एयरपोर्ट और मल्टीप्लेक्स में खाने-पीने का सामान महंगा क्यों मिलता है?

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सेजल सूद का ट्वीट हाल-फिलहाल काफी वायरल रहा, जिसमें उन्होंने एयरपोर्ट पर 193 रुपए की मैगी का जिक्र किया, जो टविटर पर ट्रैंडिंग भी रहा। बीते साल इसी तरह फराह खान नाम की एक जर्नलिस्ट का 490 रुपए में दो समोसे, एक चाय और एक पानी की बोतल खरीदने वाला ट्वीट भी वायरल रहा था। वहीं पीवीआर में अगर आप मूवी देखने जाएं, तो 55 ग्राम चीज पॉपकॉर्न और कोल्ड्रींग के लिए 820 भरने पडते, हालांकि अभी इसमें कुछ तब्दीली हुई है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि एयरपोर्ट से लेकर मल्टीप्लेक्स तक खाने-पीने का सामान इतना महंगा क्यों मिलता है।

मल्टीप्लेक्स से लेकर बड़े-बड़े होटल्स तक अपने मेन्यू की रेट फिक्स करते हैं। हालांकि प्राइज फिक्शिंग का एक आधार होता है। जैसे कि जहां आउटलेट है उस जगह की कॉमर्शियल वैल्यू कितनी है। किसी पर्टिकुलर डिश को क्या कोई प्रोफेशनल बना रहा है, या फिर उसमें इस्तेमाल कोई चीज कितनी कीमत की है। साथ में ही कहीं वो डिश उसकी सिग्नेचर डिश है, जिसे चखने के लिए ग्राहक को ज्यादा कीमत चुकानी होगी।

सिग्नेचर डिश एक ऐसी रेसिपी होती है, जो एक व्यक्तिगत शेफ या रेस्तरां की पहचान कराती है। कई बार लोग सिग्नेचर डिश की वजह से खाने की जगह पर जाते हैं। उसे बनाने के लिए जो इंग्रीडिएंट्स यूज हो रहे हैं, उनकी क्वालिटी क्या है, वो इम्पोर्टेड तो नहीं हैं।

इस सभी के साथ ही उस पर टैक्स यानी कि GST भी लगता है। किसी सामान को खरीदने या किसी सर्विस को खरीदने पर हमें GST चुकाना पड़ता है। प्री- पैकेज्ड, लेबल्ड अनाज, दाल और आटे पर भी GST देना पड़ता है। वैसे बता दें, GST काउंसिल ने 11 जुलाई,2023 को सिनेमा हॉल में खाने-पीने की चीजों के बिल पर लगने वाले GST को 18% से घटाकर 5% कर दिया था। इसके बाद पीवीआर ने अपने रेट्स में 40 परसेंट कीमत करने की बात की।

किसी भी जगह पर अगर बिल सही है, यानी कि जो कीमत मेन्यू में लिखी है अगर  वो कीमत ली गई है और प्रोडक्ट क्वालिटी सही है। सर्विस में कोई कमी नहीं है, तो कंज्यूमर फोरम में शिकायत नहीं की जा सकती है। कोई भी रेस्ट्रोरेंट अपनी डिश का प्राइज तय करने का पूरा राइट रखता है। तो वहीं मल्टीप्लेक्स और एयरपोर्ट में चीजे मंहगे का कारण कॉमर्शियल स्पेस का महंगा होना है। इसके साथ GST और सर्विस टैक्स भी जोड़ा जाता है।

सर्विस चार्ज क्या होता है, वो भी जान लेते हैं। जब हम प्रोडक्ट या सर्विस को खरीदते हैं, तो उसके लिए कुछ पैसे देने पड़ते हैं। जिसे सर्विस चार्ज कहते हैं। यानी होटल या रेस्टोरेंट में खाना परोसने से लेकर दूसरी सेवाओं के लिए ग्राहक से सर्विस चार्ज लिया जाता है। सिर्फ होटल या रेस्टोरेंट ही नहीं बल्कि बैंक में कोई ट्रांजैक्शन करने के बाद, ट्रैवल-टूरिज्म एजेंसियों में भी सर्विस चार्ज देना पड़ता है। लेकिन रेस्टोरेंट और होटल में खाने-पीने के बाद ग्राहकों को सर्विस टैक्स देना जरूरी नहीं है। सर्विस टैक्स देना है या नहीं यह अधिकार सिर्फ और सिर्फ ग्राहक के पास होता है। कोई भी रेस्टोरेंट ग्राहक से जबरदस्ती सर्विस टैक्स नहीं मांग सकता है। ग्राहक अगर सर्विस टैक्स नहीं देना चाहता है, तो बिल से उसे हटवा सकता है। हालांकि ज्यादातर लोग सेवाओं के बदले इस रकम को दे देते हैं।

वैसे ऐसा जरूरी नहीं कि होटल या रेस्टोरेंट वाले आपसे सर्विस चार्ज के नाम से ही एक्स्ट्रा पैसे लें। कई बार बुकिंग फीस, ट्रैवल में सिक्योरिटी फीस, बैंकों में अकाउंट मेंटेनेंस फीस और कस्टमर सर्विस के नाम से भी सर्विस टैक्स लिया जाता है।

अगर होटल या रेस्टोरेंट ग्राहक से जबरदस्ती सर्विस चार्ज मांगता है तो ग्राहक इस बात का विरोध कर सकते हैं और उपभोक्ता अदालत में जाकर शिकायत कर सकते हैं। साथ ही अगर कोई रेस्टोरेंट सर्विस चार्ज को लेकर मनमानि कर रहा हो तो 1915 पर कॉल करके आप शिकायत भी दर्ज करा सकते हैं।

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