Saeed Akhtar Mirza ने 28 साल से क्यों नहीं बनाई फिल्म?

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'अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है', 'मोहन जोशी हाजिर हों' और 'सलीम लंगड़े पर मत रो' जैसी फिल्मों को बनाते और टीवी पर 'नुक्कड़' और 'इंतजार' जैसे नाटक को रचते हुए जब इन्हें देखा गया तभी ये साफ गया था कि ये सामाजिक सरोकारों में बेहद जागरूक, गहरे संवेदनशील, तेवर विद्रोही और एक अलग तरह के फिल्मकार हैं। 1976 से करियर शुरू किया। तब से लगातार फिल्में बनाई। फिर आखिर क्यों को 1995 के बाद से एक भी फिल्म डायरेक्ट नहीं की। आज कहानी दो बार फिल्म फेयर और चार बार नेशनल अवार्ड जीतने वाले फिल्म डायरेक्टर और स्क्रीनप्ले राइटर सईद अख्तर मिर्जा की।

साल 1965 में रिलीज हुई फिल्म 'वक्त' की कहानी लिखने वाले अख्तर मिर्जा मुंबई में रहते थे। उनके घर 30 जून साल 1943 को सईद अख्तर मिर्जा का जन्म हुआ। पिता फिल्मों से जुड़े हुए थे तो सईद को भी फिल्में में काम करने की तमन्ना हुई। शुरुआती पढ़ाई के बाद साल 1976 में फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्ट से ग्रेजुएशन किया।

अपने करियर की शुरुआत डाक्यूमेंट्री बनाने से की। बतौर फिल्म डायरेक्टर साल 1978 में रिलीज हुई फिल्म 'अरविंद देसाई की अजीब दास्तान' से की। जिसमें एक युवा को उसके संघर्षों से लड़ते हुए दिखाया गया। साल 1980 में रिलीज हुई फिल्म 'अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है' से उनकी पहचान बनीं। इस फिल्म में एक गुस्सैल नौजवान की कहानी है। जो अपने समाज और संस्कृति की बेसिक मूल्यों को तलाशता है। इन दोनों ही फिल्मों लिए फिल्मफेयर का क्रिटिक्स अवार्ड मिला। इसके चार बाद एक और फिल्म आई जो हिट हुई।

फिल्म का नाम था - 'मोहन जोशी हाज़िर हो'। साल 1989 में 'सलीम लंगड़े पे मत रो' और छह साल बाद साल 1995 में फिल्म 'नसीम' का डायरेक्शन किया। साल 1992 में देश में जो कुछ घट रहा था। फिल्म 'नसीम' उसी पर ही बेस्ड थी। इस फिल्म में हाशिए पर छूटी, अनसुनी, दबी हुई, त्रस्त आवाजों को सुना गया। 'नसीम' के बाद सईद ने फिर कोई फिल्म नहीं बनाई। भीतर जैसे कुछ दरक गया। समाज में जो चल रहा है, जो घट रहा है। वो नरेटिव अपनी फिल्म में जिस तरह से बुनते हैंवो सिनेमा को चाहने वालों के लिए एक दुर्लभ अनुभव है।

इनके डायरेक्शन में बने 1986 के 'नुक्कड़' और 1988 के 'इंतज़ार' जैसे सीरियल बेहद हिट रहे।

इंडियन सिनेमा में उनका बहुत बड़ा योगदान है। वो अक्कर देश विदेश की यूनिवर्सिटी में भाषण देते है। वो अक्सर अखबारों में मौजूदा वक्त की बहसों पर लिखते हैं और फिल्मों पर अपनी समीक्षा देते हैं। अपनी बायोग्राफी अम्मी: लेटर टू ए डेमोक्रेटिक मदर लिखी, जो 2008 में प्रकाशित हुई थी।

एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन के इंटरनेशनल फिल्म एंड टेलीविजन क्लब के सदस्य हैं और आने वाले वक्त में नए प्रोजेक्ट में काम कर रहे हैं।

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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