WHO ने बताया प्रीमेच्योर डिलीवरी का खतरा कितना बढ़ा?

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प्रेग्नेंसी की खबर किसी भी फैमिली के लिए एक खुशी की लहर लेकर आती है। लेकिन वहां से गर्भवती की देखभाल सही से हो, ये चिंता भी शुरु हो जाती है। तो इस पर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल जीनोमिक्स ने सर्वे करके निष्कर्ष निकाला कि इंडिया में हर साल पैदा होने वाले बच्चों की संख्या में 13% बच्चे समय से पहले ही पैदा हो जाते हैं, जिसे हम प्रीमैच्योर डिलीवरी कहते है। प्रीमैच्योर डिलीवरी के लगातार बढ़ते आंकडों को देखते हुए रिसर्चर इस पर चिंता जाहिर कर रहे हैं।  

पश्चिम बंगाल के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल जीनोमिक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल पैदा होने वाले बच्चों की संख्या में 13% बच्चे समय से पहले ही पैदा हो जाते हैं। और अगर ग्लोबली देखें तो ये आकंडा 23.4% तक जा पहुंचता है।

तो वहीं रिसर्चर ये भी बताते हैं कि ये सभी के स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्णे रिसर्च थी। इसके पीछे का एक कारण ये भी है कि समय से पहले शिशु का जन्म उसकी मृत्यु के एक कारणों में से एक है। इसी के साथ ही समय से पहले अगर बच्चे का जन्म हो जाता है तो शिशु का शारीरिक ही नहीं मानसिक विकास में भी देरी से होता है।

प्रीमैच्योर बच्चों में एक उम्र के बाद टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लैड प्रेशर, यहां तक कि कैंसर जैसी बीमारियों के होने का खतरा नॉर्मल डिलीवर बच्चों से ज्यादा होता है। भारत प्री-मैच्योर डिलीवरी के मामले में सबसे आगे है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट बॉर्न टू सून बताती है कि नवजात की मौत के मामले सबसे ज्यादा भारत और फिर पाकिस्तान, नाइजीरिया, चीन और फिर इथियोपिया में होते हें। साल 2020 में तकरीबन 134 लाख बच्चे ग्लोबली समय से पहले पैदा हुए। जिसमें 30 लाख यानी कि 22 परसेंट बच्चे भारत में पैदा हुए। वैसे प्रीमैच्योर डिलीवरी का सीधे शब्दों में मतलब होता है कि बच्चा गर्भावस्था के 37 हफ्ते पहले ही पैदा हो जाता है।

 

ये सामान्य सा सवाल है आखिर प्रीमैच्चोर डिलीवरी के कारण क्या होते हैं। तो धूम्रपान, शराब का सेवन, संक्रमण, ह्दय रोग और मधुमेह ये कुछ चुनिंदा कारण बताएं जाते हैं। इसी के साथ ही 18 से पहले और 35 साल से ज्यादा उम्र के बाद प्रेग्नेंसी होना एक बड़ा कारण है। जैसे ग्रामीण और उन क्षेत्रो में जहां लड़कियों की शादी जल्दी हो जाती है, तो वहीं शहरी इलाकों में जहां एक स्टैबल लाइफ के लिए लड़कियां कुछ देर से शादी करती हैं, दोनों ही जगह प्रीमैच्योर डिलीवरी के केसेस काफी होते हैं।

तो वहीं पिछली गर्भावस्था में प्रीमैच्चोर डिलीवरी होना, गर्भ में जुडवां या उससे ज्यादा भ्रूण होना। इसी के साथ ही आनुवांशिक प्रभाव और मोटापा भी एक अहम कारण है। वैसे मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रीमैच्योर डिलीवरी की सलाह भी कुछ चुनिंदा कंडीशन्स में खुद डाक्टर्स देते हैं।

जैसे कि प्री-एक्लेम्प-सिया इस कंडीशन में गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर हाई हो जाता है।

किसी तरह का संक्रमण होने पर, भ्रूण में किसी तरह की जन्म दोष होने पर, इसी के साथ डायबिटीज का लेवल ज्यादा होने पर या फिर गर्भावस्था में खून की कमीं या फिर गर्भवती का शारीरिक रुप से कमजोर होने पर भी डाक्टर्स प्रीमैच्योर डिलीवरी सुझाव देते हैं।

प्रीमैच्योर लेबर से बचने का एक तरीका गर्भावस्था के दौरान उचित देखभाल भी है। इससे मां और बच्चा दोनों स्वस्थ रहते हैं। इसी के साथ ही गर्भवती महिला की ठीक तरह से देखभाल न की जाए तो इसकी वजह से अचानक जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं।

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