ख़ातून-ए-पाकिस्तान की आवाज आखिर क्यों जिन्ना की मौत के बाद दब गई?

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मोहम्मद अली जिन्ना को अपनी जिंदगी के हर कदम पर अपनी छोटी बहन फातिमा जिन्ना साथ मिला। बटवारे के वक्त जब मोहम्मद अली जिन्ना की बाकी दोनों बहनों ने भारत में रहना चुना तो उस वक्त फातिमा जिन्ना अपने भाई के साथ पाकिस्तान गईं थी। बाद में पाकिस्तान की तरक्की और वहां महिलाओं के हक और दर्जे के लिए...वो काफी एक्टिव रहीं। 2023 के आखिर तक उनपर पाकिस्तान में एक शो 'फातिमा जिन्ना: सिस्टर, रिवोल्यूशन, स्टेट्समैन' भी रिलीज किया जाएगा। लेकिन पाकिस्तान की इस शख़्सियत की आवाज को मोहम्मद अली जिन्ना की मौत के बाद दबा दिया गया औऱ उनके जनाजे में भी काफी विवाद भी हुआ।

30 जुलाई 1893 में जन्मी ख़ातून-ए-पाकिस्तान यानी लेडी ऑफ पाकिस्तान कही जाने वाली फातिमा ने कलकत्ता से डेंटल साइंस में डिग्री लेने के बाद मुंबई में एक डेंटल क्लिनिक खोला था। पाकिस्तान के मुस्तकबिल को बनाने में अहम रोल निभाने वाली फातिमा जिन्ना को 'मादर-ए-मिल्लत' यानी कौम की मां भी कहा जाता है। फातिमा ने रत्तनबाई पेटिट से शादी की। लेकिन पति की मौत के बाद से वो अपने भाई मोहम्मद अली जिन्ना के घर आ गईं और 11 सितंबर 1948 को मोहम्मद अली जिन्ना की मौत तक यानी 19 साल तक उनके साथ रहीं। बटवारें के वक्त उन्होंने मुहाजिरों यानी घर-बार छोड़कर पाकिस्तान आए लोगो की मदद के लिए... काफी एक्टिव रहीं थी। लेकिन मोह्म्मद अली जिन्ना के इंतकाल के बाद से उन्हें सियासत से दूर रखने की पूरी कोशिश की गई।

एक काफी मशहूर किस्सा है कि तत्कालीन हुकूमत नहीं चाहिती थी कि जिन्ना की मौत के बाद फातिमा अपने ख्यालात को आवाम तक पहुंचाएं। मोहम्मद अली जिन्ना की दो साल गुजर जाने पर भी फातिमा अपनी कौम से मुखातिव नहीं हुई थी, क्योंकि वो पहले रेडियो पर अपना भाषण देना चाहिती थी। ऐसा बताया जाता है कि जिन्ना की दोनों बरसी पर फातिमा जिन्ना के भाषण के न होने से काफी हंगामा हुआ। इसलिए मोहम्मद अली जिन्ना की तीसरी बरसी पर फातिमा जिन्ना के रेडियो भाषण को मंजूरी मिली। लेकिन हुकूमत को ये खौफ था न जाने वो क्या बोल दें, जिससे हुकूमत पर मुसीबत आ जाए।

जब तीसरी बरसी पर फातिमा को रेडियो पर लोग उन्हें सुन रहे थे। तभी अचानक ट्रांसमिशन बंद हो गया और कहा गया कि लाइट चली गई। जबकि ऐसा बताया जाता है कि वो हुकूमत के खिलाफ कुछ कह रही थीं, इसलिए माइक ऑफ कर दिआ गया। हालांकि इस बात पर लोगों के गुस्से से हुकूमत को जितना नुकसान हुआ था वो शायद फातिमा जिन्ना के शब्दों से नहीं होता।

फिर 2 जनवरी 1965 को प्रेसिडेंशियल इलेक्शन हुए। तब फातिमा की कामयाबी की पूरी उम्मीद थी लेकिन इलेक्शन कमीशन द्वारा अय्यूब खान को कामयाब घोषित कर दिया था।..सियासी मुश्किलों का दौर चलता रहा और 9 जुलाई 1967 को फातिमा का इंतकाल हो गया।

फातिमा की ख्वाहिश थी कि उन्हें अपने भाई जिन्ना की कब्र के पास ही दफनाया जाए। लेकिन हुकूमत उन्हें कहीं और दफनाना चाहती थी। जिसके बाद कराची के कमिश्नर फातिमा के परिवार से मिले और दफन को लेकर बैठके हुईं। लेकिन आखिर में कई कश्मकश के बाद उन्हें मोहम्मद अली जिन्ना की कब्र के पास ही दफनाने का फैसला हुआ। 

जैसे-जैसे फातिमा का जनाज़ा जिन्ना के मजार की तरफ बढ़ रहा था, लोगों का हुजूम बढ़ता जा रहा था। रास्ते में छतों से औरतें फूल बरसा रही थीं। भीड़ लाखों की तादाद में थी। पुलिस के लिए रास्ता बनाना मुश्किल हो रहा था। लोग फातिमा को आखिरी बार देखना चाहते थे। हालात काबू से बाहर होते देख पुलिस ने लाठीचार्ज कर दी, हंगामा इतना बढ़ा कि आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा। जवाब में भीड़ ने पुलिस पर पथराव कर दिया। कई पुलिस वाले ज़ख़्मी हुए। एक पेट्रोल पंप और एक डबल डेकर बस को आग लगा दी। इस सब में एक शख्स की मौत हो हुई। बच्चे और औरतें ज़ख़्मी हो गए।

हालांकि फातिमा की मौत के बाद ये कहा गया कि उनकी मौत खुद से नहीं बल्कि उनका क़त्ल किया गया। मामला कोर्ट पहुंचा और कहा गया कि मरने से दो दिन पहले वो एक शादी में शामिल हुई थीं और तब वो एकदम ठीक थीं। लेकिन 9 जुलाई को उनके मरने की खबर आई। कई अखबारों में भी छपा की आवाम को आखिरी बार फातिमा का दीदार इसीलिए नहीं करने दिया गया क्योंकि उनके शरीर पर चोट के निशान  थे।

सार्वजनिक तौर पर फातिमा अपने भाई मोहम्मद अली जिन्ना के साथ थी, लेकिन जिन्ना की मौत के बाद सियासत में उनका सफर अच्छा नहीं रहा। 

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