां सप्लाई की स्थिति अच्छी रहे। ये यूरोप और अमेरिका दोनों के हित में हैं। खासकर यूरोप के लिए, क्योंकि बढ़ती महंगाई को देखते हुए वहां तेल महंगा होना ख़तरे की घंटी है। अमेरिका और यूरोप को लग रहा है कि तेल की ग्लोबल सप्लाई को झटके से बचाने के लिए भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों का एक्सपोर्ट बढ़ना एक अच्छा संकेत है। भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों को इसका ख़ासा फायदा हो रहा है। सस्ते रूसी तेल की वजह से उनकी रिफाइनिंग लागत घटी है और मार्जिन बढ़ा है। 

भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीद कर कर अब तक 35 हज़ार करोड़ रुपये बचाए हैं। दूसरी ओर ये पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा सप्लायर बन कर भी उभरा है। एक्सपर्ट्स का ये भी कहना है कि, ''युद्ध ने ऐसी स्थिति बनाई है कि भारत जिस कमोडिटी का इम्पोर्टक रहा है वो अब इसका एक्सपोर्टक बनता जा रहा है। भारत तेजी से पेट्रोल के वैल्यू एडेड प्रोडक्ट की सप्लाई का बड़ा हब बनता जा रहा है। लेकिन भारत आगे इस स्थिति का फायदा तभी उठा पाएगा जब वो अपनी रिफाइनिंग क्षमता को और विस्तार दे और इसे मजबूत बनाए।''

 

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